एस आर दारापुरी
विकास को केवल आर्थिक वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय या निर्मित अवसंरचना से नहीं मापा जा सकता। उसका वास्तविक अर्थ यह है कि आर्थिक संसाधन नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और समान अवसरों में कितनी वृद्धि करते हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश और केरल की तुलना महत्वपूर्ण बनती है।
उत्तर प्रदेश विशाल जनसंख्या, बड़े घरेलू बाजार और व्यापक आर्थिक क्षमता वाला राज्य है। हाल के वर्षों में यहाँ अवसंरचना, संपर्क-सुविधाओं और बुनियादी सेवाओं के विस्तार के साथ बहुआयामी गरीबी में उल्लेखनीय कमी हुई है। केरल का विकास-पथ अपेक्षाकृत छोटे आर्थिक आधार पर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास में दीर्घकालिक सार्वजनिक निवेश से निर्मित हुआ है। इसलिए दोनों राज्यों की तुलना का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा मॉडल दूसरे से बेहतर है, बल्कि यह है कि आर्थिक संसाधनों को मानवीय क्षमताओं और सामाजिक परिणामों में बदलने की प्रक्रिया दोनों राज्यों में किस प्रकार अलग रही है।
तुलनात्मक विकास सूचकांक
सूचकांक
उत्तर प्रदेश
केरल
वर्ष/स्रोत
SDG India Index समग्र स्कोर
79
2023–24
बहुआयामी गरीबी
22.93%
0.55%
2019–21
बहुआयामी गरीबी
37.68%
0.70%
2015–16
बहुआयामी गरीबी में कमी
14.75 प्रतिशत-
0.15 प्रतिशत –
2015–16 से 2019– 21
बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले लोग
लगभग 3.43 करोड़
—
2015–16 से 2019–21
स्रोत: NITI Aayog, National Multidimensional Poverty Index: Progress Review 2023; SDG India Index 2023–24. (NITI Aayog)
तालिका दो अलग लेकिन महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने रखती है। उत्तर प्रदेश में बहुआयामी गरीबी में बड़ी गिरावट हुई है, जबकि केरल का गरीबी अनुपात पहले से ही बहुत निम्न स्तर पर था। इसी प्रकार SDG Index में दोनों राज्यों के बीच अंतर है, लेकिन उत्तर प्रदेश भी 2023–24 में “Front Runner” श्रेणी में था। (NITI Aayog)
इसलिए तुलना को केवल वर्तमान स्तरों के आधार पर नहीं, बल्कि प्रारंभिक स्थिति, परिवर्तन की गति और विकास की गुणवत्ता—तीनों के आधार पर करना चाहिए।
1. आर्थिक वृद्धि और गरीबी
उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विकासात्मक शक्ति उसका आकार है। विशाल जनसंख्या, कृषि, विनिर्माण, निर्माण, सेवाएँ और बढ़ता बुनियादी ढाँचा इसे बड़े आर्थिक विस्तार की संभावनाएँ देते हैं। लेकिन बड़े GSDP का अर्थ स्वतः उच्च जीवन-स्तर नहीं होता। प्रति व्यक्ति आय, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुँच अधिक महत्वपूर्ण परिणाम हैं।
केरल का आर्थिक आधार छोटा है, लेकिन उसकी प्रति व्यक्ति आय और मानव-विकास उपलब्धियाँ लंबे समय से अपेक्षाकृत मजबूत रही हैं। इसलिए दोनों राज्यों की तुलना में कुल आर्थिक आकार और प्रति व्यक्ति समृद्धि को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
गरीबी के मामले में उत्तर प्रदेश में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है। NITI Aayog के अनुसार बहुआयामी गरीबी 2015–16 के 37.68 प्रतिशत से घटकर 2019–21 में 22.93 प्रतिशत हुई और लगभग 3.43 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। केरल में इसी अवधि में अनुपात 0.70 प्रतिशत से घटकर 0.55 प्रतिशत रहा। (NITI Aayog)
यह अंतर दोनों राज्यों की विकास-यात्राओं को समझने की कुंजी है: उत्तर प्रदेश में गरीबी घटाने की चुनौती अभी बड़ी है; केरल में चुनौती निम्न गरीबी के बाद मानव विकास की गुणवत्ता और स्थायित्व को बनाए रखने की है।
2. अवसंरचना से मानव क्षमता तक
अवसंरचना को विकास का अंतिम लक्ष्य मानने के बजाय उसे मानव क्षमताओं का साधन समझना अधिक उचित है।
सड़कें बाजार और रोजगार से जोड़ती हैं; बिजली शिक्षा और उत्पादन को सक्षम बनाती है; जल और स्वच्छता स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं; डिजिटल संपर्क शिक्षा, वित्तीय सेवाओं और सरकारी योजनाओं तक पहुँच बढ़ाता है।
लेकिन परिसंपत्ति का निर्माण और विकास-परिणाम एक ही चीज नहीं हैं। विद्यालय की इमारत शिक्षा की गारंटी नहीं देती और अस्पताल की इमारत स्वास्थ्य की। इसके लिए शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, दवाएँ, संस्थागत क्षमता और जवाबदेही भी आवश्यक हैं।
यहीं उत्तर प्रदेश और केरल के विकास-पथों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश में भौतिक अवसंरचना के विस्तार को अब शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल की गुणवत्ता से अधिक मजबूती से जोड़ना आवश्यक है। केरल का अनुभव बताता है कि सामाजिक अवसंरचना में निरंतर निवेश भौतिक निवेश के प्रभाव को व्यापक बना सकता है।
अतः मुख्य नीति-प्रश्न है: अवसंरचना से नागरिकों की वास्तविक क्षमताएँ कितनी बढ़ीं?
3. शिक्षा और स्वास्थ्य: विकास का मानवीय आधार
शिक्षा और स्वास्थ्य आर्थिक वृद्धि को मानवीय विकास में बदलने की केंद्रीय संस्थाएँ हैं।
केरल की विकास-यात्रा में व्यापक साक्षरता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक निवेश की ऐतिहासिक भूमिका रही है। इसके परिणाम केवल शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने सामाजिक जागरूकता, महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक गतिशीलता को भी प्रभावित किया।
उत्तर प्रदेश में अब प्राथमिक चुनौती सुविधाओं की संख्या से अधिक गुणवत्ता और समानता की है। बुनियादी सीखने के परिणाम, माध्यमिक शिक्षा की निरंतरता, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, पोषण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य को आर्थिक विकास की रणनीति से जोड़ना आवश्यक है।
इसलिए शिक्षा और स्वास्थ्य को कल्याणकारी खर्च भर मानना पर्याप्त नहीं है। वे उत्पादक मानव पूँजी और सामाजिक नागरिकता दोनों के आधार हैं।
4. लैंगिक और सामाजिक असमानता
राज्य का औसत विकास-आँकड़ा सामाजिक समूहों के भीतर की असमानताओं को छिपा सकता है। इसलिए महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य वंचित समूहों तथा ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के परिणामों को अलग से देखना आवश्यक है।
महिला शिक्षा की उपलब्धि तभी व्यापक विकास में बदलती है जब वह आर्थिक भागीदारी, रोजगार, आय और निर्णय लेने की क्षमता में भी दिखाई दे। इसी प्रकार गरीबी घटने का अर्थ तभी व्यापक सामाजिक परिवर्तन होगा जब वंचित समुदायों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में भी सुधार हो।
इसलिए विकास का मूल्यांकन “कितना विकास हुआ” के साथ-साथ “किसके लिए विकास हुआ” के प्रश्न से भी होना चाहिए।
5. SDG और विकास की व्यापक तस्वीर
SDG India Index 2023–24 में केरल का समग्र स्कोर 79 और उत्तर प्रदेश का 67 था; राष्ट्रीय स्कोर 71 था। दोनों राज्यों को “Front Runner” श्रेणी में रखा गया। (NITI Aayog)
यह सूचकांक विकास को गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा, लैंगिक समानता, रोजगार, पर्यावरण और अन्य लक्ष्यों के संयुक्त ढाँचे में देखने का अवसर देता है। इसलिए यह केवल आर्थिक वृद्धि से अधिक व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करता है।
फिर भी कोई एक समग्र सूचकांक विकास की पूरी वास्तविकता नहीं पकड़ सकता। राज्य के भीतर जिलों और सामाजिक समूहों के बीच अंतर को भी देखना आवश्यक है। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
6. दो विकास-पथ, एक साझा चुनौती
केरल के विकास-पथ की प्रमुख विशेषता सामाजिक क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश रही है। उत्तर प्रदेश की हालिया विकास-यात्रा में अवसंरचना, संपर्क, आर्थिक विस्तार और सेवा-प्रसार को अधिक प्रमुखता मिली है।
इन दोनों को विरोधी मॉडल मानना आवश्यक नहीं है। आर्थिक वृद्धि संसाधन उपलब्ध कराती है; अवसंरचना अवसरों तक पहुँच बढ़ाती है; शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल उन अवसरों का उपयोग करने की क्षमता पैदा करते हैं; और रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा उन्हें जीवन-स्तर में बदलते हैं।
इसलिए उत्तर प्रदेश के लिए अगली विकासात्मक चुनौती भौतिक अवसंरचना को सामाजिक और मानवीय अवसंरचना से जोड़ना है।
7. आंबेडकरवादी दृष्टिकोण
आंबेडकरवादी दृष्टि से विकास का मूल्यांकन केवल संपत्ति और आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तभी सार्थक होते हैं जब नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के अवसर मिलें।
इस दृष्टि में विकास के दो स्तर हैं:
पहला, परिसंपत्तियों का निर्माण;
दूसरा, क्षमताओं का निर्माण।
सड़क, बिजली, भवन और डिजिटल नेटवर्क पहली श्रेणी में आते हैं; शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और संस्थागत समानता दूसरी में। वास्तविक विकास तब होता है जब पहली श्रेणी दूसरी को मजबूत करती है।
यही कारण है कि विकास के आँकड़ों का सामाजिक वितरण महत्वपूर्ण है। यदि औसत आय बढ़े लेकिन जाति, लिंग या क्षेत्र के आधार पर अवसरों में गहरी असमानता बनी रहे, तो आर्थिक वृद्धि को पूर्ण सामाजिक विकास नहीं माना जा सकता।
8. उत्तर प्रदेश के लिए विकास की अगली दिशा
उत्तर प्रदेश के सामने पाँच प्रमुख कार्यक्षेत्र उभरते हैं:
आर्थिक वृद्धि को गुणवत्तापूर्ण रोजगार से जोड़ना।
अवसंरचना निवेश को शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल से जोड़ना।
महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक भागीदारी बढ़ाना।
SC, ST और अन्य वंचित समूहों के विकास-परिणामों को अलग से मापना।
राज्य औसत के साथ जिला-स्तरीय असमानताओं को नीति का आधार बनाना।
इसका अर्थ विकास की दिशा बदलना नहीं, बल्कि उसके परिणामों की गुणवत्ता को बदलना है।
निष्कर्ष
उत्तर प्रदेश और केरल की तुलना से एक स्पष्ट विकासात्मक संबंध सामने आता है: आर्थिक संसाधन → अवसंरचना → मानवीय क्षमताएँ → सामाजिक परिणाम।
उत्तर प्रदेश में गरीबी और बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है, जबकि केरल का अनुभव शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक निवेश के दीर्घकालिक प्रभाव को दिखाता है। SDG और बहुआयामी गरीबी के आँकड़े दोनों राज्यों की अलग-अलग विकासात्मक स्थितियों को रेखांकित करते हैं। (NITI Aayog)
इस तुलना का सार यह नहीं कि एक राज्य दूसरे का अनुकरण करे। अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उत्तर प्रदेश आर्थिक और भौतिक विस्तार को उच्च-गुणवत्ता वाले मानव विकास में कैसे परिवर्तित करता है, जबकि केरल निम्न गरीबी और उच्च मानव-विकास की उपलब्धियों को आर्थिक अवसरों तथा सतत विकास से कैसे जोड़ता है।
आंबेडकरवादी कसौटी पर अंतिम प्रश्न यही रहेगा: क्या विकास से नागरिकों की स्वतंत्रता, समान अवसर, सामाजिक गतिशीलता और गरिमा का विस्तार हुआ? यदि उत्तर हाँ में है, तभी आर्थिक वृद्धि और अवसंरचना व्यापक सामाजिक विकास का रूप लेती हैं।
अतः विकास का मूल्यांकन परिसंपत्तियों से नहीं, बल्कि उनसे निर्मित मानवीय क्षमताओं और सामाजिक परिणामों से होना चाहिए।

