बाबा साहेब के बताए रास्ते पर चलकर ही दी जा सकती हैं उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि!

चरण सिंह 
डॉ. भीम राव अम्बेडकर को दलित चिंतक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जबकि वह जिंदगी भर दबे कुचले कमजोर और महिलाओं के मान सम्मान और अधिकार के लिए लड़ते रहे। आज की तारीख में लगभग सभी दल बाबा साहेब को वोटबैंक का जरिया बनाने में लगे रहते हैं पर उनके बताए रास्ते पर चलने को कोई तैयार नहीं। आज यदि उनकी पुण्यतिथि पर उनको सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो उनके बताए रास्ते का अनुपालन करें।

दरअसल भीम राव अंबेडकर का संपूर्ण जीवन जातीय भेदभाव और असमानता के खिलाफ एक संघर्ष था। वैसे तो वह हर कमजोर आदमी की आवाज थे पर उन्होंने दलित समुदाय के लिए समान अधिकार, शिक्षा, और राजनीतिक भागीदारी की मांग जोरदार तरीके से की। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग की थी, लेकिन महात्मा गांधी के आमरण अनशन के बाद पूना समझौता कर अपनी मांग वापस ली।

अबेंडकर ने लेबर पार्टी की स्थापना की। वह संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए। इतिहास में उनका नाम भारत के पहले कानून मंत्री के तौर पर दर्ज है। उन्होंने बॉम्बे नॉर्थ सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन हार का सामना किया। बाबा साहेब दो बार राज्यसभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। डॉ. भीमराव अंबेडकर का 6 दिसंबर 1956 को निधन हो गया। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें साल 1990 में मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

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