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सच को सच ही बोलता, दर्पण हर हालात

सच को सच ही बोलता, दर्पण हर हालात।
चेहरों की परतें सभी, खोल दे एक साथ।।

झूठे रिश्ते, झूठे मुख, झूठे सब संवाद,
आइना फिर भी करे, सच्चाई का नाद।
दुनिया चाहे फेर ले, लाखों अपनी जात—
चेहरों की परतें सभी, खोल दे एक साथ।।

मन में कितना विष भरा, कितना भीतर लोभ,
दर्पण सब पहचानता, चाहे जितना क्षोभ।
सच से भागे आदमी, झूठ बनाए घात—
चेहरों की परतें सभी, खोल दे एक साथ।।

सज्जनता के वेश में, घूम रहे शैतान,
मीठे शब्दों के तले, छिपा हुआ अभिमान।
दर्पण के आगे नहीं, चलती कोई बात—
चेहरों की परतें सभी, खोल दे एक साथ।।

सौरभ कहता सत्य का, थामो सच्चा हाथ,
झूठ चमकता देर तक, टिकता कब दिन-रात।
आइना ही दे सके, मन को सही औकात—
चेहरों की परतें सभी, खोल दे एक साथ।।

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