चरण सिंह
देश के आजाद होने के बाद सभी दलों ने दलितों को वोट बैंक के रूप में तो इस्तेमाल किया पर कोई पार्टी किसी दलित नेता को प्रधानमंत्री न बना सकी। 2024 के इन चुनाव में इंडिया ब्लॉक की ओर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। मार्केट में चर्चा है कि यदि इंडिया ब्लॉक की सरकार बनती है तो इंडिया गठबंधन के सभी दलों की मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम पर प्रधानमंत्री पद पर सहमति बन सकती है। विपक्ष के नेता भले ही राहुल गांधी माने जा रहे हों पर सरकार बनने की स्थिति में खुद राहुल गांधी मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए पेश कर सकते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि यह काम एनडीए क्यों नहीं करता ? खुद प्रधानमंत्री आगे बढ़कर इस ओर पहल क्यों नहीं करते ? मोदी किसी दलित को प्रधानमंत्री बनाकर इतिहास क्यों रच देते ?

यदि इंडिया गठबंधन में मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चल रहा है तो एनडीए की सरकार बनने पर किसी दलित नेता को प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया जा सकता है ? नरेन्द्र मोदी जब बड़े से बड़े नेता को दरकिनार कर आम कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री बना रहे हैं तो फिर प्रधानमंत्री पद पर ऐसा क्यों नहीं करते ? खुद ही किसी दलित को प्रधानमंत्री बनाने की पहल क्यों नहीं करते ? बड़े से बड़ा संदेश देने में माहिर माने जाने वाले प्रधानमंत्री देश में अब तक सबसे बड़ा संदेश क्यों नहीं देते ? एनडीए की सरकार बनने पर यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद आगे बढ़कर किसी दलित नेता को प्रधानमंत्री बना दिया तो अब तक सभी दलों के लिए उनका यह संदेश एक बड़ी नसीहत होगी।
यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतिम चरण से पहले यह घोषणा कर दें कि एनडीए की सरकार बनने पर दलित नेता को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा। ऐसी स्थिति में एनडीए को सातवें चरण में भी बढ़त हासिल हो जाएगी। कहना गलत न होगा कि हर दल को दलितों को वोट तो चाहिए पर दलित नेता को प्रधानमंत्री बनवाने में बड़े प्रयासों का देश की राजनीति में घोर अभाव रहा है। बाबू जगजीवन राम देश का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। पाकिस्तान से हुए 1971 के युद्ध में बाबू जगजीवन राम देश के रक्षा मंत्री थे। हरित क्रांति के दौरान बाबू जगजीवन राम देश के कृषि मंत्री थे पर कांग्रेस ने उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाया। इमरजेंसी के विरोध में जब कांग्रेस से बगावत कर जब जगजीवन राम जनता पार्टी में शामिल हुए तब भी उनके साथ यही हुआ।

दरअसल इमरजेंसी के बाद बाबू जगजीवन राम ने इंदिरा गांधी से नाराज होकर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नाम से अलग पार्टी बना ली थी। इमरजेंसी के बाद देश में हुड बड़े आंदोलन के बाद जब 1977 में लोकसभा चुनाव हुए तो बाबू जगजीवन राम की पार्टी को 28 सीटें मिली। जनता पार्टी को बहुमत मिलने के बाद बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार थे। पर इमरजेंसी के पक्ष में दिया गया उनका एक भाषण उनके और प्रधानमंत्री पद के बीच में आ गया। लोकनायक जयप्रकाश ने मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनवा दिया। तब नाराज होकर बाबू जगजीवन राम शपथ ग्रहण समारोह में भी नहीं गये थे।
हालांकि बाद में लोकनायक जयप्रकाश और तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें मना लिया। ऐसे ही मोरारजी देसाई सरकार गिरने के बाद 1979 में जब बाबू जगजीवन राम का प्रधानमंत्री बनने का नंबर आया तो चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बन गये बाबू जगजीवन राम को उप प्रधानमंत्री पद पर संतोष करना पड़ा। कुछ दिन बाद ही चौधरी चरण के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद जब जगजीवन राम ने सरकार बनाने का दावा पेश करना चाहा तो तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीवन रेड्डी ने उन्हें यह मौका नहीं दिया। 1980 में बाबू जगजीवन राम के चेहरे पर जनता पार्टी ने चुनाव लड़ा पर जनता ने जनता पार्टी को नकार दिया और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। तब बाबू जगजीवन राम ने कहा था कि दलितों के साथ ऐसे ही अन्याय किया जाता है।
2009 में बसपा मुखिया मायावती के लिए भी प्रधानमंत्री बनने का मौका था। दरअसल 2008 में वामपंथी नेता प्रकाश करात और मायावती की एक गुप्त बैठक हुई थी। उस समय वामपंथियों के पास 59 तो बसपा के पास 19 सीटें थी। तब प्रकाश करात और मायावती के बीच डील हुई थी कि यदि बसपा 2009 के चुनाव में 50 सीटें ले आती हैं और वामपंथियों का प्रदर्शन इसी तरह से बरकरार रहा तो मायावती को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा। तब मायावती ने कहा था कि अब उन्हें प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता है पर ऐसा हो न सका। अब फिर से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम प्रधानमंत्री पद की दौड़ में चल रहा है अब देखना होगा कि इस बार कोई दलित प्रधानमंत्री है या फिर पहले की तरह दलित नेता का नाम पीछे चला जाता है।







