“राजतंत्र प्राइवेट लिमिटेड” — एक व्यंग्यात्मक कहानी

एक देश था। नाम था — लोकतंत्रपुर। कागज़ पर वहां लोकतंत्र था, संविधान था, चुनाव था, भाषण था, टीवी डिबेट था, और हर पांच साल पर “युवा शक्ति” का महोत्सव भी होता था। लेकिन असली सत्ता एक अद्भुत जीव के पास थी — “नेता पुत्र प्रजाति”। इस प्रजाति की सबसे बड़ी खासियत थी कि यह कभी प्रतियोगी परीक्षा नहीं देती थी, फिर भी हर बड़ी कुर्सी पर पहुंच जाती थी। उधर देश का असली युवा सुबह 5 बजे उठता था। एक हाथ में एडमिट कार्ड। दूसरे हाथ में मां का दिया टिफिन। जेब में कुल 120 रुपये। उसमें भी 40 रुपये वापसी के ऑटो के लिए बचाने होते थे। इसलिए वह रोज 8 किलोमीटर पैदल कोचिंग जाता था।

कोचिंग के बाहर बड़े-बड़े पोस्टर लगे रहते:
“सिर्फ मेहनत करो, सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी।”
अंदर मास्टर साहब पढ़ाते: “बच्चों, भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां हर व्यक्ति को बराबर अवसर प्राप्त है।” इतना सुनते ही पीछे बैठा पप्पू हल्का सा मुस्कुराया।
क्योंकि उसी सुबह उसने खबर पढ़ी थी कि किसी बड़े नेता का बेटा सीधे किसी बोर्ड का चेयरमैन बन गया है। पप्पू ने हाथ उठाकर पूछा: “सर, बराबर अवसर वाला चैप्टर सिलेबस में है या सिर्फ भाषण में?” पूरी क्लास हंस पड़ी। मास्टर साहब ने तुरंत विषय बदल दिया।

उधर राजधानी में “युवा सम्मान सम्मेलन” चल रहा था। मंच पर पांच बड़े नेता बैठे थे। सभी के पीछे स्लोगन लिखा था:
“परिवारवाद खत्म करेंगे।”
और मजेदार बात यह थी कि मंच पर बैठे पांचों नेताओं के बेटे पहली लाइन में VIP पास लेकर बैठे थे। एक नेता बोले: “देश का युवा मेहनत नहीं करना चाहता।”
उसी समय उनका बेटा बिजनेस क्लास फ्लाइट से उतरकर सीधे क्रिकेट बोर्ड की मीटिंग में पहुंचा। दूसरे नेता बोले: “आज का नौजवान सिर्फ मोबाइल चलाता है।”
उधर उनका बेटा इंस्टाग्राम पर दुबई से फोटो डाल रहा था: “हार्ड वर्क पेज ऑफ।” तीसरे नेता बोले: “देश में अवसरों की कोई कमी नहीं है।” सामने बैठा बेरोजगार लड़का सोच रहा था: “सही बात है… अवसरों की कमी नहीं, बस हमारा नंबर कभी नहीं आता।”

लोकतंत्रपुर में दो तरह के बच्चे पैदा होते थे। पहला — आम परिवार का बच्चा।
जन्म लेते ही उसे कहा जाता:
“बेटा पढ़ लो, तभी कुछ बनोगे।”
दूसरा — नेता परिवार का बच्चा।
उसे कहा जाता:
“बेटा चिंता मत करो, कुछ न कुछ बना ही देंगे।”
पहले बच्चे का बचपन ट्यूशन, परीक्षा और कटऑफ में निकल जाता।
दूसरे बच्चे का बचपन स्विट्जरलैंड, लंदन और VIP लाउंज में। पहला बच्चा रेलवे की परीक्षा देता। पेपर लीक हो जाता। दूसरा बच्चा बोर्ड का डायरेक्टर बन जाता।
किसी को मेरिट याद नहीं रहती।

देश का युवा फॉर्म भरता रहा। रेलवे, एसएससी, यूपीएससी, पुलिस, आर्मी, क्लर्क,
पटवारी का। हर साल एक नया फॉर्म। हर फॉर्म के साथ नई फीस। हर फीस के साथ नया सपना। हर सपने के साथ नया पेपर लीक।

सरकार ने कहा: “तकनीकी गड़बड़ी थी।” युवा ने पूछा: “सर, गड़बड़ी सिस्टम में है या नीयत में?” सरकार ने जवाब नहीं दिया। क्योंकि उस समय वह “विश्वगुरु सम्मेलन” में व्यस्त थी।

इधर टीवी एंकर रात 9 बजे चिल्ला रहा था:
“देश खतरे में है!”
बेरोजगार लड़का घबरा गया।
उसने पूछा: “किससे?”
एंकर बोला: “तुम्हारे पड़ोसी धर्म से!”
लड़के ने राहत की सांस ली।
उसे लगा अच्छा है, बेरोजगारी, पेपर लीक और महंगाई अभी खतरा नहीं माने जाते।
धीरे-धीरे देश का युवा समझदार होने लगा। उसे समझ आया कि जिस लड़के को बचपन से वीआईपी गेट मिले हों, उसे संघर्ष मोटिवेशनल वीडियो में ही अच्छा लगता है। जिसने कभी रेलवे स्टेशन पर जनरल टिकट न लिया हो, वह “गरीबों की पीड़ा” पर सबसे लंबा भाषण देता है। जिसे बिना परीक्षा कुर्सी मिली हो, वह मेरिट पर सबसे ज्यादा ज्ञान देता है।

एक दिन पप्पू ने अपने कमरे की दीवार से नेताओं के पोस्टर उतार दिए।
दोस्त बोला: “भाई, क्रांति करेगा क्या?”
पप्पू बोला: “नहीं। बस पहली बार नेता की फोटो हटाकर उसके परिवार का पूरा नेटवर्क पढ़ रहा हूं।” उस दिन पहली बार उसे समझ आया कि राजनीति सिर्फ भाषण नहीं, विरासत का बिजनेस भी बन चुकी है। फिर एक अजीब घटना हुई।
देश का युवा धर्म पर लड़ना थोड़ा कम करने लगा। जाति पर बहस थोड़ी कम करने लगा। और सवाल थोड़ा ज्यादा पूछने लगा।
“नेता जी, आपके बेटे की पहली नौकरी क्या थी?”
“नेता जी, आपके परिवार की संपत्ति कितनी बढ़ी?”
“नेता जी, आपका बच्चा किस परीक्षा से यहां पहुंचा?”
बस…
यहीं से सत्ता घबराने लगी।
क्योंकि लोकतंत्रपुर में सबसे खतरनाक चीज बेरोजगार युवा नहीं था।
सबसे खतरनाक चीज था —
सवाल पूछता हुआ युवा।

नीरज कुमार
(लेखक युवा सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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