प्रेमकुमार मणि
इधर एक नयी बहस भारतीय संविधान के निर्माता को लेकर चली है. यह बहस बाबासाहेब आंबेडकर बनाम बी एन राव कर दी गई है. आंबेडकर साहेब संविधान सभा की संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे. वरिष्ठ आई सी एस अधिकारी बी एन राव सलाहकारों में प्रमुख थे. 1948 में संविधान का एक कच्चा मसौदा उन्होने तैयार किया था. बी एन राव के आतिरिक्त के एम मुंशी और कई अन्य विद्वान समिति के सदस्य थे. इस तरह संविधान निर्माण एक सामूहिक कार्य था, जिस में कई तरह की भूमिका कई लोग निभा रहे थे. मसलन प्रेम बिहारी रायजादा ने अंग्रेजी में और वसंत कृष्ण वैद्य ने हिन्दी में हस्तलिखित प्रति तैयार की थी और नन्दलाल वसु के चित्रों से इसे संवारा -सजाया गया था. इस प्रति को संसद के पुस्तकालय में सुरक्षित रखा गया है.
इस तरह संविधान निर्माण एक सामूहिक प्रयास था, जिस में प्रारूप समिति के अध्यक्ष के तौर पर आंबेडकर को पहला श्रेय जाता है. जैसे आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण का पहला श्रेय जवाहरलाल नेहरू को जाता है, क्योंकि वह प्रधानमंत्री थे. इसका मतलब यह नहीं कि नेहरू ने अकेले राष्ट्र निर्माण कर दिया.
चाहे जैसे हो यह बात कुछ दशकों से लोगों के दिमाग में भर दी गई कि बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर भारतीय संविधान के निर्माता हैँ. यह उसी तरह है जैसे हम सब कहते रहे हैं कि गाँधी जी ने भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाई. यह सब सत्य भी है लेकिन अर्ध-सत्य. क्योंकि संविधान निर्माण या भारत को आजादी दिलाना एक सामूहिक प्रयास था, जिसका नेतृत्व बाबासाहेब या बापू कर रहे थे. क्रिकेट या किसी भी खेल में जीत का पहला श्रेय जैसे कप्तान को जाता है, वैसे ही आंबेडकर को संविधान निर्माण का श्रेय दिया गया और यह उचित भी है. लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं होता कि दूसरों की भूमिका नहीं थी.
लेकिन हमलोग अपने मानसिक गठन में किसी एक सृष्टिकर्ता में यकीन करने के अभ्यस्त हैँ. कई कारणों के मिलने से परिणाम निकलते हैँ, पर हम यकीन करना नहीं चाहते. विकासवादी सिद्धांत स्वीकार करने में हमें असुविधा होती है. इसीलिए किसी चीज के विकास-क्रम को हम जानना भी नहीं चाहते. गाँधी जी ने आजादी दिला दी, आंबेडकर साहब ने संविधान बना दिया, नेहरू जी ने देश का विकास कर दिया; जैसे जुमले हमारी उस मानसिकता के अनुकूल होते हैँ जो दुनिया को ईश्वरीकृत समझते हैँ. ईश्वर ने चुटकी बजाई और दुनिया बन गई. सभी धर्म के ग्रंथ ऐसी कथाओं को धारण करते हैं.
बी एन राव के प्रति मेरे मन में बड़ा सम्मान है. वह विद्वान थे और आई सी एस अधिकारी थे. जवाहरलाल नेहरू के विलायत में सहपाठी रहे थे. नेहरू ने अपने पिता को लिखे एक पत्र में बी एन राव की तारीफ करते हुए लिखा है कि एक विलक्षण लड़का यहाँ आया है जो पढ़ाई के अलावा कुछ जानता ही नहीं है. राव ने 1935 के इंडिया ऐक्ट के निर्माण में भी भूमिका निभाई थी. 9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा की जब पहली बैठक हुई तब अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद और दो उपाध्यक्षों के साथ ही बी एन राव विधि सलाहकार बनाए गए थे. भारतीय संविधान निर्माण के लिए सामग्री जुटाने के लिए कई देशों की उन्होने यात्रा की और वहाँ के संविधान का अध्ययन किया. यह बात भी सही है कि आंबेडकर मध्य 1947 में प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने. लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान निर्माण में विचारों की केन्द्रीय भूमिका थी. यह भूमिका मुख्य रूप से दो ही व्यक्ति निभा रहे थे – एक थे नेहरू और दूसरे थे आंबेडकर. आंबेडकर ने दलितों और दूसरे उत्पीडित तबकों के प्रति संविधान को ज़िम्मेदार बनाने में भूमिका निभाई. वहीं नेहरू भारतीय लोकतंत्र को आधुनिक व विवेकपूर्ण ढांचे के तहत रखने में रुचि ले रहे थे.
आज कुछ लोग जो हमारी पूरी सांस्कृतिक विरासत को दिन- रात ध्वस्त करने में लगे हैँ, जो कुछ करने के बजाय गाँधी, नेहरू, आंबेडकर सबकी आलोचना में दिलचस्पी ले रहे हैं उन्होने ही बी एन राव का मुद्दा विकृत रूप में उठाया है. वह न राव को समझते हैं , न आंबेडकर को. मुझे स्मरण है कुछ वर्ष पूर्व मैँने स्वयम् बी एन राव पर एक लेख लिखा था. लेकिन इसका अर्थ आंबेडकर साहब की तौहीन नहीं, संविधान निर्माण की प्रक्रिया पर विमर्श करना था. स्वयम् आंबेडकर ने राव के योगदान को स्वीकार किया है.








