
प्रोफेसर राजकुमार जैन
डॉ. राममनोहर लोहिया के 116 वें जन्मदिवस के अवसर पर आज मुल्क भर में अनेकों स्थान पर उनकी याद में सभाएं, सेमिनार, भाषण, परिचर्चा आयोजित हो रहे हैं साथ ही साथ पत्र पत्रिकाओं, सोशल मीडिया में आयोजित कार्यक्रम के साथ-साथ लेख तथा पुस्तक विमोचन इत्यादि कार्यक्रम भी जारी है।
आज दुनिया आपसी दुश्मनी के कारण बारूदी तबाही के कगार पर है। यूक्रेन रूस जंग, इस्राइल अरब युद्ध तथा अमेरिका +इज़रायल बनाम ईरान के बीच आणविक हथियारों की नौबत भी आ चुकी है। डॉ लोहिया ने 76 साल पहले 1950 में अरब इजरायल युद्ध तथा अमेरिका+ इज़रायल ईरान युद्ध के बारे में चेतावनी देते हुए युद्ध को रोकने की कोशिश के साथ- साथ ईरान के तेल की युद्ध में भूमिका को भी रेखांकित किया था।
डॉक्टर लोहिया के अनुसार विदेश नीति के दो उद्देश्य होते हैं: राष्ट्रीय हितों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थापना। अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाले आमतौर पर दो तत्व माने जाते हैं-, आर्थिक शक्ति और सैन्य शक्ति। किसी भी राष्ट्र का पहला काम होता है अपनी सीमाओं की रक्षा करना और अंदरूनी शक्ति का प्रदर्शन करना। जो राष्ट्र खुद मजबूत नहीं है दूसरों की लगातार और व्यापक आलोचना कर सकता है, लेकिन उसकी आलोचना का कोई आधार नहीं होगा। मजबूत का मतलब है आर्थिक और सैनिक मजबूती भी। वास्तव में यह आर्थिक और सैनिक के साथ इच्छा -शक्ति की भी मजबूती भी होती है जो दो अन्य शक्तियों को जोड़ती है।
सच्ची गुटनिरपेक्षता पर आधारित विदेश- नीति अथवा बिना तरजीह के समानांतर संबंध वाली विदेश नीति के उद्देश्य होने चाहिए: गरीबी का उन्मूलन, समानता की स्थापना और शोषण तथा अन्यान्य की समाप्ति ।इन बुनियादी मान्यताओं से प्रमुख मुद्दे निकलेंगे जैसे विभाजित
राष्ट्रो का एकीकरण, विश्व - संघऔर गरीबी के उन्मूलन के लिए शिखर सम्मेलन। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हमें सबके साथ जुड़ना पड़ेगा। उस हद तक जिस हद तक वे इन समस्याओं को सुलझाने में मदद करेंगे।
विदेश -नीति एक देश के सारे विश्व के साथ संबंधों का क्षेत्र है। एक दृष्टि से देखने पर यह राष्ट्रीय जीवन का हिस्सा है और दूसरे कोण से देखने पर यह सारी मानव- सभ्यता का
मामला है और यहां तक कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय जीवन विदेश- नीति का हिस्सा है। वे दोनों पहलू राष्ट्रीय जीवन और मानव सभ्यता, विदेश- नीति पर विचार करते समय ध्यान में रखे जाने चाहिए। जब कभी विदेश नीति इन दोनों पहेलियों के प्रति न्याय करती है, वह सर्वश्रेष्ठ नीति है। जब वह केवल राष्ट्रीय हितों को साघती है तो वह साधारण रूप से अच्छी है। जब वह दोनों में से किसी का भी हित नहीं साथती, जबकि वह दोनों का हित साधने का झूठा दावा करती है, तब वह बुरी नीति है और यह दोनों के साथ विश्वासघात करती है तब यह निकृष्ट है।
“मैंने इस्रायल के प्रधानमंत्री बेन गुरियन और अरब लीग के नेताओं की मीटिंग कराने की कोशिश की थी। इस्राइल के प्रधानमंत्री ने मुझसे कहा था कि वे अरब नेताओं से मिलने के लिए कहीं भी जाने को तैयार हैं। मुझे लगा था की सीमाओं की गारंटी तो प्रभावी की ही जा सकती है, हालांकि फिलिस्तीन के अरब शरणार्थियों की समस्या को हल करने में बहुत कठिनाई होगी। किसी भी स्थिति में इस्राइल के लिए यह अच्छा होगा कि वह नज़रेथ और और अन्य स्थानों के अरबो को न केवल समान नागरिकता की औपचारिक सुविधा दें बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन की वह तमाम सुविधाएं भी दे जो यहूदियों को दी जा रही है। मैं यह समझ नहीं पाया हूं की अरबो और यहूदियों के लिए सामूहिक बस्तियां बनाने की पहल क्यों नहीं की जा सकती।
इस बीच मिस्र में चुनाव हुए हैं और मिलनसार नहास पाशा वहां प्रधानमंत्री बने हैं। मैंने जब 6 महीने पहले उनसे बात की थी तो वह तीसरे खेमे के बारे में आशान्वित नहीं दिखे थे लेकिन अगर भारत सकारात्मक नीति अपनांए तो उनका मन भी बदल सकता है। जैसे भी हो नहास पाशा और आजाम पाशा की बेन गुरियन से मीटिंग होनी चाहिए। इसका कुछ तो फायदा होगा, भले ही वह इस्राइल अरब युद्ध को न रोक पाए। भले ही कितने युद्ध हो जाएं लेकिन अंततः समझोता तो होना ही चाहिए इस तरह की बैठके इसमें सहायक ही होती है।
एक न एक दिन इस्राइल और अरब दुनिया के बीच कुछ संघात्मक व्यवस्था बनानी ही पड़ेगी। अगर दुनिया में कहीं अंतिम व्यक्ति तक युद्ध करने जैसी भावना मुझे दिखी तो वह इस्राइल में ही दिखी। जब मैंने एक इस्रायली उत्साही नौजवान से कहा की 8 करोड़ अरब शत्रुओं के सामने 20 लाख यहूदियों के टिके रहने की कोई संभावना नहीं है और किसी दिन अरर्बो के पास भी यहूदियों जितने हथियार आ जाएंगे तो उसने अपने शांत उत्तर से मुझे डरा दिया। उसने कहा कि उनके लिए जाने की कोई जगह नहीं है। आश्चर्य की बात है कि इस देश में जहां हर लड़की मशीनगन चला सकती है, महात्मा गांधी की आत्मकथा हर उस नौजवान ने पढी है जिससे मैं मिला। गहराई -गहराई को आमंत्रित करती है चाहे वह हिंसक हो या अहिंसक। इस्राइल एशियाई देश है। उसके पास इतने मानव संसाधन और प्रतिभाएं हैं कि किसी और देश मे इतनी नहीं होगी। वह नए ढंग के जीवन के प्रयोग कर रहा है विशेषकर कृषि में। शांति और पुनर्निर्माण के कार्य में इस्रायल की साझेदारी सारे एशिया को, जिसमें अरब भी शामिल है, लाभान्वित करेगी। भारत सरकार को इस्राइल को मान्यता देने में देरी नहीं करनी चाहिए। मैं यही बात मिस्र की सरकार से भी कहना चाहता हूं। मैं यह बताने की जरूरत नहीं समझता कि मैंने मिस्र मे अपने को ज्यादा घर जैसा सहज महसूस किया बनिस्पत इस्रायल के लोगों के बीच क्योंकि काहिरा में गंदगी, शोर और अनुशासनहीनता कानपुर की तरह ही है। यह दुःखों और उम्मीदों का रिश्ता और संभवत: है दोनों देशों की संस्कृतियों का एक जैसा होना भी हमें एक दूसरे के करीब लाता है”।—-
इजराइल का सवाल निश्चय ही अरब देशों के लिए बहुत महत्व रखता है। यदि इसराइल अपने को एशिया और पश्चिम एशिया का हिस्सा मानता है तो उसे अरबो से अपने तनाव को कम करने की ज्यादा से ज्यादा कोशिश करनी चाहिए। कम से कम आर्थिक और विदेश नीति के मामले में कोई संघीय तरीका अपनाया जाना चाहिए। गरीबों के महासागर में समृद्धि का द्वीप हमेशा बना नहीं रह सकता। जितनी जल्दी हो सके शरणार्थियों तथा क्षेत्रीय सीमाओं को गारंटी की समस्याओं को सुलझाया जाए, बल्कि सारे पश्चिम को एक आर्थिक इकाई के रूप में मानने की कोशिश को निश्चित दिशा में आगे भी बढ़ाया जाए। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि इजरायल की विदेश नीति क्या होगी। यदि इसराइल अटलांटिक खेमे के साथ जुड़ता है और इसका खतरा बढ़ रहा है तो इजरायल के प्रति नीति विफल होगी और तीसरे खेमे के अरब देशों को अपनी स्थिति के एक और कठिन तत्व का सामना करना पड़ेगा। किसी भी हालत में यहां दी गई नीति के आधार पर अरब इजरायल सद्भाव की पहल शुरू की जानी चाहिए। इसराइल के लिए अच्छा होगा यदि वह अरब देशों तथा उत्तरी अफ्रीका की समाजवादियों साम्राज्य विरोधी आकांक्षाओं की पूर्ति में मदद दें।
यदि इसराइल तीसरे खेमे की समाजवादी नीति को स्वीकार करें और आर्थिक तथा विदेश -नीति में अरब देशों के साथ संयुक्त प्रयास करें और शेष सबसे मिलकर पश्चिम एशिया को एक आर्थिक इकाई माने तो अरब- यहूदी समस्या का स्थाई समाधान निकाल सकता है। इस प्रकार यहूदी जिनके पास विश्व -मन है, सभी अरब समस्याओं का दीर्घकालिक समाधान तलाशने में मदद कर सकते हैं जो मानव जाति के स्थाई हितों तथा शांति के लक्ष्य के अनुरूप हो। तब अरब -मन बदलते दबाबो से निर्देशित निष्प्रभावी उपायों के प्रलोभन से अपने को मुक्त कर सकता है।
ईरान और तेल विषय पर डॉ लोहिया ने लिखा है,
ईरान की समस्या सामने आई है। ईरानी तेल को लेकर उठा विवाद उस विश्व व्यापी संघर्ष का ही हिस्सा है जो विश्व के देशों में गरीबों और अमीरों के बीच चल रहा है। ईरान और अन्य तेल उत्पादक देश की स्थिति पर सरसरी नज़र डालने से दिखाई देगा कि तेल का मुनाफा कितनी भारी मात्रा में बाहर चला जाता है और ईरानी लोग अपने यहां गरीबी का उन्मूलन करने के अवसर से वंचित हो जाते हैं। जो लोग समानता के विश्व के समर्थक हैं उन्हें ईरान द्वारा तेल कंपनी के राष्ट्रीयकरण का समर्थन करना ही होगा।
स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि इस राष्ट्रीय कारण से जो समृद्धि और शक्ति मिलेगी वह किसे मिलेगी? मैं ईरान की आंतरिक वर्ग- स्थिति के बारे में नहीं सोच रहा हूं बल्कि ईरान के उस वर्चस्वशाली ग्रुप के बारे में सोच रहा हूं जो सोवियत खेमे की मदद की नीति के लिए प्रतिबद्ध है। विश्व में समानता लाने की अपनी इच्छा के चलते हमें इस संभावनाओं के प्रति सावधान रहना चाहिए कि वर्तमान सत्ता और मुनाफे को प्राप्त करने वाला सत्ता परिवर्तन विश्व की असमानताओं को ही न बढ़ाता जाए। प्रसन्नता की बात है कि राष्ट्रीय मोर्चा उसका नेता ईरान का प्रधानमंत्री उस विचारधारा का है जो तीसरे खेमे का संभावित समर्थक है।
सोवियत समर्थक ट्यूड पार्टी और धार्मिक कट्टरवादी फिदायीन, इस्लाम में काफी संख्या में ऐसे लोग हैं जो, यदि उन्हें अवसर मिले तो, समाजवाद और तीसरे खेमे की नीतियों को स्वीकार कर सकते हैं। इन सब लोगों से हम अपील करना चाहते हैं। ईरानी तेल का राष्ट्रीयकरण करने की कोशिशें को पूरा समर्थन करते हुए भी हम चाहते हैं की धार्मिक कट्टरवाद और साम्यवादी गड़बड़ियां करने वाले तत्व कमजोर हो तथा नेशनतल फ्रंट जैसी पार्टियां मजबूत बने जो आंतरिक मामलों में समाजवाद की दिशा में तथा विदेशी मामलों में तीसरे खेमे की और बढे।

