दरअसल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव चरम पर है। इजरायल ने ईरान की कई परमाणु सुविधाओं, जैसे नतांज, फ़ोर्डो, और परचिन, पर हवाई हमले किए हैं, जिससे कार्यक्रम को भारी नुकसान पहुंचा है। इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि इन हमलों ने ईरान के परमाणु हथियार बनाने की क्षमता को गंभीर रूप से कमज़ोर किया है। दूसरी ओर, ईरान ने इन हमलों को “युद्ध की घोषणा” करार देते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है।
ईरान की संसद परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से बाहर निकलने की तैयारी कर रही है, जो यह संकेत देता है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करने के बजाय और तेज़ी से विकसित कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने परमाणु हथियारों से जुड़े विस्फोटक परीक्षण किए हैं, जिससे वैश्विक चिंता बढ़ी है।
अमेरिका का रुख अस्पष्ट है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि ईरान के पास अभी भी समझौता करने का समय है, लेकिन हमलों के बाद परमाणु वार्ता की संभावना कमज़ोर पड़ती दिख रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया कि अमेरिका इन हमलों में शामिल नहीं है, लेकिन इज़रायल को समर्थन देता है।
ईरान पर “सरेंडर” करने का दबाव बढ़ रहा है, खासकर इज़रायल और G7 जैसे मंचों से, जहां परमाणु हथियारों को रोकने की मांग उठ रही है। हालांकि, ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई और विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ़ कहा है कि वे परमाणु कार्यक्रम बंद नहीं करेंगे

