आपात काल भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय है जिसे कभी भुलाया नही जा सकता है। 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन सिन्हा ने राज नारायण द्वारा दायर याचिका के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के चुनाव को सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आधार पर रद्द कर दिया और उन्हें छह साल के लिए चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया था। इससे काँग्रेस पार्टी और इंदिरा गांधी दोनों घबड़ा गए थे। इसी वीच जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा जी को गद्दी छोड़ने के लिए रामलीला मैदान में एक विशाल रैली की।
उन्होंने सरकार के गलत आदेशों को न मानने के लिए आहवान किया। जिससे इंदिरा ग़ांधी पर दबाब बढ़ गया और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे, ओम मेहता, बंशीलाल व संजय ग़ांधी की सलाह पर 25 जून के आधी रात कोा आपात काल की घोषणा कर दी । जयप्रकाश नारायण समेत देश के सभी विरोधी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। प्रेस की लाइट काट दी गयी। देश के सभी शीर्षस्थ नेताओं राजनारायण, मधु लिमये, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी लाल कृष्ण आडवाणी, अशोक मेहता और यहां तक कांग्रेस के चंद्रशेखर, राम धन व कृष्णकांत को भी गिरफ्तार कर लिया गया। देश में लाखों लोगों को जेल में डाल दिया गया । प्रेस पर सेंसर लगा दिया गया। नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिया गये। न्यायपालिका को अनेक संविधान संशोधन के माध्यम से पंगु बना दिया गया। ऐसा भयावह वातावरण निर्मित कर दिया गया कि सभी लोग डरने के लिए बाध्य हो गए ।
सेना और सुप्रीम कोर्ट में बिना वरीयता को ध्यान दिए अपने चहेतों को मुख्य न्यायाधीश व सेना अध्यक्ष बना दिया गया। संजय ग़ांधी की टोली सक्रिय थी। जय प्रकाश को रात दो बजे ग़ांधी शांति प्रतिष्ठान से उठाकर गिरफ्तार किया गया और जेल में ही उनकी किडनी खराब हो गयी। उन्नीस महीने के भयावह काली रात के समाप्त होने पर जब मार्च 1977 में चुनाव हुए तब जनता ने इसका जबाब दे दिया। जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद इन सारे संवैधानिक संशोधनों को रद्द कर दिया था। जनता पार्टी ने इन सारे संवैधानिक संशोधनों को रद्द कर दिया जिससे भविष्य में कोई
शासक आपातकाल न लगा सकें। इसके लगाने के दो मुख्य कारण थे, पहला रामनारायण जी का रायबरेली का चुनाव रद्द करवाना , दूसरा जयप्रकाश जी सम्पूर्ण क्रान्ति का आन्दोलन जिसमे लगभग सभी विपक्षी दल के नेता शामिल हो गए थे। आपातकाल को कुछ अविवेकी लोग आज भी न्यायोचित मानते है जिन पर केवल तरस खाया जा सकता है, यह वही कर सकता है जिसे लोकतंत्र में आस्था न हो।
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