नीतीश पर भारी पड़ रही तेजस्वी की लोकप्रियता
नीतीश कुमार के अनुभव को ढक दे रही हैं उनकी उजुल फिजूल हरकतें
जातीय जनगणना के नाम पर बढ़त लेने की फ़िराक में एनडीए
तेजस्वी यादव (RJD)
लोकप्रियता: हाल के सर्वे (जैसे C-Voter) में तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे पसंदीदा उम्मीदवार के रूप में उभरे हैं, जिन्हें 36-41% लोगों का समर्थन प्राप्त है।
युवा अपील : तेजस्वी ने बेरोजगारी, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को उठाकर युवा मतदाताओं को आकर्षित किया है। उनकी “कमाई, दवाई, पढ़ाई” रणनीति 2020 में प्रभावी रही थी।
संगठनात्मक ताकत: RJD ने संगठन को मजबूत करने के लिए “62 मेंबर प्रति बूथ” जैसे लक्ष्य निर्धारित किए हैं, जिससे उनकी जमीनी पकड़ बढ़ रही है।
वोट बैंक: यादव और मुस्लिम (M-Y) समुदाय का पारंपरिक समर्थन RJD के पक्ष में है। हाल ही में वैश्य समाज जैसे अन्य समुदायों को भी जोड़ने की कोशिश हो रही है।
चुनौतियाँ:
RJD को महागठबंधन में कांग्रेस और अन्य सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे में तनाव का सामना करना पड़ सकता है।
नीतीश के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी को भुनाने में विफलता, जैसा कि 2020 में देखा गया।
प्रशांत किशोर और कन्हैया जैसे नए चेहरों से युवा वोटों का बंटवारा।
नीतीश कुमार (JDU)
अनुभव और गठबंधन: नीतीश बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं और JDU-BJP गठबंधन (NDA) की ताकत का लाभ उठाते हैं। सर्वे में NDA को 46% वोट शेयर की संभावना है।
वोट बैंक: नीतीश का कुर्मी, कोइरी, महादलित और महिला मतदाताओं में मजबूत आधार है। उनकी प्रगति यात्रा और विकास कार्य अभी भी प्रभावी हैं।
राजनीतिक रणनीति: नीतीश की गठबंधन बदलने की क्षमता और जातिगत समीकरणों को साधने की कला उन्हें मजबूत बनाती है।
चुनौतियाँ:
स्वास्थ्य और उम्र: प्रशांत किशोर ने नीतीश के स्वास्थ्य पर सवाल उठाए हैं, जिससे उनकी छवि प्रभावित हो सकती है।
एंटी-इनकंबेंसी: लंबे शासन के कारण जनता में असंतोष, खासकर बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों पर।
प्रशांत किशोर (जन सुराज)
युवा और मध्यम वर्ग: उनकी पदयात्रा और बेरोजगारी-पलायन जैसे मुद्दों ने युवाओं और मध्यम वर्ग को आकर्षित किया है। सर्वे में उन्हें 14.9-17% समर्थन मिला।
रणनीतिक कौशल: एक अनुभवी चुनावी रणनीतिकार के रूप में, प्रशांत के पास डेटा और संगठन को मजबूत करने की क्षमता है।
चुनौतियाँ:
सीमित जनाधार: जन सुराज अभी नई पार्टी है और इसका कोई मजबूत वोट बैंक नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि यह अन्य दलों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन खुद जीतने के लिए लंबा संघर्ष जरूरी है।
तेजस्वी के साथ टकराव: तेजस्वी और प्रशांत एक-दूसरे पर हमलावर हैं, जिससे युवा वोट बंट सकता है।
BJP समर्थन का आरोप: तेजस्वी ने प्रशांत पर BJP के लिए काम करने का आरोप लगाया, जो उनकी छवि को नुकसान पहुंचा सकता है।
कन्हैया कुमार (कांग्रेस)
युवा चेहरा: कन्हैया ने “पलायन रोको-नौकरी दो” पदयात्रा के जरिए बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दों को उठाया है, जो युवाओं को आकर्षित कर रहा है।
राष्ट्रीय प्रोफाइल: JNU छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष के रूप में उनकी राष्ट्रीय पहचान कांग्रेस के लिए फायदेमंद है।
कांग्रेस की रणनीति: कांग्रेस कन्हैया को तेजस्वी के विकल्प के रूप में पेश कर रही है, खासकर RJD की छाया से निकलने के लिए।
चुनौतियाँ:
RJD के साथ तनाव: RJD ने कन्हैया की सक्रियता को सीमित करने की कोशिश की है, जिससे महागठबंधन में खटास आ सकती है।
चुनावी अनुभव: कन्हैया को 2019 में बेगूसराय से हार का सामना करना पड़ा था, जिससे उनकी जीत की क्षमता पर सवाल उठते हैं।
तुलनात्मक विश्लेषण
जातिगत समीकरण: नीतीश और तेजस्वी के पास मजबूत जातिगत आधार है (कुर्मी-कोइरी बनाम यादव-मुस्लिम), जबकि प्रशांत और कन्हैया जाति से ऊपर उठकर विकास पर जोर दे रहे हैं, जो मध्यम वर्ग और युवाओं को आकर्षित कर सकता है।
संगठन और गठबंधन: नीतीश को NDA और तेजस्वी को महागठबंधन का समर्थन है, जो उन्हें मजबूत बनाता है। प्रशांत की जन सुराज और कांग्रेस (कन्हैया) अभी संगठनात्मक रूप से कमजोर हैं। युवा वोट: तेजस्वी, प्रशांत और कन्हैया तीनों युवा वोटों को लक्षित कर रहे हैं, जिससे इस वर्ग का बंटवारा हो सकता है। चिराग पासवान ने लोकसभा चुनाव में सभी सीटें जीती हैं। ऐसे में वह भी चुनाव में बड़ा चेहरा माने जा रहे हैं।
बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव फिलहाल सबसे आगे दिख रहे हैं, लेकिन नीतीश की गठबंधन रणनीति और प्रशांत की नई अपील समीकरण बदल सकती है। कन्हैया की भूमिका अभी सहायक या प्रतीकात्मक है, लेकिन उनकी सक्रियता कांग्रेस को मजबूत कर सकती है। अंतिम परिणाम गठबंधन, जातिगत समीकरण और युवा वोटों के बंटवारे पर निर्भर करेगा।

