बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 64.66% मतदान दर्ज हुआ, जो राज्य के इतिहास का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। यह 2020 के पहले चरण के 57.05% से काफी ज्यादा है और विशेषज्ञों का मानना है कि इतना ऊंचा मतदान प्रतिशत अक्सर सत्ताधारी गठबंधन के खिलाफ असंतोष या विपक्षी लहर का संकेत देता है। नीतीश कुमार की एनडीए सरकार के लिए यह आंकड़ा चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि 20 साल की सत्ता के बाद एंटी-इनकंबेंसी की आशंका बढ़ गई है।
आंकड़ों की गवाही: क्यों बढ़ी नीतीश की टेंशन?
ऐतिहासिक तुलना: बिहार में पहले चरण का मतदान हमेशा कम रहता था, लेकिन इस बार महिलाओं और युवाओं की भारी भागीदारी ने इसे 65% के करीब पहुंचा दिया। 1950 के दशक के बाद ऐसा उच्च टर्नआउट पहली बार हुआ है।
विपक्ष का दावा: आरजेडी-महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने इसे “परिवर्तन की लहर” बताया, जबकि प्रशांत किशोर (जिनकी जन सुराज पार्टी भी मैदान में है) ने साफ कहा, “बदलाव आ रहा है।” उनका तर्क है कि इतना उत्साह सत्ता विरोधी वोटों का प्रतीक है।
एनडीए का पक्ष: जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन ने इसे “अभूतपूर्व उत्साह” करार देते हुए कहा कि यह 2010 के रिकॉर्ड से बेहतर नतीजे का संकेत है, खासकर महिलाओं के मतदान से। सोशल मीडिया पर भी कुछ एनडीए समर्थक (जैसे प्रदीप भंडारी) इसे प्रो-इनकंबेंसी का सबूत बता रहे हैं।
संभावित प्रभाव: सरकार बदलने का खतरा?
बिहार की 243 सीटों पर दूसरे चरण का मतदान 11 नवंबर को है, और नतीजे 23 नवंबर को। एनडीए (जेडीयू-बीजेपी) 225 सीटों का लक्ष्य लेकर उतरी है, लेकिन आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन 100+ सीटें जीतने का दावा कर रहा है। हाई टर्नआउट से:
विपक्ष को फायदा: ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी, महंगाई और पलायन जैसे मुद्दों पर असंतोष बढ़ा है। नीतीश की दुविधा: 20 साल की सत्ता, बार-बार गठबंधन बदलने (2015, 2017, 2022) से “पलटू राम” की छवि बनी है। अगर हार हुई, तो बीजेपी के साथ उनका गठबंधन टूट सकता है।






