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वैज्ञानिक के रूप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महक रही बिजनौर मिट्टी की सौंधी खुशबू!

 कृषक परिवार से विश्व स्तरीय वैज्ञानिक और भारतीय ज्ञान-परंपरा के साधक तक बलवंत सिंह राजपूत

बीस वर्ष की आयु में विश्वविद्यालय में शुरू कर दिया था अध्यापन

गढ़वाल और कुमाऊं विश्वविद्यालय के रहे कुलपति, उत्तर प्रदेश राज्य उच्च शिक्षा परिषद के रहे अध्यक्ष

लच्छीरामपुर/बिजनौर/लखनऊ/नई दिल्ली। जनपद बिजनौर के एक किसान परिवार में जन्मे बलवंत सिंह राजपूत ने अपने जज्बे, लगन और संघर्ष के दम पर एक से बढ़कर एक कृतिमान स्थापित किए। तमाम परेशानियों को दरकिनार कर ऐसी छलांग लगाई कि हर कोई उनकी प्रतिभा का लोहा मान गया। बचपन में कुश्ती का शौक रखने वाले बलवंत सिंह राजपत शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे दौड़े कि उपलब्धियों के ढेर लगा दिए। मुकाम ऐसा हासिल किया कि अपने गांव, जनपद, प्रदेश और देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन कर दिया। आज की तारीख में वह युवाओं के लिए प्रेणास्रोत हैं। कहा जाता प्रतिभा जब परिश्रम से जुड़ती है और ज्ञान जब राष्ट्रबोध से अनुप्राणित होता है, तब एक व्यक्ति केवल अपना जीवन नहीं बनाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का मार्ग भी प्रशस्त करता है। प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत का जीवन ऐसी ही विलक्षण साधना की कहानी है।
बिजनौर जनपद के छोटे से ग्राम लच्छीरामपुर के एक सामान्य कृषक परिवार में वर्ष 1944 में जन्मे बलवंत सिंह राजपूत की जीवन-यात्रा इस बात का प्रमाण है कि संसाधनों का अभाव प्रतिभा के मार्ग में बाधा नहीं बन सकता। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, परिश्रम निरंतर हो और ज्ञान के प्रति समर्पण अटूट हो, तो गांव की पगडंडी से निकलकर विश्वस्तरीय विज्ञान के शिखर तक पहुंचा जा सकता है।

उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के विद्यालय में हुई। पांचवीं कक्षा में उन्होंने पूरे सर्कल के लगभग पचास विद्यालयों में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद आगे की शिक्षा के लिए उन्हें गांव से लगभग छह किलोमीटर दूर किरतपुर के हिंदू इंटर कॉलेज जाना पड़ता था। प्रतिदिन सुबह पांच बजे घर से पैदल निकलना और विद्यालय से छुट्टी के बाद पैदल लौटकर लगभग ढाई बजे घर पहुंचना—यह क्रम दसवीं कक्षा तक चलता रहा। कठिन परिस्थितियों के बीच भी उनकी मेधा लगातार चमकती रही और छठी से नौवीं कक्षा तक प्रत्येक परीक्षा में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया।

वर्ष 1958 की उत्तर प्रदेश बोर्ड की दसवीं की परीक्षा उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनी। गणित और भौतिकी में उन्होंने शत-प्रतिशत तथा रसायन विज्ञान में 98 प्रतिशत अंक प्राप्त कर उल्लेखनीय रिकॉर्ड बनाया। बोर्ड की उच्च मेरिट में स्थान प्राप्त करने के कारण उन्हें राष्ट्रीय मेरिट छात्रवृत्ति मिली, जो आगे चलकर एमएससी तक उनकी शिक्षा का आधार बनी। इस प्रकार एक सामान्य किसान परिवार का प्रतिभाशाली बालक अपनी उच्च शिक्षा का अधिकांश सफर छात्रवृत्ति के सहारे पूरा करता गया।

वर्ष 1960 में राजकीय इंटर कॉलेज, बिजनौर से बारहवीं की परीक्षा उच्च प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने के साथ उन्होंने तीन विषयों में विशेष योग्यता प्राप्त की। इसके बाद आगरा विश्वविद्यालय से 1962 में बीएससी प्रथम श्रेणी एवं प्रथम स्थान से तथा 1964 में एमएससी भी प्रथम श्रेणी एवं प्रथम स्थान से उत्तीर्ण की।

बीस वर्ष की आयु में विश्वविद्यालय में अध्यापन

वर्ष 1964 में, मात्र बीस वर्ष की आयु में, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रवक्ता के रूप में नियुक्ति उनके असाधारण अकादमिक जीवन की शुरुआत थी। अध्यापन के साथ शोध की उनकी यात्रा भी तेजी से आगे बढ़ी। वर्ष 1969 में उन्होंने क्वांटम फील्ड थ्योरी में पीएचडी प्राप्त की।

कम उम्र में ही उन्होंने शोध निर्देशन और वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित कर ली। 1972 तक वे अनेक शोध छात्रों को पीएचडी के लिए मार्गदर्शन दे चुके थे और अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में उनके लगभग तीस शोधपत्र प्रकाशित हो चुके थे। मात्र 28 वर्ष की आयु में उनका नाम एक गंभीर और प्रतिभाशाली शोधकर्ता के रूप में स्थापित हो चुका था।

उनका जीवन केवल प्रयोगशाला और विश्वविद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा। देश के लोकतांत्रिक इतिहास के एक कठिन दौर—आपातकाल—में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाया। 1975 में उन्हें बंदी बनाकर लगभग छह माह करनाल जेल में रखा गया। जनवरी 1976 में रिहाई के बाद परिस्थितियां प्रतिकूल रहीं, तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से अवकाश लेकर उत्तर प्रदेश के गढ़वाल विश्वविद्यालय में भौतिकी के उपाचार्य एवं विभागाध्यक्ष का दायित्व संभाला।

जहां गए, वहां संस्थान को नई ऊंचाई दी

गढ़वाल विश्वविद्यालय में चार वर्षों के दौरान उन्होंने पांच शोध छात्रों को पीएचडी के लिए मार्गदर्शन दिया और विभाग को दो प्रमुख शोध परियोजनाएं दिलाईं। अक्टूबर 1980 में, मात्र 35 वर्ष की आयु में, वे कुमाऊं विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए। उस समय वे देश के सबसे कम आयु वाले प्रोफेसरों में अग्रणी थे।

कुमाऊं विश्वविद्यालय में उनका कार्यकाल केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का अध्याय नहीं, बल्कि संस्थागत निर्माण की एक उल्लेखनीय कहानी है। लगभग 26 वर्षों तक उन्होंने अध्यापन, शोध और प्रशासन के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। 1983 में वे विज्ञान संकाय के डीन बने। इस दौरान 25 शोध छात्रों को पीएचडी के लिए मार्गदर्शन दिया, लगभग 300 उच्च स्तरीय शोधपत्रों का प्रकाशन हुआ और अनेक प्रमुख शोध परियोजनाएं सफलतापूर्वक पूरी की गईं।

उनके नेतृत्व में विभाग को यूजीसी की DRS, DSA और COSIST जैसी प्रतिष्ठित योजनाओं के अंतर्गत महत्वपूर्ण सहायता मिली। उत्कृष्ट शोध के आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार ने विभाग को Center of Excellence घोषित किया और विशिष्ट अनुदान प्रदान किया। यूजीसी ने भी इसे Centre of Advanced Study के रूप में मान्यता दी।

यह उपलब्धियां बताती हैं कि प्रो. राजपूत केवल स्वयं शोध करने वाले वैज्ञानिक नहीं थे; वे शोध की ऐसी संस्कृति विकसित करने वाले शिक्षाविद् थे, जिसमें संस्थान, शिक्षक और विद्यार्थी साथ-साथ आगे बढ़ते हैं।

 कुलपति के रूप में संस्थान-निर्माण की दृष्टि

प्रोफेसर राजपूत की प्रशासनिक प्रतिभा भी उतनी ही प्रभावशाली रही। उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में एक वर्ष तथा कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में दो वर्ष दायित्व संभाला। इसके अतिरिक्त वे उत्तर प्रदेश राज्य उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष भी रहे।

उनके नेतृत्व में शैक्षणिक सत्रों की नियमितता, नए विभागों की स्थापना, शोध परियोजनाओं की स्वीकृति और अकादमिक गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ। गढ़वाल विश्वविद्यालय के विकास ने उसे आगे चलकर केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने की दिशा में मजबूत आधार प्रदान किया, जबकि कुमाऊं विश्वविद्यालय ने उनके कार्यकाल में शोध और अकादमिक उत्कृष्टता की नई ऊंचाइयां प्राप्त कीं।

 चार सौ शोधपत्र और ज्ञान की निरंतर साधना

प्रोफेसर राजपूत की वैज्ञानिक यात्रा का सबसे प्रभावशाली पक्ष उनकी निरंतर शोध-साधना है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोध पत्रिकाओं में उनके लगभग 400 शोधपत्र प्रकाशित हुए हैं, जिनके हजारों संदर्भ और उल्लेख दर्ज किए गए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में लगभग 100 शोधपत्र प्रस्तुत किए और भौतिकी के क्षेत्र में आठ पुस्तकों का लेखन किया।

किन्तु उनकी वास्तविक बौद्धिक विशेषता यह है कि उन्होंने आधुनिक भौतिकी के साथ-साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को भी वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का गंभीर प्रयास किया।

भारतीय ज्ञान-विज्ञान की पुनर्स्थापना के साधक

प्रोफेसर राजपूत का सबसे विशिष्ट योगदान यह है कि उन्होंने भारतीय ज्ञान-परंपरा को केवल सांस्कृतिक या दार्शनिक दृष्टि से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक विश्लेषण की कसौटी पर परखने का साहसिक कार्य किया।

उनकी पुस्तक “Scientific Analysis of Gita” इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जिसमें उन्होंने गीता के दार्शनिक सिद्धांतों को आधुनिक भौतिकी, ऊर्जा-संरक्षण, चेतना-विज्ञान और ब्रह्मांडीय संरचना के संदर्भ में समझने का प्रयास किया। यह कार्य इस बात का प्रमाण है कि भारतीय ग्रंथ केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि गहन वैज्ञानिक चिंतन के स्रोत भी हैं।

इसी प्रकार उनकी पुस्तक “Historical, Cultural and Scientific Heritages of India” भारत की उस समृद्ध परंपरा को पुनः स्थापित करती है, जिसमें गणित, खगोलशास्त्र, धातु-विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और ब्रह्मांडीय अवधारणाओं का अत्यंत उन्नत ज्ञान निहित रहा है।

उन्होंने यह स्पष्ट किया कि आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, चरक, सुश्रुत और कणाद जैसे भारतीय मनीषियों का ज्ञान केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान के साथ संवाद स्थापित करने योग्य जीवंत परंपरा है।

शोधार्थियों की पीढ़ियां तैयार करने वाले गुरु

लगभग 55 वर्षों की शोध-यात्रा में प्रोफेसर राजपूत ने 35 शोध छात्रों को पीएचडी और चार छात्रों को D.Sc. के लिए मार्गदर्शन दिया। उनके अनेक शिष्य आज विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर हैं और उनमें से एक कुलपति पद तक पहुंच चुका है।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने केवल शोध नहीं कराया, बल्कि भारतीय वैज्ञानिक दृष्टि और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु बनाने वाले विद्वानों की पीढ़ी तैयार की।

विज्ञान से समाज और राष्ट्र तक

प्रो. राजपूत का व्यक्तित्व केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि एक राष्ट्रचिंतक का भी है। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्या भारती और विज्ञान भारती जैसी संस्थाओं से जुड़े रहे। नई शिक्षा नीति के निर्माण में भी उनका योगदान रहा।

वे आज भी स्वतंत्र शोधकर्ता के रूप में सक्रिय हैं और भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक विमर्श में स्थापित करने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।

एक जीवन, अनेक आयाम

बलवंत सिंह राजपूत का जीवन वस्तुतः तीन धाराओं का संगम है—आधुनिक भौतिकी का गहन वैज्ञानिक अनुसंधान, उत्कृष्ट शैक्षणिक नेतृत्व और भारतीय ज्ञान-विज्ञान की पुनर्स्थापना का सांस्कृतिक-वैज्ञानिक अभियान।

लच्छीरामपुर के एक साधारण कृषक परिवार से निकलकर वे न केवल विश्वस्तरीय वैज्ञानिक बने, बल्कि उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा आज भी आधुनिक विज्ञान के साथ समान रूप से संवाद कर सकती है।

उनका जीवन इस सत्य का सशक्त प्रमाण है कि जब विज्ञान भारतीय चेतना से जुड़ता है, तब वह केवल प्रयोगशाला का विषय नहीं रहता, बल्कि सभ्यता के पुनर्जागरण का माध्यम बन जाता है।

प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत वास्तव में उसी पुनर्जागरण के साधक हैं—जहां आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय ज्ञान एक-दूसरे के पूरक बनकर मानवता के लिए नई दिशा निर्मित करते हैं।

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