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शोषण और दमन की पराकाष्ठा होने पर फूटा श्रमिकों का गुस्सा, तेज करनी होगी हक हकूक की लड़ाई, स्कूलों और मीडिया में भी खुल सकता है मोर्चा!

चरण सिंह 
नोएडा में ऐसे ही श्रमिकों का गुस्सा नहीं फूटा है। जब शोषण और दमन की पराकाष्ठा हो गई तब यह गुस्सा सड़कों पर आया है। नोएडा में चाहे फैक्ट्री हो, स्कूल हों, मीडिया हो या फिर दूसरे ऑफिस शोषण की पराकाष्ठा है। सबसे अधिक शोषण तो उस मीडिया में है जो दूसरों के हक़ हकूक की आवाज को उठाने दम्भ भरता है। सेक्टर 3 स्थित डीएलसी ऑफिस से भी श्रमिकों को कोई फायदा नहीं हो रहा है। डीएलसी ऑफिस भी मालिक जिला प्रशासन से मिलकर श्रमिकों का जमकर शोषण करते हैं।
निजी कंपनियों का हाल यह है कि कर्मचारी को जब चाहा निकाल दिया। कई कई घंटे काम लिया जाता है। ओवर टाइम तो लगभग ख़त्म ही हो गया है। स्थिति यह है अधिकतर श्रमिक  8-10-12 हजार रुपए प्रतिमाह की नौकरी करने को मजबूर हैं। और तो छोड़ दीजिये। मीडिया हाउस दैनिक जागरण, हिंदुस्तान और राष्ट्रीय सहारा में कितने पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी निकाल दिए गए। लंबे समय बात भी हिसाब नहीं मिला है। राष्ट्रीय सहारा में तो आज की तारीख में भी आंदोलन चल रहा है। गत 7 अप्रैल को सेक्टर 11 स्थित सहारा परिसर की नीलामी होनी  थी पर नहीं हो पाई। समझ लीजिये बिना वेतन के इन साथियों का खर्चा कैसे चल रहा होगा ?
दरअसल नोएडा ही नहीं पूरे देश का हाल यही है। राजनेता, ब्यूरोक्रेट्स और पूंजीपतियों का गठजोड़ तोड़ना बहुत जरूरी है। देश को यह गठबंधन दोनों हाथों से लूट रहा है। देश और समाज के लिए सड़कों पर उतरना ही होगा। देश हित में युवा क्रांति जरूरी है। देश और समाज का भला चाहते हो तो सिस्टम को बदलना ही होगा।
दरअसल नोएडा में सेक्टर 59, 60, 62 और फेज-2 में फैक्ट्री कर्मचारियों का उग्र प्रदर्शन देखने को मिला है। वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हिंसा, पत्थरबाजी और आगजनी की बात सामने आई हैं। नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों (खासकर फेज-2 के होजरी कॉम्प्लेक्स, सेक्टर 59-60-62) में हजारों फैक्ट्री वर्कर्स (मुख्यतः टेक्सटाइल/एक्सपोर्ट यूनिट्स, Motherson Group आदि) का प्रदर्शन हिंसक हो गया। यह आंदोलन 3-4 दिनों से चल रहा था और आज सुबह उग्र रूप ले लिया।
नोएडा आंदोलन से समझना होगा कि जब मजदूर हक़ की आवाज उठाता है तो नेताओं की जाति और धर्म की राजनीति नहीं चलती है। नोएडा में मजदूरों की एकता इसलिए दिखाई दी क्योंकि जाति और धर्म से ऊपर उठकर यह लड़ाई लड़ी जा रही है। लोग माने या न माने नेपाल क्रांति का असर देश के लोगों पर भी पड़ रहा है। यदि सिस्टम में सुधार न हुआ तो नेपाल क्रांति की तर्ज पर हमारे देश में क्रांति हो सकती है।
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