सियासी उठापटक तथा अधिकतर युवा पीढ़ी की फिल्मी, फैशन, क्रिकेट, धन कमाऊ कोई नौकरी या जरिया की बलवती चाहत के इस दौर में विचार दर्शन, इतिहास, साहित्य संस्कृति, मुल्क की आजादी के लिए मर मिटने वाले देशभक्तों की रोंगटे खड़ी करने वाली दास्तानों को जानने, सुनने, पढ़ने वालों का भी सिलसिला जारी है, भले ही उसकी रफ्तार धीमी तथा एक छोटे दायरे तक ही सीमित है।
विंध्य पर्वत माला की ओट में बने आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर के हरियाली से हरे भरे, ऊंचे दरख्तों, पेड़ पौधों, फूलों, बांसो के आलिंगनबद्ध झुरमुटों की सरसराहट तथा खुशबू से महक रहे कैंपस के हर मोड़, चौराहे पर जहां-तहां देसी विदेशी शिल्पकारों की छेनी हथौड़ी से तराशी गई कृतियां अपनी मौजूदगी का एहसास कराती है। अजूबा तो इस करामात में है कि यूनिवर्सिटी के हर दरो दीवार, क्लासरूम के अंदर बाहर लगी अनगिनत चित्रकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग हर आने वाले का ध्यान खींचती है।
यूनिवर्सिटी के तुरारी कैंपस में शास्त्रीय संगीत के गुरुकुल रिवायत के महाआचार्य उस्ताद अलाउद्दीन खान के नाम पर बने सभागार में दाखिल होने से पहले ही द्वार पर कबीर परंपरा के संगीत साघक कुमार गंधर्व की मूर्ति शिल्प की आकृतिके पास से आती कबीर भजनों की संगीतमय वाणी यकायक चकित होकर उनकी और निहारने पर मजबूर कर देती है। शास्त्रीय संगीत के महान कलाकारों के मूर्ति शिल्प तथा शिक्षा की देवी सरस्वती की धवल मूर्ति की आभा एहसास कराती है कि हम किसी तालीमी दुनिया में विचरण कर रहे हैं। गांधी के संदेशों से अटेपटे इस कैंपस में विचार दर्शन की सूक्तियां अपनी अलग ही कहानी बयां करते हुए नजर आती हैं। यूनिवर्सिटी के तुरारी कैंपस के ‘उस्ताद अलाउद्दीन खान सभागार’ की तरह सिधौली में बने ‘नाद’
मुक्ताकाश स्टेडियम जहां शास्त्रीय
संगीत, साहित्य, नाटक, कविता शायरी, कला के साथ-साथ दीक्षांत समारोह तथा अन्य अवसरों पर विभिन्न विषयों के विद्वानों के उद्बोधन, प्रस्तुतियों की महफिल सजी रहती है। पास ही में ‘डॉ राममनोहर लोहिया सभागार’ जहां भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी दार्शनिक डॉ राममनोहर लोहिया की शख्सियत के अनुरूप वैचारिक, शैक्षणिक, बौद्धिक आयोजन की प्रस्तुतियां तथा सवाल जवाब से सदैव वैचारिक मंथन होता रहता है।
इन दोनों सभागारों में तीन दिन तक यूनिवर्सिटी की ओर से आयोजित “गांधी विचार श्रृंखला”- ( तीन) का आयोजन ‘महात्मा गांधी- नेहरू- लोहिया’ पर केंद्रित था। इससे पूर्व भी ‘गांधी भगत सिंह, ‘गांधी डॉक्टर भीमराव अंबेडकर’ पर भी इस श्रृंखला का आयोजन हो चुका था। ।
9 अक्टूबर 2025 को कार्यक्रम की शुरुआत तुरारी परिसर में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश उपाध्याय के गांधी विचार श्रृंखला के संक्षिप्त परिचय से प्रारंभ हुई।
प्रथम सत्र: इतिहास दृष्टि,
तुरारी परिसर
अध्यक्ष, प्रोफेसर राजकुमार जैन वक्तागण: प्रोफेसर शशि भूषण उपाध्याय, प्रोफेसर आलोक बाजपेई, प्रोफेसर अजीत झा, द्वितीय सत्र: समाज एवं समाजशास्त्री दृष्टि
सिधौली परिसर
अध्यक्ष , प्रोफेसर आनंद कुमार वक्तागण: प्रोफेसर महेंद्र नाथ ठाकुर, प्रोफेसर सलिल मिश्र, डॉ पंकज कुमार
तृतीय सत्र अर्थशास्त्रीय चिंतन तुरारी परिसर
अध्यक्ष, सुदर्शन अयंगर,
वक्तागण: डॉ महेश शर्मा, प्रोफेसर बोघ प्रकाश, श्री ए रघु कुमार, द्वितीय दिवस 10 दिसंबर 25 शुक्रवार, चतुर्थ सत्र
विश्व दृष्टि
तुरारी परिसर
अध्यक्ष, प्रोफेसर एस डी मुनि वक्तागण: श्री चिन्मय मिश्र, प्रोफेसर हिलाल अहमद, श्री पुष्पमित्र
पांचवा सत्र, सांस्कृतिक दृष्टि
सिधौली परिसर
अध्यक्ष, प्रोफेसर सलिल मिश्रा वक्तागण: प्रोफेसर नंदकिशोर आचार्य, प्रोफेसर अनन्या बाजपेई, श्री रमाशंकर सिंह
पांचवा सत्र
विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मूल्य मीमांसा
तुरारी परिसर
अध्यक्ष,श्री प्रियदर्शन
वक्तागण: श्री चिन्मय मिश्र, प्रोफेसर गौहर रजा, डा दौलत सिंह चौहान
तृतीय दिवस, 11 अक्टूबर 25 शनिवार
सातवां सत्र, विवाद प्रबंधन संघर्ष शांति और नेतृत्व
अध्यक्ष, प्रोफेसर योगेश उपाध्याय वक्तागण: प्रोफेसर चिन्मय मिश्रा प्रोफेसर मिथिलेश कुमार, प्रोफेसर
अरुण कुमार त्रिपाठी
आठवां सत्र
स्त्री दृष्टि
सिथोली परिसर,
अध्यक्ष, श्रीमती वंदना राय
वक्तागण: सुश्री प्रज्ञा सिंह, प्रोफेसर सुचेता महाजन, डॉ सुप्रिया पाठक तीनों दिनों के प्रोग्राम में हाल खचाखच भरा रहा। विश्वविद्यालय के छात्र शिक्षकों के अतिरिक्त देशभर से आए हुए जिज्ञासु, विद्वान, सुघीजन के अतिरिक्त ग्वालियर बौद्धिक जगत के जाने-माने विद्वानों ने भी इस श्रृंखला के सभी वक्ताओं को ध्यान से सुना। हैरत इस बात की थी कि साइंस और टेक्नोलॉजी के छात्र भी दत्तचित्त होकर सुनते रहे। इस परिसंवाद की खासियत यह भी रही कि विद्वान वक्ताओं के भाषण के बाद विद्यार्थी और श्रोताओं द्वारा लिखित रूप में अनेकों प्रश्न भी किए गए, जिनका स्पष्टीकरण, जवाब वक्ताओं ने दिया।
इस अवसर पर दो पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ।
412 पृष्ठ मे प्रकाशित ‘डॉ राममनोहर लोहिया की सांस्कृतिक दृष्टि’
डॉक्टर लोहिया के 30 लेखो के इस संग्रह का संपादन, रमाशंकर सिंह ने किया। मेरा यकीन है कि यह किताब मील का पत्थर सिद्ध होगी। एक बार जो भी पाठक इस किताब को पढ़ लेगा वह लोहिया का दीवाना होने पर मजबूर हो जाएगा।
दूसरी पुस्तक, ए रघु कुमार द्वारा अंग्रेजी में लिखित पुस्तक “REViSITING RAM MANOHAR LOHIA” का हिंदी रूपांतरण,
राममनोहर लोहिया, एक पुनर्पाठ
वैकल्पिक समाजवाद के सिद्धांत और व्यवहार की चुनौतियां का अनुवाद, प्रोफेसर संजय जोठे द्वारा किया गया।
श्रृंखला के मध्य में, डॉ लोहिया द्वारा गोवा आजादी में की गयी पहल और संघर्ष पर आधारित नाटक ‘गोमांतक’ आईटीएम यूनिवर्सिटी के छात्रों द्वारा अभिनीत किया गया। पेशेवर नाटक कारों की प्रस्तुति के मुकाबले विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा खेला गया यह नाटक किसी भी मायने में कमतर दिखाई नहीं पड़ा।
इस अवसर पर,
अस्सी के आचार्य, प्रोफेसर नंद किशोर आचार्य
शीर्षक से आयोजित कार्यक्रम, प्रतिष्ठित हिंदी लेखक, विचारक एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वान प्रोफेसर नंदकिशोर आचार्य के जन्म दिवस के अवसर पर सुप्रसिद्ध विद्वान, अशोक वाजपेई की अध्यक्षता में अनेकों विद्वानों ने आचार्य जी के लेखन एवं जीवन की अनेकों छठाओं का वर्णन किया। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ऑफ एमिरेट्स आचार्य जी के जीवन पर आधारित एक वृत्त चित्त का प्रदर्शन, आचार्य जी की प्रतिभा का गहरा प्रभाव दर्शकों पर छोड़ रहा था।
मैंने अपने जीवन में दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, जामिया यूनिवर्सिटी की ओर से आयोजित बौद्धिक समागमों को देखा है, परंतु आईटीएम का यह आयोजन इस मामले में अनोखा रहा कि अन्य विश्वविद्यालय में वक्ताओं और विश्वविद्यालय का औपचारिक संबंध बना रहता है। परंतु आईटीएम की यह विचार श्रृंखला पारिवारिक आयोजन जैसी लग रही थी। अतिथियों के रहने ठहरने एवं एक स्थल से दूसरे स्थल तक आने-जाने की सारी व्यवस्था जैसे परिवार के किसी समारोह में होती है, वैसी ही इस कार्यक्रम में नजर आयी। आयोजन के अंत में विद्वानों की विदाई के समय एक बहुत ही आकर्षित थैला (बैग) में कई पुस्तकों के साथ-साथ ग्वालियर की प्रसिद्ध गजक के डिब्बे भी शामिल थे, भेंट किए गए। जितने भी विद्वानों ने इस आयोजन में शिरकत की वह अभिभूत थे तथा भविष्य में आयोजित होने वाले किसी भी कार्यक्रम में सहर्ष शामिल होने की सदिच्छा प्रकट कर रहे थे। साइंस एवं तकनीक विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित यह विचार श्रृंखला यादगार बन गई। इस पूरे आयोजन की रूपरेखा, संयोजन,आवभगत की जिम्मेदारी आईटीएम यूनिवर्सिटी के संस्थापक रमाशंकर सिंह की निगरानी में की गई।
राजकुमार जैन








