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भ्रमजाल से बाहर निकला युवा, भविष्य के लिए अब आर-पार!

चरण सिंह

लद्दाख में तो आगजनी हुई पर क्या उत्तराखंड में छात्रों के आंदोलन में हिंसा है ? क्या उत्तराखंड में भी विदेशी ताकतें सक्रिय हैं ? तो उत्तराखंड का युवा क्यों उबल रहा है ? ये प्रश्न आज की  तारीख में केंद्र सरकार से बन रहे हैं। तो यह माना जाए कि अब युवा भ्रमजाल से बाहर निकलकर अपना भविष्य देख रहा है। उत्तराखंड में छात्राओं के आंदोलन को इसी रूप में देखा जा रहा है। जब युवाओं का हक़ मारकर किसी और दिया जाएगा तो यही होगा। पेपर लीक कर शिक्षा माफिया मोटी कमाई करते हैं और रात दिन मेहनत करने वाले बच्चे ठगे रह जाते हैं। सरकारें क्या कर रही है ?
उत्तराखंड में भी पेपर लीक मामले ने युवाओं का गुस्सा फूटा है। पूरे प्रदेश में युवा सड़कों पर हैं। देहरादून से लेकर छोटे कस्बों तक में युवाओं का गुस्सा देखने को मिल रहा है। युवाओं का कहना है कि पहाड़ में वैसे ही रोजगार के साधन सीमित हैं। मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के साथ जब नकल माफिया करोड़ों का खेल करते हैं तो उनका भरोसा टूट जाता है। युवाओं का कहना है कि वे गांव-घर छोड़कर किराए पर रहकर सालों से तैयारी कर रहे हैं। परिवार कर्ज और बोझ उठाता है। लेकिन जब पता चलता है कि लाखों रुपये लेकर परीक्षा का पेपर पहले ही बिक चुका है, तो उनके सपनों का भविष्य वहीं खत्म हो जाता है।
सवाल उठाया गया कि परीक्षा के तुरंत बाद ही जब प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, तो पारदर्शिता कहां है? वैसे भी केंद्र सरकार के साथ ही बीजेपी शासित सरकारों को हिन्दू मुस्लिम करने से फुर्सत है कहां ? ऐसा नहीं है कि विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल दूध के धुले हुए हैं। क्योंकि सरकार बीजेपी की है तो कटखरे में तो बीजेपी को ही खड़ा किया जाएगा। हालांकि आई लव मोहम्मद और आई लव महादेव जैसे नारों के सहारा कुछ लोग धर्म के ठेकेदार भी माहौल को भुनाने में लग गए हैं।
दरअसल लोगों की यह धारणा बन चुकी है। बीजेपी ने हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर लम्बे समय तक लोगों को बरगला कर रखा। कोई रोजगार की बात करे तो उसे हिन्दू-मुस्लिम का पाठ पढ़ा दिया जाता। कोई भ्र्ष्टाचार की बात करे तो मुसलमानों की बढ़ती संख्या का डर दिखा दिया जाता। सरकार की खामियां गिनाए तो उसे किसी केस में उलझा दिया जाता। यदि खामियां गिनाने वाला प्रभावशाली हो तो उसे इनकम टैक्स, ईडी और सीबीआई से डरा दिया जाता। कोई इनसे भी न डरे तो तो उसे देशद्रोही बता दिया जाता। गंभीर धाराओं में जेल में डाल दिया जाता।
सरकार की मनमानी पर शिकंजा कसने वाले मीडिया की तो बात ही छोड़ दीजिये। मीडिया तो आज की तारीख में सरकार का प्रवक्ता बना हुआ है। बीजेपी डंडे के जोर पर आंदोलन को कुचलती रही है। किसान आंदोलन में 700 से अधिक किसानों ने दम तोड़ दिया पर सरकार आंदोलित किसानों को नक्सली, नकली किसान, खालिस्तानी न जाने क्या क्या कहा जाने लगा।  सरकार ने लोगों को दहशत में ला दिया था। तभी तो पीएम मोदी 1947 की बात करते हैं। गृह मंत्री आंटी शाह मोदी के 2029 और 2034 लोकसभा चुनाव लड़ने ओर जीतने की बात करते हैं।

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