बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ही एनडीए को 3 झटके!

-क्या मोदी-नीतीश को चिंता करनी चाहिए?

दीपक कुमार तिवारी

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 जैसे जैसे करीब आ रहा है गठबंधन की राजनीति में दरार दिखने लगी है। इंडिया गठबंधन की तो बात ही नहीं रह गई । उनके नेताओं ने ही कह डाला कि इंडिया गठबंधन लोकसभा चुनाव तक के लिए बना था, अब सब खत्म। दूसरी ओर एनडीए गठबंधन के भीतर भी सब कुछ सहज नहीं हैं। अपने-अपने रणनीति के अनुसार प्रदर्शन तो कर ही रहे हैं। इसके अलावा तीन फैक्टर ऐसे हैं जो एनडीए के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।
अभी चुनाव की सुगबुगाहट में सीट पर दावेदारी की लहर काफी तेजी से उठी है। वजह लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद एनडीए में शामिल छोटे दलों की महत्वाकांक्षा बढ़ गई है।।अभी सीट डिमांड से एन डी ए नेतृत्व को जोरदार झटका हिंदुस्तानी आवाम मोर्च (सेक्युलर) की तरफ से मिला है।
पहला झटका केंद्रीय मंत्री और हम के संरक्षक जीतन राम मांझी ने दिया है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने जो बातें की वो एनडीए नेतृत्व को झकझोरने वाली है। मांझी ने साफ कहा कि वैसे तो पार्टी के भीतर चर्चा 40 विधान सभा सीटों पर चुनाव लड़ने को ले कर हुई। पर हम का जो चुनावी प्रदर्शन रहा और पार्टी की जो ताकत वोट बैंक के सहारे है उसके अनुसार कम से कम 20 सीटें तो मिलनी ही चाहिएं। लोकसभा चुनाव में हम का स्ट्राइक रेट 100 फीसदी रहा। यह वे तब कह रहे हैं जब साल 2020 के विधानसभा चुनाव में जीतराम मांझी की पार्टी को सात सीटें मिली थी, जिसमें चार पर जीत मिली थी।
जाहिर है विधानसभा में बेहतर स्थान के लिए और बीजेपी पर सीटों का दबाव बनाने के लिए विधायकों की संख्या भी जरूरी है। इस के लिए मांझी अपना अमोघ अस्त्र दागने की फिराक में हैं। हम के सूत्रों के अनुसार पटना के गांधी मैदान में हम का शक्ति प्रदर्शन होने वाला है। मांझी ने इसके लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी है। कार्यक्रम यह है कि गांधी मैदान को तीन लाख कार्यकर्ताओं के जरिए पाट दिया जाए फिर डिमांड की जाए।
डिमांड को ले कर तो लोजपा की ओर से पहले ही बात आ गई थी कि लोजपा (आर) बिहार विधान सभा चुनाव में 70 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। पर अभी जिससे एनडीए नेतृत्व को सबसे ज्यादा खतरा है वो है केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की टेढ़ी चाल। चिराग पासवान ने सब कुछ जानते हुए कुख्यात रईस ब्रदर्स को पार्टी की सदस्यता दे दी। जानकारों का कहना है कि उनका ये कदम एनडीए की छवि को डैमेज कर गया। जदयू के रणनीतिकारों को यह बात तब और बुरी लगी जब उन्हें मालूम हुआ कि चिराग पासवान ने उस रईस खान ब्रदर को पार्टी में शामिल कराया जिसे नीतीश कुमार ने जदयू में नहीं आने दिया था।
मकरसंक्रांति के इस पर्व के समय एक बड़ी बात यह हुई कि राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष पशुपति पारस ने खुद को एनडीए से अलग माना। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से मिल कर उन्होंने एक अलग ही मैसेज दे दिया। पशुपति पारस के यहां लालू यादव के पहुंचने के यही संदेश गया कि अब पारस लालू के साथ खड़े हैं। ये एनडीए के लिए झटके के जैसी ही है। पशुपति पारस के चुनाव में उतरने से पासवान वोट में विभाजन का खतरा तो साफ दिखने लगा है। वैसे भी लोकजनशक्ति पार्टी के समय रामविलास के चुनावी व्यवस्थापक पशुपति पारस ही हुआ करते थे। चुनावी प्रबंधन में इन्हें महारथ हासिल थी। लालू प्रसाद यादव के साथ पशुपति पारस की राजनीति एक और एक ग्यारह हो गई, तो एनडीए के लिए यह खतरे की घंटी भी हो सकती है।

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