नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में खराब होते हालात और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच सरकार इकॉनमी के लिए जरूरी चीजों के आयात में कमी लाने के लिए कई कदम उठा रही है। इनका मकसद सप्लाई चेन को सुरक्षित रखना और करेंसी पर दबाव कम करना है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि पीएम ऑफिस ने प्रमुख मंत्रालयों को उन सामानों की पहचान करने का निर्देश दिया है, जिनके लिए आयात पर निर्भरता ज्यादा है और जिन्हें स्थानीय रूप से बने उत्पादों से बदला जा सकता है। सरकार घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी और अन्य प्रोत्साहन देने पर विचार कर रही है।
सूत्रों ने बताया कि वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय 100 से ज्यादा उत्पादों की सूची तैयार कर रहा है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल, जरूरी दवाएं, फर्टिलाइजर, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और मशीनरी शामिल हैं। देश में इन चीजों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। कई मंत्रालयों के बीच इस बारे में चर्चा चल रही है। हालांकि अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
कैसे सामने आई कमजोरी?
घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए कैबिनेट ने बुधवार को चिप और स्मार्टफोन उत्पादन के लिए 1.9 लाख करोड़ रुपये की योजनाओं को मंजूरी दी। साथ ही देश में फर्टिलाइजर उत्पादन बढ़ाने की नीति को भी मंजूरी दी गई। भारत की मैन्युफैक्चरिंग काफी हद तक विदेशों खासकर चीन से आने वाले कच्चे माल पर निर्भर है। इससे सप्लाई में रुकावट आने पर यह इंडस्ट्री कमजोर हो जाती है। पिछले साल ऑटो और टेक इंडस्ट्री में ऐसा देखने को मिला था।
ईरान युद्ध ने भारत की निर्भरता को और उजागर कर दिया है। हाल के महीनों में ऊर्जा की भारी कमी और आयात बिलों में भारी वृद्धि हुई है। इससे रुपये में भारी गिरावट आई है। भारत ने पिछले वित्त वर्ष के दौरान लगभग $775 बिलियन मूल्य के सामान का आयात किया। इसमें से लगभग पांचवां हिस्सा अकेले चीन से आया। घरेलू क्षमता बढ़ाना अब पीएम नरेंद्र मोदी के आर्थिक एजेंडे का एक अहम हिस्सा है।
कौन कर रहा है माथापच्ची?
इसका मकसद व्यापार घाटा कम करना, विदेशी मुद्रा बचाना और भारत को चीन के विकल्प के तौर पर मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है। सूत्रों का कहना है कि शक्तिकांत दास की अगुवाई वाली एक टास्क फोर्स अर्थव्यवस्था के लिए इम्पोर्ट सब्स्टीट्यूशन का ब्लूप्रिंट तैयार कर रही है। मोदी ने प्रमुख सरकारी मंत्रालयों को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने का निर्देश दिया है जहां भारत ज्यादा कुशलता से और कम लागत पर सामान बना सकता है।
सरकार देश में फैक्ट्री लगाने के लिए प्राइवेट और विदेशी निवेशकों को मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव देने पर विचार कर सकती है या सरकारी कंपनियों से जॉइंट वेंचर के जरिए अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कह सकती है। मोदी के ऑफिस और कॉमर्स एंड इंडस्ट्री मिनिस्ट्री ने इस बारे में ईमेल का जवाब नहीं दिया।
कहां है आयात घटाने की गुंजाइश?
कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने राज्यों और इंडस्ट्री से ऐसे प्रोडक्ट की पहचान करने को कहा जिन्हें देश में कॉम्पिटिटिव तरीके से बनाया जा सके। अधिकारियों का कहना है कि कच्चे तेल, सोने और जरूरी खनिजों के आयात में कमी करना मुश्किल है लेकिन सरकार कृषि सुधारों के जरिए दाल और खाद्य तेल पर निर्भरता कम करने की गुंजाइश देख रही है।
सूत्रों ने बताया कि जिन सेक्टर में आयात को तुरंत बदलना मुमकिन नहीं है, वहां सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए लंबी अवधि की रणनीति अपनाई जा सकती है। सरकार अगले तीन साल में फर्टिलाइजर के आयात में 30% की कमी लाने का लक्ष्य बना रही है। बंद पड़े कई फर्टिलाइजर प्लांट्स को फिर से शुरू करने की योजना बनाई जा रही है और कुछ प्रोजेक्ट्स के अगले साल तक पूरे होने की उम्मीद है।

