फतेहपुर में नवाब अब्दुल समद मकबरे को लेकर हुए विवाद में दोनों पक्षों के वकीलों ने अपने-अपने दावे पेश किए हैं। यह विवाद मकबरे को मंदिर बताने और उसमें तोड़फोड़ के बाद भड़का, जिसमें हिंदू संगठनों और मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव बढ़ गया।
हिंदू पक्ष के वकील का बयान:
हिंदू पक्ष के वकील ने दावा किया कि विवादित स्थल ऐतिहासिक रूप से ठाकुर जी का मंदिर है। उनके अनुसार, संरचना में त्रिशूल, कमल के फूल और अन्य हिंदू धार्मिक प्रतीक मौजूद हैं, जो मंदिर होने का संकेत देते हैं। उन्होंने कहा कि अभिलेखों में यह जमीन पहले गिरधारी लाल और राय ईश्वर सहाय की जमींदारी में थी, और 1927-28 में बंटवारे के बाद यह सतीशचंद्र और राय ईश्वर के खाते में दर्ज हुई। उनका दावा है कि यह स्थल मूल रूप से शिव और श्रीकृष्ण का मंदिर था, जिसे बाद में मकबरे का रूप दिया गया। वकील ने यह भी कहा कि 2007 में कुछ लोगों ने धोखे से इस जमीन को वक्फ बोर्ड के नाम दर्ज कराया, और यह मामला वर्तमान में फतेहपुर सिविल कोर्ट में विचाराधीन है।
मुस्लिम पक्ष के वकील का बयान:
मुस्लिम पक्ष के वकील ने दावा किया कि यह स्थल नवाब अब्दुल समद का मकबरा है, जिसका इतिहास 300-500 साल पुराना है। उन्होंने “द इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया” (1881) और फतेहपुर गजेटियर (1906) का हवाला देते हुए कहा कि यह मकबरा मुगल शासक अकबर के पोते ने बनवाया था, जिसमें अब्दुल समद खान (मृत्यु 1699) और उनके बेटे अबू मोहम्मद (मृत्यु 1704) की कब्रें हैं। इसे “मंगी मकबरा” या “संगी मकबरा” (पत्थर का मकबरा) के नाम से जाना जाता है। वकील ने सरकारी अभिलेखों में इसे मकबरा दर्ज होने और मोहम्मद अनीश को आधिकारिक मुतवल्ली होने का दावा किया। उन्होंने हिंदू संगठनों पर ऐतिहासिक धरोहर के साथ छेड़छाड़ और जमीन पर कब्जे की कोशिश का आरोप लगाया।








