जबीं ख़ुदा ने अपने सिज़दे के लिए मुकर्रर कर दी
मेरी इबादत का सबूत मेरी जबीं पर है
मेरी देशभक्ति का निशान मेरे वतन की मिट्टी पर है
ये निशानात एक दिन का सरमाया नहीं हैं सालों तक ज़मीन पर घिस घिस कर बने हैं
मेरी देशभक्ति का सबूत मांगा जाता है
मुझसे राष्ट्रीय गान सुनने आती है भीड़
मीडीयोकर मेरे मुंह में माइक ठूंसकर कहता है
वंदेमातरम् सुनाओ
मेरी शिक्षा मदरसे में नहीं स्कूल में हुई है
मैंने कभी नहीं गायी अल्लमा इक़बाल की नज़्में
मैं स्कूल में सुबह सुबह प्रार्थना में हाथ जोड़कर गाती थी
“हे शारदे मां हे शारदे मां…!”
मैं गाती थी वंदेमातरम्
सावधान मुद्रा में मैं गाती थी राष्ट्रीय गान
मेरा बाप मज़दूर था
मज़दूरी करके घर आता उसकी हड्डियां दुखती थीं
वो थक कर सो जाता ईशा की नमाज़ भी नहीं पढ़ पाता
उसने हड्डियों को दुखा दुखा कर हमें स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी भेजा
पूंजीवादी व्यवस्था ने मेरी और मेरे बाप की सारी मेहनत तबाह कर दी
मैं और मेरे आगे की तमाम नशलें जो सवाल करते हैं
पूंजीवादी व्यवस्था से फांसीवदी साम्प्रदायिक ताकतों से
हम सबकी जबीं पर दिमाग़ी नक्सल, टुकड़ा टुकड़ा गैंग, देशद्रोही का टेग लगा दिया गया है
हमारे हिस्से में होम्योपैथ की गोलियां हैं
मैंने बिंदी कभी नहीं लगाई
मैंने अपनी जबीं दो ही निशान के लिए बचाकर रखी हमेशा
मेरी जबीं पर नमाज़ के निशा की जगह अगर कोई दूसरा निशान हो सकता था तो वो तुम्हारे बोसे का होना चाहिए था
तुम्हारे मेरे बीच दीवारें हैं
पितृसत्ता की, धार्मिक कट्टरता की, आर्थिक ग़ैरबराबरी की
मेरी जबीं बोसे का इंतज़ार करती रही
मैंने अपने वतन की मिट्टी में शामिल कर दी है अपनी खुशबू
जब मींह बरसता है मेरे वतन की मिट्टी पर
मेरे रोम-रोम में समा जाती है मिट्टी की बू
और ख़ला में उडोती फिरती है मेरे सिजोदों की खुशबू !!
मेहजबीं






