शालिनी शाक्य
साल 1955, 12 अगस्त का वो आग उगलता दिन… पटना के बीएन कॉलेज में छात्र बस किराए के नाम पर भड़क गए… स्टेट ट्रांसपोर्ट वाले कर्मचारियों से झगड़ा हो गया – “ये लूट है या क्या?” चिल्लाए लड़के… गुस्सा फूटा! सड़कें भर गईं, बसों को आग के हवाले कर दिया गया… सबकुछ धुंआ-धुंआ हो गया…और शहर कांप उठा…

श्रीकृष्ण सिंह की सरकार में ट्रांसपोर्ट मंत्री महेश प्रसाद सिन्हा की नींद उड़ गई… लेकिन अब क्या? पुलिस बुलाई गई… लाठियां चलीं,और फिर गोलियां चला दीं गई। सीवान का मासूम छात्र दीनानाथ पांडेय गिर पड़ा…और जान चली गई। “भाई मारा गया!” ये सोच छात्रों का खून खोल उठा…और आंदोलन तूफान बन गया…30,000 लड़के पटना के सचिवालय को घेर बैठे। “महेश प्रसाद, जवाब दो! तू जिम्मेदार है!” नारे थमे ही नहीं…..
दिल्ली में हड़कंप मच गया… देश के प्रधानमंत्री नेहरू खुद प्लेन पकड़कर पटना पहुंचे। लेकिन हवाई अड्डे पर… उन्हें काले झंडे दिखाए गए…! “नेहरू जी, शर्म करो! हमारे भाई की मौत पर चुप हो आप?” नेहरू का चेहरा लटक गया। लेकिन आंदोलन रुका कहां? और तेज हो गया।
इस आग में चिंगारी बने महामाया प्रसाद सिन्हा…वो खुद सीवान के थे, दीनानाथ उनके इलाके का लड़का था…वो मंच पर चढ़े, तो आंखें नम। “भाइयो, ये क्या अन्याय हो रहा है? हमारा बच्चा चला गया!” आवाज कांपी, आंसू बहने लगे। कभी गुस्से में कुरता फाड़ दिया – “सरकार ने खून बहाया!” हर मीटिंग में यही जुमला – “विद्यार्थी हमारे जिगर का टुकड़ा हैं!” ये सुन छात्र दीवाने हो गए… महामाया के लिए तालियां बजी… जैसे मानों वे छात्रो के भगवान बन गए हो…

दो साल फटाफट बीत गए…और साल 1957 की तारीख 25 फरवरी आई… उस समय चुनाव का जादू चल रहा था। मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह अपनी टीम को सीटें बांट रहे थे, जैसे कोई राजा खजाना लूटता हो। मुजफ्फरपुर पर दांव लगाया महेश प्रसाद सिन्हा पर। वो काबीना मंत्री, भूमिहार जाति के, इलाके के वोट उनके जेब में थे…और उनकी जीत तो पक्की है….
लेकिन… अचानक ये क्या हुआ… मैदान में कूदे महामाया प्रसाद सिन्हा…जो कायस्थ समुदाय से आते थे….और मुजफ्फरपुर का जाति का खेल उनके खिलाफ था… लेकिन महामाया को छात्रों पर भरोसा था…कि उनके जिगर के टुकड़े उन्हें वोट देंगे!” महेश का चेहरा पीला पड़ गया…जिसके बाद महेश प्रसाद ने अपनी आखिरी बाजी चली – नेहरू को बुलाया। प्रधानमंत्री बिहार आए भी… मुजफ्फरपुर में नहरू की सभा का धमाल। खुली जीप में घूमे, हाथ जोड़े। “भाइयो-बहनो, महेश प्रसाद को वोट दो! देश को मजबूत बनाओ!” भीड़ पागल थी…मानों नेहरू का जादू जैसे कमाल ही कर गया हो… सब सोचने लगे – अब महामाया कैसे जीतेगा?
वोटों की गिनती हुई… और सबके दिल धक-धक कर रहे थे…आखिर में ऐलान हुआ – महामाया प्रसाद सिन्हा जीत गए! और उन्होंने महेश प्रसाद को 2804 वोटों से धूल चाटा दी। जाति का हिसाब धरा का धरा रह गया, नेहरू का करिश्मा भी फुस्स हो गया… मानों छात्रों ने चमत्कार दिखा दिया हो…महामाया हंस पड़े – “जिगर के टुकड़ों ने साबित कर दिया, दिल की ताकत सबसे बड़ी!”
नमस्कार मेरा नाम है…शालिनी और आप देख रहे हैं THE NEWS15.. ‘बिहार के मुख्यमंत्री’ सीरीज में आज हम बात करेंगे… बिहार के पांचवे मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा की, जिन्होंने 5 मार्च 1967 से 28 जनवरी 1968 तक बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया… उनकी कहानी छात्रों के हक की लड़ाई, सामाजिक सुधार और बिहार की राजनीति में उनके योगदान की एक प्रेरक गाथा है………………………………………………………………………………………………………………….
महामाया प्रसाद सिन्हा का जन्म 1 मई 1909 को बिहार के एक कुलीन परिवार में हुआ था। वो बचपन से ही होशियार और पॉपुलर रहे। पढ़ाई में टॉप करते थे, और सबके चहेते बने। 1929 में उन्हें इंडियन सिविल सर्विस के लिए चुना गया, लेकिन उन्होंने आजादी की लड़ाई को चुना…महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में कूद पड़े…कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़कर उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत थी… बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। लेकिन बाद में श्रीकृष्ण सिंह जैसे बड़े नेताओं से मतभेद हो गया, तो पार्टी छोड़ दी…
लेकिन महामाया के मुख्यमंत्री बनने का रासता अभी बहुत लंबा था…इतना लंबा की कांग्रेस के तीन नए मुख्यमंत्री बदल गए…श्री कृष्ण सिंह के बाद दीप नारायण सिंह आए जो 17 दिनों के CM बनें…फिर बिनोदानंद झा और फिर कृष्ण वल्लभ सहाय…लेकिन केबी सहाय के पतन की शुरुआत 5 जनवरी, 1967 को पटना यूनिवर्सिटी में हुए गोलीकांड से शुरू हो गई… फीस बढ़ोतरी और अन्य मांगों को लेकर छात्र प्रदर्शन कर रहे थे… प्रदर्शन हिंसक होने पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें कई छात्र मारे गए… इस घटना ने पूरे बिहार में आक्रोश फैला दिया… विपक्ष ने इसका फायदा उठाया, और छात्रों ने सहाय के खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया… हजारीबाग में उनके पैतृक घर और नवादा में उन पर हमला हुआ… कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने पटना पहुंचकर गोलीकांड की न्यायिक जांच की सलाह दी… लेकिन सहाय ने इसे विपक्ष की साजिश बताते हुए जांच से इनकार कर दिया और इस्तीफा सौंप दिया… कामराज ने इस्तीफा खारिज कर दिया, लेकिन 1967 के विधानसभा चुनाव में केबी सहाय ने पटना पश्चिम और गिरडीह से चुनाव लड़ा… विपक्षी जनक्रांति दल ने पटना से महामाया प्रसाद सिन्हा और गिरडीह से आरके सिन्हा को मैदान में उतारा। दोनों ने सहाय को हरा दिया। केबी सहाय को इस मुकाबले में मिले 13,305 वोट. जबकि हार का अंतर था 20,729 वोट. महामाया प्रसाद ने केबी सहाय को धूल चटा दी….सहाय की हार के साथ ही कांग्रेस को भी झटका लगा। 318 सीटों वाली बिहार विधानसभा में कांग्रेस को सिर्फ 128 सीटें मिलीं, वह बहुमत से 42 सीट पीछे रह गई…
और विपक्ष चमक उठा… डॉ. राम मनोहर लोहिया के एक इशारे पर सब एकजुट हो गए। संसोपा को 68 सीटें, प्रजा सोशलिस्ट को 16, जनक्रांति दल को 28, जनसंघ को 25, सीपीआई को 24, और सीपीएम को 4 सीटें मिली… कुल मिलाकर बहुमत विपक्ष के हाथ में था…लेकिन क्या ये नया दौर था? ये बड़ा सवाल बना…
राज्यपाल एम.ए. अय्यंगर ने सबसे पहले कांग्रेस को बुलाया – और कहा “सरकार बनाओ!” लेकिन महेश प्रसाद सिन्हा, जो कांग्रेस के नेता चुने जा चुके थे, हंस पड़े। “नहीं भाई, बहुमत कहां है? सरकार गिर जाएगी…जिसके बाद उन्होंने न्योता ठुकरा दिया। यानी की अब बॉल विपक्ष के पाले में थी… लोहिया जी पूरे देश में कांग्रेस को उखाड़ फेंकने की मुहिम चला रहे थे। और बिहार में उनका जादू चल पड़ा – गठबंधन बन गया। लेकिन बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा…..
इस गठबंधन में सबसे ताकतवर संसोपा थी… कर्पूरी ठाकुर को उनका नेता चुना गया…लेकिन जनसंघ-कम्युनिस्ट जैसे दुश्मन दलों को कर्पूरी का नाम पसंद नहीम आया…उन्होंने कहा ये तो नहीं चलेगा!” और झगड़ा छिड़ गया… फिर बीच का रास्ता निकला गया…– चुनाव में कांग्रेस को पटखनी देने वाले हीरो को ताज पहनाते है…और महामाया प्रसाद सिन्हा को मुख्यमंत्री बना दिया गया… कर्पूरी ठाकुर को डिप्टी CM का पद दिया गया… 5 मार्च 1967 को महामाया बिहार के पांचवे मुख्यमंत्री बने।
महामाया की सरकार ने कमाल कर दिखाया। पहला आदेश – “पुलिस कभी छात्रों पर गोली नहीं चलाएगी… पुरानी कांग्रेस सरकारों के घोटालों की जांच के लिए जस्टिस टी.एल. वेंकटराम अय्यर आयोग खड़ा किया। डिप्टी सीएम कर्पूरी ठाकुर, जो शिक्षा मंत्री भी थे, उन्होंने मैट्रिक एग्जाम में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म दी… – “अब गरीब बच्चे आसानी से पास होंगे!” बिहार में खुशी की लहर दौड़ गई.. लेकिन… ये खुशी ज्यादा नहीं चली…क्योंकि गठबंधन तो खिचड़ी था – संसोपा सबसे बड़ा, लेकिन सीएम जनक्रांति दल से। संसोपा के एक गुट को ये बात बहुत चुभ रही थी….
1967 का वो साल, जब बिहार की सियासत में आग लगी हुई थी। महामाया प्रसाद सिन्हा, नए-नए मुख्यमंत्री बने, संथाल परगना के दुमका इलाके में दौरे पर थे। सर्किट हाउस में रुकना था, लेकिन वहां का माहौल गरम हो गया। डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट यशवंत सिन्हा – एक होशियार IAS अफसर – उनके सामने खड़े थे….लोगों की भीड़ लगी थी। एक-एक कर मुख्यमंत्री के पास शिकायतें आने लगीं – “सर, ये समस्या है, वो दिक्कत है!” हर बार महामाया मुड़ते यशवंत की तरफ देखते, और फिर आखिर में बोलते “अरे डीएम साहब, ये क्या हो रहा है? सफाई दो!” यशवंत पसीना-पसीना होकर समझाते, “सर, कोशिश जारी है…” लेकिन महामाया के साथ आए सिंचाई मंत्री और बेगुसराय के कम्युनिस्ट लीडर चंद्रशेखर सिंह? वो तो जैसे शेर बन गए! IAS अफसर पर चिल्लाते, ताने मारते। यशवंत का सब्र टूट गया, उन्होंने सीधे महामाया को देखा और बोले, “सर, मैं इस तरह के बर्ताव का आदी नहीं हूं!”
महामाया का चेहरा लाल। उन्होंने यशवंत को अलग कमरे में खींच लिया। वहां लोकल एसपी और डीआईजी भी खड़े उनके सामने बोले “ये क्या हरकत की है तुमने? मुख्यमंत्री से ऐसे बात करोगे?” यशवंत ने ठंडे स्वर में जवाब दिया, “सर, आपके मंत्री का बर्ताव भी तो सही नहीं था।”
फिर क्या महामाया प्रसाद सिन्हा गर्म हो गए और उन्होंने मेज़ पर ज़ोर से हाथ मार कर कहा कि ‘आपकी बिहार के मुख्यमंत्री से इस तरह बात करने की हिम्मत कैसे हुई?’ आप दूसरी नौकरी की तलाश शुरू कर दीजिए.’ फिर अफसर ने कहा, ‘मैं शरीफ़ आदमी हूं और चाहता हूं कि मुझसे शराफ़त से पेश आया जाए. जहां तक दूसरी नौकरी ढूंढने की बात है, मैं एक दिन मुख्यमंत्री बन सकता हूं, लेकिन आप कभी आईएस अफ़सर नहीं बन सकते. ऑफिसर ने अपने कागज़ उठाए और कमरे से बाहर निकल आए….
लेकिन शायद यशवंत सिन्हा ये नहीं जानते थे की महामाया प्रसाद भी ब्रिटिश काल में IAS के पुराने अवतार ICS में सिलेक्ट हो चुके थे लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के कारण ज्वाइन नहीं किया था. रही यशवंत सिन्हा के मुख्यमंत्री बनने की बात, तो वह बिहार में 1995 में नेता प्रतिपक्ष बने, लेकिन मुख्यमंत्री की दावेदारी से पहले ही इंद्रप्रस्थ की चौसर में नए सिरे से ग्रस्त हो गए.
फिर आया वो विवाद, जो सबकुछ उजाड़ गया। परबत्ता से नए-नए विधायक बने सतीश प्रसाद सिंह, 15 साथियों को लेकर CM हाउस पहुंचे… उनकी शिकायत थी कि पिछड़े वर्ग से आने वाले एक योग्य उम्मीदवार को पटना मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर नियुक्त नहीं किया जा रहा है. उन्होंने मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद को धमकी दी कि अगर उस उम्मीदवार को प्रोफ़ेसर नियुक्त ना किया गया तो वो सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे….
जिसके बाद शुरु हुआ असली खेल… चुनाव हार चुके केबी सहाय को जैसे इसी मौके का इंतजार था…वे सतीश के पास दौड़े – और बोले भाई, 25-30 विधायक तोड़ लो, कांग्रेस आपको पूरा समर्थन देगी…और आपको CM बना दिया जाएगा….सतीश को इस काम में साथ मिला बीपी मंडल और भोला प्रसाद सिंह का… धड़ाधड़ 25 विधायक गठबंधन से कट गए…और नई पार्टी बनी शोषित दल…सत्ता का जुआ चल पड़ा….
28 जनवरी 1968 को महामाया को विधानसभा में बहुमत दिखाना था। लेकिन कांग्रेस, शोषित दल और कुछ निर्दलीयों ने वोट डाले – ” ये सरकार नहीं चलेगी!” गिनती सामने आई और बहुमत नहीं बन सका… महामाया का चेहरा उतर गया…और इस्तीफा देना पड़ा…
लेकिन महामाया प्रसाद ने हार नहीं मानी और 1969 के विधानसभा चुनाव में जन क्रांति दल के टिकट पर अपने घर सीवान के महाराजगंज से लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की। लेकिन 1972 के चुनाव से पहले उन्होंने इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) का दामन थाम लिया। सीवान के ही गोरेयाकोठी सीट से जीते और विधानसभा पहुंचे। लेकिन केदार पांडे और अब्दुल गफूर की सरकार में उनका पुराना रुतबा न मिला। मानों जैसे वो सियासत के अज्ञातवास में चले गए हो….छात्र, जिन्हें वो जिगर का टुकड़ा कहते, अब चुप थे।
फिर 1974 में तूफान आया। पटना यूनिवर्सिटी से शुरू होकर पूरा बिहार सड़कों पर उतर गया। जेपी के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा गूंजा। जेपी ने महामाया को घर बुलाया। कदमकुआं वाले आवास पर मंत्रणा हुई। महामाया ने फैसला किया – छात्र आंदोलन को समर्थन दूंगा। ये खबर इंदिरा गांधी के कानों तक पहुंची। वो जानती थीं, महामाया छात्रों को भड़काने में माहिर हैं। उन्होंने पीएमओ के बड़े अफसर यशपाल कपूर को पटना भेजा – और कहा महामाया को मनाओ… लेकिन महामाया नहीं माने… जेपी के साथ खड़े रहे। इमरजेंसी लगी, तो विपक्षी नेताओं संग जेल हो गई…
1977 की जनवरी। इंदिरा ने इमरजेंसी ढीली की और लोकसभा चुनाव घोषित कर दिया। जेपी की कोशिश से सोशलिस्ट, भारतीय लोकदल, कांग्रेस (संगठन), जनसंघ, सीएफडी और युवा तुर्कों ने जनता पार्टी बना ली। चुनाव चिन्ह था लोकदल का। लेकिन सीटों पर झगड़ा हुआ… पटना सीट पर जनसंघ ने कैलाशपति मिश्र को उतारना चाहा….जिससे कायस्थ समाज में बवाल हो गया जिसके बाद महामाया को टिकट मिला। उनके जिगर के टुकड़े – छात्र – जनता पार्टी के साथ थे…और एक बार फिर महामाया ने पटना से कांग्रेस को धूल चाटा दी…पूरी हिंदी पट्टी में कांग्रेस साफ हो गई… संसद पहुंचे, लेकिन जनता पार्टी के घटकवाद में मंत्री का नंबर नहीं लगा…
सांसद रहते महामाया को पैरालिसिस का अटैक आया। जिसके बाद वे धीरे-धीरे राजनीति से दूर होने लगे….1980 में पटना से जनता पार्टी के टिकट पर लड़े, लेकिन सीपीआई के रामावतार शास्त्री से हार गए…और ये उनका आखिरी चुनाव था… 1983 में जनता पार्टी का पटना अधिवेशन हुआ लेकिन प्रदेश इकाई ने महामाया को नहीं बुलाया…अधिवेशन के आखिरी दिनों में जब जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर को इस बात की जानकारी मिली तो वे प्रदेश इकाई के नेताओं पर बहुत गुस्सा हुए और अधिवेशन की समाप्ति के बाद चंद्रशेखर खुद भी महामाया के घर गए और पार्टी के नेताओं के व्यवहार पर माफी मांगी…
बुढ़ापा, बीमारी और सियासत का अकेलापन – ये सब झेलते हुए, महामाया बाबू ने 1987 की सर्द सुबहों में, चुपचाप अलविदा कह दिया…ये सिर्फ 11 महीने चलने वाली सरकार थी… लेकिन क्या सब व्यर्थ था? नहीं, इस गठबंधन ने बिहार को नई हवा दी – भ्रष्टाचार पर ब्रेक, छात्रों की रक्षा, गरीबों को राहत। सत्ता का खेल तो चलता रहता है, लेकिन इतिहास याद रखता है ऐसे हीरो को!
महामाया प्रसाद सिन्हा की ये यात्रा खत्म हुई, लेकिन उनकी आग बिहार की धरती पर सुलगती रही। वो सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं, छात्रों के रक्षक थे – “जिगर का टुकड़ा” कहकर उन्होंने युवाओं के दिल जीते। नेहरू के जादू को हराया, जेपी के साथ क्रांति लड़ी, जेल की सलाखों में भी हार न मानी…उसके बाद कई नेता आए, कुर्सियां घूमीं, लेकिन महामाया जैसा जिंदादिल आदमी बिहार की सियासत में फिर कभी नहीं आया? जो युवाओं के सपनों को फिर गले लगाए….
तो ये थी ‘बिहार के मुख्यमंत्री’ सीरीज में बिहार के पांचवे मुख्यमंत्री की काहनी फिर आपसे मिलेंगे और बात करेंगे बिहार के छठे मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह की जिन्होंने महामाया से उनकी CM की गद्दी छीन अपने कब्जे में कर ली






