हालांकि अधिकतर लोग इन्हें दिल्ली का पत्रकार जो हिंदी और इंग्लिश मैं दिल्ली शहर के हर मौजू पर परत दर परत आंखों देखा, उसके पुराने दस्तावेजों को खंगालता, पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में, जर्जर हवेलियां की टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों पर चढ़कर उम्र दराज उन हस्तियों से गुजरे जमाने के मंजर, हादसों, तवारीख के पुराने पन्नों को उलटते पुलटते गुफ्तगू कर लिखता रहता है, मेरी नजर में वह केवल पत्रकार ही नहीं, मुकम्मल एक इतिहासकार है। भारत-पाक तक्सीम के वक्त विवेक शुक्ला के पुरखे पाकिस्तान के रावलपिंडी में अपना सब कुछ गंवा कर हिंदुस्तान की अनजानी बस्ती के बासींदा बने थे। बचपन में ही अपने घरवालों से मजहब के नाम पर हुई उस कत्लोंगैरत की कहानी उन्होंने सुनी थी। परंतु गांधी की परंपरा में पनपे संस्कारों ने कभी सांप्रदायिकता का असर उनपर होने नहीं दिया।
‘बंटवारे’ पर लिखी उनकी पुस्तक जो आ रही है उसको किसी भी मानवीय करुणा से भरे इंसान को पढ़ना जहां एक तरफ अपने आंसुओं से तरबतर होना है वही इतिहास के गर्भ में छुपे हुए अनेकों अनजान वाक्यात से वाकिफ होना भी है। पुस्तक के एक अंश को प्रस्तुत कर रहा हूं।
दिल्ली जंक्शन पर रेलों और मुसाफिरों के कभी न रुकने वाला सिलसिला चल रहा है। स्टेशन के अंदर ट्रेनों के आने-जाने संबंधी सूचनाएं दी जा रही हैं। कूली मुसाफिरों की अटैची और उनका दूसरा सामान सिर, हाथ और कंधे पर उठाकर आगे बढ़ रहे हैं। कुछ लोग अपने करीबियों को विदा करते हुए उनके चरणस्पर्श कर रहे हैं।
दिल्ली में गुजरे 75 सालों में दर्जनों फ्लाईओवर बने, मेट्रो रेल चलने लगी, जगह-जगह मॉल्स खुल गए। पर दिल्ली जंक्शन कमोबेश जैसा 1947 के समय था, वह वैसा ही अब है। दिल्ली जंक्शन को पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन भी कहा जाता है। दिल्ली जंक्शन के मेन गेट के ऊपर लगी धड़ी गवाह है उस दौर की जब यहाँ पाकिस्तान से रोज हिन्दू सिख शरणार्थी लूट-पिट कर आ रहे थे। दिल्ली में आपको अब भी अपने संध्याकाल में पहुँच गये झुकी हुई कमर वाले वे बुजुर्ग मिल जायेंगे जो बँटवारे के बाद किसी तरह से जान बचाकर इसी रेलवे स्टेशन पर उतरे थे।
दिल्ली जंक्शन पर उड़न सिख
सिर्फ 16 साल की उम्र में उड़न सिख मिल्खा सिंह अकेले-अनाथ दिल्ली जंक्शन पर उतरे थे। मिल्खा सिंह के परिवार के कई सदस्यों का कत्ल कर दिया गया था। मिल्खा सिंह सीधे सरहद के उस पार से दिल्ली नहीं आये थे। वे पहले पश्चिमी पंजाब के अपने शहर कोट अदू से मुल्तान शहर रेल से पहुँचे थे। वहाँ से वे ट्रक पर फिरोजपुर आये थे। बँटवारे को लेकर उनकी यादें बेहद दिल दहलाने वाली थीं। उनके पिता का दंगाइयों ने कत्ल कर दिया था। उन्होंने मरते वक्त कहा था, ‘भाग मिल्खा भाग।’ फिरोजपुर से वे दिल्ली आये थे। दरअसल वे अपने गाँव से जान बचाकर भागने के दौरान अपनी बहन से बिछड़ गये थे। शरीर सुन्न होने लगता था जब मिल्खा सिंह उस दौर के दर्दनाक किस्से बयां करते थे। दिल्ली में शरणार्थियों के जत्थे आ रहे थे। सब तरफ अफरा-तफरी का आलम था। मिल्खा सिंह अपनी बिछड़ गई बहन हुंडी को खोजने दिल्ली आये थे और सफल भी रहे।
सुनसान जगहों पर कत्लेआम
देखिए दिल्ली आने वाले अधिकतर शरणार्थियों का इधर कोई घर-बार नहीं था। ये सब भगवान का नाम लेकर भारत की सीमा में पहुँच जाना चाहते थे। उससे पहले खतरा था। दिल्ली की तरफ आ रही रेलों पर निर्जन स्थानों पर हमले हो रहे थे। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन रहे वाई. पी. आनंद अपने परिवार के साथ स्यालकोट से जम्मू का 21 किलोमीटर का सफर कर रहे थे। स्यालकोट में दंगे भड़कने के बाद उनके परिवार के लिए वहाँ पर रहना नामुमकिन हो चुका था। वे तब 13 साल के थे। उन्हें याद है जब किसी अनजान स्थान पर रेल को रोक दिया गया था। देखते-देखते उसमें हथियारों के साथ मौत के सौदागर दाखिल हो गए थे। उन्होंने उस रेल में सवार दर्जनों यात्रियों का कत्ल कर दिया। आनंदजी के सामने उनके परिवार के आधे सदस्य मारे गए थे। वे उन भयावह पलों को सुनाते हुए रोने लगते हैं। खून से लथपथ रेल जम्मू पहुँची। वहाँ से कुछ दिनों के बाद वे अपने परिवार के बचे-खुचे सदस्यों के साथ दिल्ली जंक्शन आते हैं। यहाँ स्टेशन के आसपास हजारों शरणार्थी डेरा जमाये हुए थे।
‘अमृतसर आ गया है’
दिल्ली आने वाले अधिकतर शरणार्थियों का इधर कोई घर-बार नहीं था। ये सब अमृतसर, जम्मू या फिरोजपुर तक पहुँच जाना चाहते थे। उससे पहले खतरा था। उस डरावने सफर को कथाकार भीष्म साहनी ने विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी अपनी अमर कहानी ‘अमृतसर आ गया है’ में जीवंत कर दिया है। ‘अमृतसर आ गया है’ में ट्रेन में बैठे एक सरदारजी सबसे पूछ रहे थे कि “पाकिस्तान बन जाने पर जिन्ना साहिब बंबई में ही रहेंगे या पाकिस्तान में जा कर बस जाएँगे। किसी ने जवाब दिया था बंबई क्यों छोड़ेंगे, पाकिस्तान में आते-जाते रहेंगे, बंबई छोड़ देने में क्या तुक है। लाहौर और गुरदासपुर के बारे में भी अनुमान लगाए जा रहे थे कि कौन-सा शहर किस ओर जाएगा।” भीष्म साहनी अपने परिवार के साथ रावलपिंडी से रेल में दिल्ली आए थे। भीष्म साहनीजी बताते थे कि रावलपिंडी से लाहौर के बीच जगह-जगह कत्लेआम की खबरें मिलती थीं। लाहौर के पास के शहर शेखुपुरा में सैकड़ों लोग मारे गए थे। कई जगहों पर रेलों पर पथराव किया जाता था।
क्या होता था अमृतसर में
रेल जब अमृतसर पर पहुँचती थी तब बहुत से मुसाफिर उतर जाते थे। वहाँ रेल विभाग की तरफ से रेलों का मुआयना भी किया जाता था। कुछ डॉक्टर भी मौजूद रहते थे ताकि गंभीर रूप से बीमार रोगियों का तुरंत इलाज हो सके। शरणार्थियों में कुछ गर्भवती औरतें भी होती थी।
– राजकुमार जैन

