संघ के 100 साल: डॉ. हेडगेवार और वंदेमातरम की वो अनसुनी कहानी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी, और 2025 में उसके 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत ही देशभक्ति की ऐसी भावना से हुई, जो ब्रिटिश राज के खिलाफ खड़ी हो गई। बचपन से ही डॉ. हेडगेवार में स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम की ऐसी ज्वाला थी, जिसने उन्हें स्कूल से ही निष्कासित करवा दिया। आइए, जानते हैं उस घटना का पूरा विवरण।
घटना का संक्षिप्त विवरण
1908 का समय था, जब डॉ. हेडगेवार नागपुर के नील सिटी हाई स्कूल में पढ़ते थे। उस वक्त ब्रिटिश सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें स्कूलों में ‘वंदेमातरम’ गाने या बोलने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई थी। यह गान स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन चुका था, और अंग्रेज इसे दबाना चाहते थे।
स्कूल इंस्पेक्शन के दौरान केशव (जिन्हें बाद में डॉक्टरजी कहा जाने लगा) ने अपने सहपाठियों को प्रेरित किया कि वे सभी मिलकर ‘वंदेमातरम’ का उद्घोष करें। छात्रों ने जोर-जोर से ‘वंदेमातरम’ गाया, जो ब्रिटिश अधिकारियों के कानों में खटक गया। इसके बाद स्कूल प्रबंधन ने सभी छात्रों को माफी मांगने को कहा। लेकिन केशव ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभक्ति के लिए माफी मांगना अपमानजनक है। नतीजा? उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया।
यह घटना न केवल उनके व्यक्तित्व की झलक देती है, बल्कि दिखाती है कि कैसे एक छोटी उम्र के लड़के ने ब्रिटिश दमन के खिलाफ पहला विद्रोह किया। बाद में उन्होंने अपनी पढ़ाई सरस्वती हाई स्कूल से पूरी की और डॉक्टर बने, लेकिन यह निष्कासन उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
संघ के 100 वर्षों में इसकी प्रासंगिकता
आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने पर यह कहानी हमें याद दिलाती है कि संगठन की नींव ही राष्ट्रप्रेम और स्वाभिमान पर पड़ी थी। डॉ. हेडगेवार ने स्वयंसेवकों को यही सिखाया कि हिंदू समाज को मजबूत बनाना ही देश की आजादी का आधार है। आज भी ‘वंदेमातरम’ राष्ट्रीय गान का हिस्सा है, जो उस संघर्ष की जीत का प्रतीक है।
यह घटना कई ऐतिहासिक ग्रंथों और जीवनी में दर्ज है, जो डॉ. हेडगेवार की देशभक्ति को प्रमाणित करती है। संघ की शताब्दी पर यह याद ताजा करना उचित है।

