महान क्रांतिकारी और महान दिन

पवन कुमार

आज देश की आजादी के लिए हँसकर फाँसी का फंदा चूमने वाले क्रांतिकारियों भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु का शहादत दिवस है तो वहीं भारतीय समाजवाद के प्रणेता डॉ. राममनोहर लोहिया की जयंती एवं क्रांतिधर्मी पंजाबी कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ का शहादत दिवस भी है। शहीद भगत सिंह ने जिस समाजवादी लोक राज की स्थापना के लिए अपनी शहादत दी थी, उसके लिए डॉ. लोहिया राजनीति और कवि पाश अपनी कविताओं के जरिए अंतिम साँस तक संघर्ष करते रहे।

महात्मा गांधी के कुजात शिष्य डॉ. लोहिया का राजनीतिक जीवन स्वाधीनता आंदोलन से लेकर स्वाधीनता उपरांत साठ के दशक तक फैला है। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के आरम्भ होते ही जिस प्रकार ब्रितानिया हुकूमत ने महात्मा गांधी समेत कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को हिरासत में ले लिया, ऐसे में लोहिया भूमिगत रहते हुए आंदोलन का सफलतापूर्वक संचालन करते हुए ‘अगस्त क्रांति के नायक’ के तौर पर उभरे; गोवा मुक्ति आंदोलन, नेपाली राणाशाही के खिलाफ लोकतंत्र के लिए नेपाली कांग्रेस की स्थापना, अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ गिरफ्तारी एवं अफ्रीकी देशों की स्वतंत्रता के समर्थन ने उनकी विश्व-दृष्टि से विश्व का परिचय कराया। चौखंभा राज, दाम बाँधो नीति, नहर रेट आंदोलन, भारतीय भाषाओं की पक्षधरता, अंग्रेजी हटाओ आंदोलन, जाति तोड़ो आंदोलन, पिछड़ो को विशेष अवसर, नर-नारी समानता, भारत-पाक महासंघ के स्वप्न में घरेलू नीति से लेकर विदेश नीति तक समाजवादी भारत निर्माण के उनके मुकम्मल खाके को देखा जा सकता है। उनकी इस परिकल्पना को उनकी सप्त क्रांति की अवधारणा से स्पष्टतः समझा जा सकता है। डॉ. लोहिया की वैचारिकी को इस तथ्य से बखूबी समझा जा सकता है कि जब सभी नेतागण सरकार बनाने में मशगूल थे, वे महात्मा गांधी के साथ स्वाधीन भारत में विभाजन के दंगों से लगी सांप्रदायिक आग को बुझाते नौआखली, बिहार, दिल्ली में घूम रहे थे।

साइलेंट रिवोल्यूशन (मौन क्रांति) के नायक डॉ. लोहिया ने संसद की जगह सड़क को चुना था। ग्वालियर में रानी बनाम मेहतरानी का चुनाव बनाने का निर्णय हो या फूलपुर लोकसभा में पंडित नेहरू के खिलाफ स्वयं चुनाव लड़ने का दुस्साहस, यह उनके सिवाय कौन ही कर सकता था! सड़क पर उनके जनपक्षधरीय आंदोलनों ने तत्कालीन सरकार को कड़ी चुनौती प्रस्तुत की थी। उनके लघु संसदीय जीवन में संसद की उनकी उत्तेजक बहसों को कौन ही भूल सकता है! ‘तीन आना बनाम बारह आना’ की प्रसिद्ध बहस इसकी मिसाल है। “जब सड़के सूनी हो जाती है तो संसद आवारा हो जाती है”, “जिंदा कौमें पाँच साल इंतजार नहीं करती” जैसे उनके प्रसिद्ध नारें आज भी आमजन को तानाशाह हुकूमतों के खिलाफ संघर्ष को प्रेरित करते हैं।

आज अपने इन पुरखों एवं उनके विचारों को याद करने का दिन है। कवि पाश की ही कविता ‘हम लड़ेगे साथी’ के साथ सभी महापुरुषों को कोटि – कोटि नमन।
___________
“हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े

हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, सवाल नाचता है
सवाल के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी

क़त्ल हुए जज़्बों की क़सम खाकर
बुझी हुई नज़रों की क़सम खाकर
हाथों पर पड़े गाँठों की क़सम खाकर
हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का पेशाब पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता

जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाइयों का गला घोंटने को मज़बूर हैं
कि दफ़्तरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर

हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
जब बन्दूक न हुई, तब तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रूरत होगी

और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए मर जाने वाले की
याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे”

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