अरुण श्रीवास्तव
सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में शायद एक ही शब्द है जो गाहे-बगाहे याद किया जाता है, इसकी दुहाई दी जाती है और तारीफ़ों के पुल बांधे जाते हैं हालांकि उस पद की तरह यह भी शोभा की वस्तु बनता जा रहा है। इस शब्द को शर्मशार किया जाता है फिर भी लोकतांत्रिक परंपरा में यह खास समय में उछाला जाता है ‘अंतरात्मा की आवाज़’। यह एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति के चुनावों से लेकर अविश्वास प्रस्ताव में मतदान के समय में ही लिया जाता है उसके बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
व्हिप संसदीय प्रणाली में एक ऐसा निर्देश है जो राजनीतिक दल अपने विधायकों व सांसदों को जारी करता है ताकि वे सदन में उपस्थित रहें और किसी विशेष विषय या विधेयक पर पार्टी लाइन के अनुसार मतदान करें। व्हिप का उद्देश्य
पार्टी अनुशासन बनाए रखना है ताकि दल के सभी सदस्य एकजुट होकर मतदान करें।
सरकार को स्थिरता देना सरकार के पास बहुमत सिद्ध करने में मदद मिलती है।
महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराना जैसे बजट, विश्वास मत अविश्वास प्रस्ताव आदि।
अपने देश भारत में व्हिप को कानूनी मान्यता दलबदल विरोधी कानून-1985 से मिली।
व्हिप के 3 स्तर होते हैं सिंगल लाइन व्हिप में सदस्य की उपस्थिति आवश्यक है। डबल लाइन में उपस्थिति और मतदान दोनों पर जोर दिया जाता है।
ट्रिपल लाइन व्हिप – सबसे कड़ा निर्देश देता है। इसके अनुसार उल्लंघन करने वाले की संसद सदस्यता तक जा सकती है।
व्हिप की उपयोगिता
एक अनुमान है कि विधाई कार्य समय पर पूरे करने में मदद के लिए यह व्यवस्था दी गई होगी किन्तु अब इसका इस्तेमाल हमारी राजनीतिक पार्टियां सरकारें बचाने व गिराने में करने लगी हैं।
सत्तधारी दल व्हिप को ढाल के रूप में इस्तेमाल करने लगी हैं। व्हिप संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार को गिरने से बचाने का हथियार बन गया है।
विपक्ष और सत्तारूढ़ दल के बीच स्पष्ट विभाजन बनाए रखता है।
“व्हिप” का इतिहास हमारी हमारी गुलामी से जुड़ा हुआ है। कुछ चीजें अंग्रेज छोड़ गए तो कुछ चीजें हमने अपनी सुविधानुसार अपना ली। मसलन चाय वो छोड़ कर गए थे। पर संविधान और चुनाव प्रणाली हमने अपना ली।
शब्द ब्रिटेन की संसदीय परंपरा से आया है। चूंकि बहुत से देशों की तरह भारत भी अंग्रेजों था इसलिए भी बहुत सी चीजें उनकी अपना ली गई। व्हिप भी उन्हीं में से एक है।
धीरे-धीरे यह राजनीतिक संदर्भ में प्रयुक्त होने लगा।
भारत में ब्रिटिश संसदीय परंपरा से यह प्रणाली अपनाई गई।
राष्ट्रपति चुनाव, उप राष्ट्रपति चुनाव,
राज्यसभा के सभापति या उप सभापति चुनाव।
लोकसभा के स्पीकर या उप स्पीकर चुनाव संवैधानिक/तटस्थ पद माने जाते हैं।
व्हिप लागू होने वाले चुनावों में सांसदों/विधायकों को स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से मतदान करने की स्वतंत्रता दी जाती है।
इन चुनावों को गैर-पक्षीय प्रकृति का माना जाता है।
राष्ट्रपति एवं उप राष्ट्रपति के चुनावों में पार्टी व्हिप जारी करना अवैध और अनुचित माना जाता है। निर्वाचन आयोग स्पष्ट रूप से बताता है कि पार्टी द्वारा सांसदों/विधायकों को निर्देश (व्हिप) जारी करना आईपीसी की धारा 171-C के तहत सदस्यता समाप्ति का कारण नहीं बनता। पूर्व उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ने भी स्पष्ट कहा था कि राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति चुनाव में किसी भी पार्टी द्वारा व्हिप जारी नहीं किया जाता। यह कानूनन प्रतिबंधित है। भारत के चुनाव में यह ऐतिहासिक घटना मानी जाएगी कि नीलम संजीव रेड्डी 1977 में वह एकमात्र निर्विरोध निर्वाचित राष्ट्रपति रहे। उस उनके 37 में से 36 नामांकन रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा खारिज कर दिए गए, जिससे केवल उनका ही वैध नामांकन बचा रह गया। कांग्रेस पार्टी ने अपना आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी घोषित किया। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष निज़लिंगप्पा द्वारा उनके पक्ष में व्हिप जारी किया गया था।
लेकिन इंदिरा गांधी ने सदस्यों की स्वतंत्र पसंद पर बल दिया और कोई व्हिप नहीं। इंदिरा गांधी समर्थित उम्मीदवार वि. वी. गिरि, जो एक स्वतंत्र थे, नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बने। यानी, कांग्रेस का आधिकारिक प्रत्याशी हार गया। यह सत्तारूढ़ दल के एक अप्रत्याशित परिणाम का उत्कृष्ट उदाहरण है।
राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति चुनावों में कानूनी रूप से व्हिप जारी नहीं होता। इसी का नतीजा है कि नीलम संजीव रेड्डी 1977 में राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।
हालांकि राधाकृष्णन 1952 और 1957 में राधाकृष्णन तो 1979 में एम हिदायतुल्लाह और 1987 में शंकर दयाल शर्मा निर्विरोध रूप से उप राष्ट्रपति चुने गए। जबकि 1969 में कांग्रेस का अधिकृत उम्मीदवार उम्मीदवार चुनाव हार गया था, वि. वि. गिरि निर्वाचित हुए थे। गर इतिहास अपने आप को दोहराता है तो….

