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असली मर्द कौन? जमुई की घटना से उठता बड़ा सवाल

जमुई की घटना ने एक बड़ा सवाल समाज के सामने खड़ा कर दिया है—आखिर असली मर्द कौन है? मर्द वह नहीं, जो अपनी ताकत का इस्तेमाल किसी कमजोर, असहाय या बेबस व्यक्ति को छेड़ने और उसका अपमान करने में करे। असली मर्द वह है, जो सामने वाले की मजबूरी में अपनी ताकत नहीं, अपना संस्कार दिखाए।*17 साल के उस लड़के ने यह संदेश दिया कि उम्र छोटी हो सकती है, लेकिन *हिम्मत, संवेदना और संस्कार उम्र के मोहताज नहीं होते।*किसी की मजबूरी का फायदा उठाना बहादुरी नहीं, बल्कि चरित्र की कमजोरी है। *जो किसी की ‘ना’ का सम्मान करे, जो गलत होते देखकर आवाज उठाए, जो कमजोर की रक्षा करे—वही असली मर्द है। मर्दानगी शरीर की ताकत में नहीं, *नज़र की पवित्रता, व्यवहार की मर्यादा और चरित्र की मजबूती में होती है।*किसी महिला या कमजोर व्यक्ति को ‘बैड टच’ करना मर्दानगी नहीं—यह उसकी गरिमा का अपमान है।
समाज को अपने बेटों को सिर्फ ताकतवर बनाना नहीं, *जिम्मेदार, संवेदनशील और संस्कारी इंसान बनाना भी सिखाना होगा।*क्योंकि असली मर्द किसी बेबस को नहीं दबाता,
वह उसकी ढाल बनता है।—समाज में हम अक्सर मर्दानगी को ताकत, दबदबे और शारीरिक सामर्थ्य से जोड़कर देखते हैं। बचपन से लड़कों से कहा जाता है—“मर्द बनो”, “कमजोर मत पड़ो”, “डरना मत।” लेकिन क्या हमने कभी अपने बेटों को यह समझाया कि *असली मर्दानगी किसी कमजोर पर अपनी ताकत दिखाने में नहीं, बल्कि अपनी ताकत पर नियंत्रण रखने में है?- जमुई की घटना ने इसी सवाल को हमारे सामने खड़ा कर दिया है। इस घटना से जुड़ी रिपोर्टों और सामने आए विवरणों पर बहस अपनी जगह है, लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश जरूर निकलता है—किसी लड़की, महिला या किसी भी असहाय व्यक्ति की मजबूरी का फायदा उठाना मर्दानगी नहीं है।- मर्द वह नहीं जो किसी को डराकर अपनी ताकत साबित करे। मर्द वह है जो सामने वाले की असहाय स्थिति में भी उसकी गरिमा का सम्मान करे।
उम्र छोटी, सोच बड़ी—17 साल की उम्र को हम अक्सर बचपन और किशोरावस्था के बीच की उम्र मानते हैं। लेकिन कभी-कभी इसी उम्र का कोई बच्चा ऐसा काम कर जाता है जो बड़े-बड़े लोगों के लिए भी आईना बन जाता है। यदि एक 17 वर्षीय लड़का किसी असहाय व्यक्ति की मदद के लिए खड़ा होता है, गलत के सामने आवाज उठाता है और जोखिम के बावजूद इंसानियत को चुनता है, तो वह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि बड़ा शरीर होना और बड़ा इंसान होना—दो अलग बातें हैं।-किसी की मदद करने के लिए उम्र नहीं, संवेदना चाहिए। गलत का विरोध करने के लिए केवल ताकत नहीं, चरित्र चाहिए। और चरित्र उम्र देखकर नहीं आता। किसी की मजबूरी आपकी आजादी नहीं—समाज में एक खतरनाक सोच धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है—कि अगर कोई व्यक्ति कमजोर है, अकेला है या विरोध करने की स्थिति में नहीं है तो उसके साथ मनमाना व्यवहार किया जा सकता है। यहीं से अपराध की शुरुआत होती है। किसी महिला का चुप रहना उसकी सहमति नहीं है। किसी का डर जाना उसकी अनुमति नहीं है। किसी की मजबूरी किसी दूसरे व्यक्ति को उसकी सीमा लांघने का अधिकार नहीं देती।
ना’ का सम्मान करना संस्कार है और बिना सहमति किसी को छूना उसकी गरिमा का उल्लंघन। यह बात हमें अपने बेटों को बचपन से सिखानी होगी।
मर्दानगी की गलत परिभाषा बदलनी होगी-हमने लड़कों को ताकतवर बनने की शिक्षा तो दी, लेकिन कई बार यह नहीं सिखाया कि ताकत का सही इस्तेमाल कैसे किया जाता है। हमने कहा—“रोना मत, तुम लड़के हो।”- लेकिन हमें कहना चाहिए— “जरूरत पड़े तो रो सकते हो, लेकिन किसी को रुलाना मत।”—हमने कहा—“कमजोर मत बनो।” हमें कहना चाहिए—*“कमजोर की कमजोरी का फायदा मत उठाना।”— हमने कहा—“अपनी इज्जत बचाना।”
हमें यह भी कहना होगा—“दूसरे की इज्जत का सम्मान करना भी तुम्हारी जिम्मेदारी है।”—यही शिक्षा एक लड़के को केवल पुरुष नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनाती है।
असली बहादुरी क्या है?—किसी से जबरदस्ती करना आसान हो सकता है, खासकर तब जब सामने वाला विरोध करने की स्थिति में न हो। लेकिन अपनी इच्छा, क्रोध और वासना पर नियंत्रण रखना कहीं बड़ी ताकत है।
जिसके हाथ में ताकत हो और वह उसका गलत इस्तेमाल न करे—वही मजबूत है। जिसे मौका मिले और फिर भी वह मर्यादा न छोड़े—वही संस्कारी है। जिसे गलत दिखाई दे और वह चुप न रहे—वही साहसी है। और जो किसी असहाय की रक्षा के लिए खड़ा हो जाए—वही इंसानियत का परिचय देता है।
‘छेड़छाड़’ शब्द को हल्का मत बनाइए—हमारे समाज में एक और गंभीर समस्या है। हम कई बार गंभीर घटनाओं को “छेड़छाड़”, “मजाक” या “लड़कों की गलती” कहकर छोटा कर देते हैं। लेकिन किसी की इच्छा के विरुद्ध किया गया स्पर्श मजाक नहीं है। किसी को असहज करना सामान्य व्यवहार नहीं है। किसी की गरिमा को ठेस पहुँचाना “लड़कों की शरारत” कहकर टाल देना समस्या को और बढ़ाता है। हर बच्चे को यह समझना होगा कि व्यक्तिगत सीमा और सहमति का सम्मान करना अनिवार्य है।—*माँ-बाप की जिम्मेदारी-बच्चों को केवल अच्छे अंक, अच्छी नौकरी और सफलता के लिए तैयार करना पर्याप्त नहीं है।
माता-पिता को अपने बेटों से भी उतनी ही गंभीरता से बात करनी चाहिए जितनी बेटियों से करते हैं।
बेटी से कहा जाता है—“सावधान रहना।” अब बेटे से भी कहा जाना चाहिए—“किसी को असहज मत करना।”-बेटी को सिखाया जाता है—“अपनी सीमा पहचानो।”
बेटे को भी सिखाना होगा—“दूसरे की सीमा पहचानो।”-बेटी को ‘ना’ कहना सिखाना जरूरी है, लेकिन बेटे को ना’ स्वीकार करना सिखाना उससे कम जरूरी नहीं।
हीरो वह नहीं जो डर पैदा करे—फिल्मों और समाज में भी हमें कभी-कभी ऐसे पुरुष पात्र दिखाई देते हैं जिन्हें आक्रामकता और दबदबे के कारण “हीरो” बनाया जाता है। लेकिन वास्तविक जीवन में हीरो वह नहीं जो दूसरों को डराए। हीरो वह है जो किसी डरते हुए व्यक्ति के साथ खड़ा हो।
हीरो वह है जो गलत को देखकर कहे—“यह गलत है।”*—हीरो वह है जो अपने सामने किसी कमजोर का अपमान होते देखकर अपनी आवाज उठाए। और हीरो वह है जो अपनी ताकत का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए करे, शोषण के लिए नहीं।
एक 17 वर्षीय लड़का समाज के लिए आईना—जमुई की घटना को केवल एक स्थानीय घटना मानकर भूल जाना आसान होगा। लेकिन इससे उठने वाले सवाल बहुत बड़े हैं। अगर एक 17 वर्षीय लड़का हमें साहस, संवेदना और इंसानियत का अर्थ समझा सकता है, तो हमें अपने आसपास के उन सभी व्यवहारों पर दोबारा विचार करना चाहिए जिन्हें हम वर्षों से “मर्दानगी” का नाम देते आए हैं। मर्दानगी किसी को दबाने में नहीं, खुद पर नियंत्रण रखने में है।-मर्दानगी किसी बेबस को छूने में नहीं, उसकी सुरक्षा करने में है। मर्दानगी किसी महिला की सीमा तोड़ने में नहीं, उसकी सीमा का सम्मान करने में है। मर्दानगी अपनी ताकत दिखाने में नहीं, जरूरतमंद के लिए अपनी ताकत इस्तेमाल करने में है।
अब बेटों को एक नई शिक्षा देने का समय है—हमें अपने बेटों से कहना होगा— किसी लड़की का पीछा करना प्रेम नहीं है। किसी की चुप्पी सहमति नहीं है। किसी की मजबूरी अवसर नहीं है। किसी की असहायता आपकी ताकत दिखाने का मौका नहीं है। और किसी की रक्षा के लिए खड़े होना कमजोरी नहीं—इंसानियत की सबसे बड़ी ताकत है।*आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बेटों को सिर्फ सफल पुरुष नहीं, *सम्मान करना जानने वाला पुरुष बनाएं। क्योंकि अंततः समाज को ऐसे पुरुषों की जरूरत है जिनसे महिलाएँ डरें नहीं, बल्कि सुरक्षित महसूस करें। *असली मर्द वह नहीं जो किसी कमजोर को अपनी ताकत का एहसास कराए; असली मर्द वह है जिसके सामने कमजोर भी खुद को सुरक्षित महसूस करे।*और शायद यही वह मर्दानगी है जिसकी आज हमारे समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है।
ऊषा शुक्ला

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