इसी पोस्ट में साथी अनिरुद्ध ने यह शिकायत भी व्यक्त की कि जिस राजनारायण ने हिंदुस्तान के राजनीतिक इतिहास को दिशा दी थी उनके पुत्र राधे मोहन जी गुमनामी के अंधेरे में पड़े रहे। पोस्ट से यह भी पता चला कि वह भाजपा के बहुत ही सक्रिय कार्यकर्ता, समर्थक भी रहे परंतु किसी ने भी उनकी खैर खबर नहीं ली। जहां तक राजनारायण जी का सवाल है हिंदुस्तान के राजनीतिक इतिहास में उनका नाम हमेशा अव्वल दर्जे के नेता के रूप में दर्ज रहेगा। स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा राजनारायण जी सोशलिस्ट तहरीक के उन नेताओं में थे जिन्होंने तमाम उम्र वंचको, बेजुबानों, सर्वहारा गुरबत में रहने वाले, अकलियत दलितों पिछड़ों की हिमायत करने में अपनी जिंदगी खपा दी थी। उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहा, इसलिए आज भी हजारों हज़ारों हजार की तादाद में लोग उन्हें अपना आदर्श पुरुष मानते हैं।
राधे मोहन जी भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता समर्थक थे परंतु बीजेपी वालों ने उनकी कोई खैर खबर नहीं ली, इसकी जिम्मेदारी किसकी है? समाजवादी आंदोलन जो आज एक संगठित व्यवस्थित रूप में नहीं है उसके बावजूद उसमें कार्य करने वाले कार्यकर्ता आज भी दुःख सुख में साथ खड़े हुए देखे जाते हैं। यही फर्क है विचारधारा से जुड़े हुए लोगों और सत्ता सुख के लालच में किसी के पीछे लगने का। रामनारायण जी ही इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। बिना किसी पद, सत्ता, दौलत के फकीरी के रूप में उनका इंतकाल हुआ इसके बावजूद उनकी शव यात्रा में जिस प्रकार तमाम बनारस सड़कों पर आ गया, सैकड़ो कार्यकर्ता मूल्क के कोने-कोने से अपनी श्रद्धांजलि देने के लिए बनारस पहुंचे। कहा जाता है की मालवीय जी के अपवाद को छोड़कर इतना बड़ा जनसमूह कभी किसी की शव यात्रा में शामिल नहीं हुआ। रामनारायण जी ने कभी अपने परिवार के लिए कुछ नहीं किया। मगर हिंदुस्तान में हजारों ऐसे लोग हैं जिनका अस्तित्व राज नारायण जी के कारण बना है। मैं पुनः राधे मोहन जी के लिए अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं।

