विपक्ष संयुक्त रूप से आंदोलन करने की अभी भी नहीं बना पाया है कोई ठोस रणनीति
संयुक्त रूप से पत्र लिखने से क्या कोई सुनवाई करेंगे कानून मंत्री के साथ लंदन घूम रहे सीजेआई ?
विपक्ष जनता के लिए ऐसा कर ही क्या रहा है जिससे जनता उससे जुड़े ?
चरण सिंह
आखिरकार इंडिया ब्लॉक की मीटिंग में विपक्ष ने ऐसा क्या कर दिया की देश में क्रांति हो जाएगी ? इंडिया ब्लॉक की इस मीटिंग में जिन मुद्दों पर सहमति बनी है इनसे कुछ देश और जनता का कोई भला हो मुझे तो संदेह है। एफआईआर में हेराफेरी और चुनाव की निष्पक्षता को लेकर देश के सीजेआई को संयुक्त रूप से पत्र भेजने से क्या होगा ?
सीजेआई तो कानून मंत्री के साथ लंदन में छुट्टियां मना रहे हैं। जो सीजेआई सरकार के खर्चे पर लंदन में मौज मस्ती कर रहे हैं उन पर विपक्ष की किसी मांग क्या असर होगा ? उनकी नजर में तो बेरोजगार कॉकरोच हैं। वे तो आरटीआई एक्टिविस्ट और मीडियाकर्मियों के सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाने को गलत मानते हैं। विपक्ष जानता नहीं है क्या ? ये साहब विपक्ष की बात मानेंगे या फिर सत्ता पक्ष की ?
शिक्षा प्रणाली के कु प्रबंधन को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को तेज करने से क्या होगा ? करते रहिये पोस्ट। किसी पर कोई असर नहीं होगा। शिक्षा मंत्री या फिर प्रधानमंत्री के आवास का घेराव करो तो कुछ असर हो। जब धर्मेंद्र प्रधान ने युवाओं के आक्रोश पर भी इस्तीफा नहीं दिया तो फिर विपक्ष की मांग पर वह कौन सा इस्तीफा देने वाले हैं ? शिक्षा मंत्री या फिर प्रधानमंत्री के आवास का घेराव करो तो कुछ असर हो। जब तक प्रधानमंत्री से लेकर सभी मंत्रियों का घेराव नहीं होगा कुछ हासिल नहीं होने वाला है। करते रहिये ऐसे ही मीटिंग और इटिंग।
दो महीने में बैठक से किस को कौन सा फायदा मिलने वाला है ? दो महीने तक क्या करेंगे ? संसद और सड़कों पर महंगाई, बेरोजगारी और लोकतंत्र की रक्षा जैसे मुद्दों पर मिलकर विरोध करने पर सहमति बनी है। कैसे विरोध करेंगे ? संयुक्त रूप से बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था को लेकर कहां पर और कब आंदोलन होगा ? तो क्या बयानबाजी ही होगी ? इसी मीटिंग में क्या विभिन्न मुद्दों पर आंदोलन करने और आंदोलन के स्वरूप और तारीख पर रणनीति नहीं बननी चाहिए थी ? मतलब आगे लिए दो महीने का इन्तजार करना पड़ेगा। विपक्ष के दल यह समझने को तैयार नहीं कि जब आप जनता के लिए कुछ नहीं करेंगे तो फिर कौन आप से जुड़ेगा ?
होना यह चाहिए था कि किसी मुद्दे को लेकर सभी दलों को संयुक्त रूप से सड़कों पर उतरने की रणनीति बनाकर तारीख तय होनी चाहिए थी। जब तक कोई निर्णय न निकले तब तक आंदोलन चलते रहने की रणनीति बने। दो महीने बाद हैदराबाद में चाय पीनी है तो फिर इससे कुछ नहीं होने वाला। जब दिल्ली की मीटिंग में कोई बड़ा निर्णय नहीं लिया गया तो फिर हैदराबाद की मीटिंग क्या होगा ?
अब टीएमसी टूट रही है तो फिर आने वाले दिनों में सपा, डीएमके, एनसी, झामुमो, आरजेडी को भी तोड़ा जा सकता है। इसमें दो राय नहीं कि क्षेत्रीय दलों के निशाने पर बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस रही है। राहुल गांधी को ये दल आज भी नेता मानने को तैयार नहीं। क्षेत्रीय दलों होगा कि यदि अब भी कांग्रेस की अगुआई में एकजुट होकर सड़कों पर संघर्ष न किया तो धीरे धीरे बीजेपी सभी क्षेत्रीय दलों के वजूद को खत्म कर देगी।
दरअसल इंडिया गठबंधन की बैठक ऐसे समय में हुई है जब इसके कुछ घटक दलों के बीच गंभीर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। बैठक में विपक्षी दल आम आदमी पार्टी और डीएमके शामिल नहीं हुए। इसके साथ ही एक प्रमुख पार्टी तृणमूल कांग्रेस जो बड़े राजनीतिक संकट से जूझ रही है, इस बैठक में शामिल हुई।

