20 को दिल्ली में संसद मार्च के बाद जंतर मंतर पर फिर से डटे आंदोलनकारी
निर्णायक दिन सरकार से बातचीत में उलझे रहे सीजेपी नेता और सोनम वांगचुक
सीजेपी नेतृत्व के जीपी नड्डा से मिलने से कमजोर हुआ आंदोलन
चरण सिंह
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर 20 जुलाई को दिल्ली में लाठीचार्ज के बावजूद जबरदस्त प्रदर्शन करने के बाद युवा फिर से जंतर मंतर पर आ धमके हैं। भले ही सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके और आइसा के छात्रों ने भी भूख हड़ताल तोड़ दी हो पर आंदोलन जारी है। जंतर मंतर पर फिर से युवाओं का हुजूम उमड़ पड़ा है। युवाओं के जोश से स्पष्ट लग रहा है कि अब ये युवा सरकार से दो दो हाथ करने के मूड में आरपार की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं।

आंदोलनकारियों को बिना जानकारी दिए निर्णायक मोड़ पर प्रख्यात सोशल एक्टिविस्ट सोनल वांगचुक के हस्तलिखित पत्र लिखने और सीजेपी नेतृत्व के संसद मार्च के दिन सुबह 10.45 स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मिलने से आंदोलन कमजोर होता प्रतीत हुआ है। पर लाठीचार्ज अरु आंसूगैस के गोले छोड़ने के बावजूद युवाओं के जोश ने आंदोलन की मजबूती को बरकरार रखा है।
ऐसे में बड़ा प्रश्न उठता है कि जब 20 तारीख से सरकार से किसी तरह की वार्ता की नहीं हुई तो फिर निर्णायक दिन के दिन यह वार्ता क्यों ? वह भी तब जब गृह मंत्री अमित शाह और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बीच कई घंटे की बातचीत हुई। मतलब यदि जेपी नड्डा से यह बातचीत न होती तो दिल्ली में युवाओं के सैलाब के दबाव में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हो सकता था। देखने की बात यह है कि जेपी नड्डा ने अपने एक्स हैंडल पर जो पोस्ट की है उसमें याचिका शब्द का इस्तेमाल किया है। तो क्या जेपी नड्डा से वार्ता के लिए सीजेपी ने आवेदन दिया था ?
एक ओर देश का युवा लाठी डंडे खा रहा तो दूसरी ओर आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सीजेपी नेता जेपी नड्डा से वार्ता में लगे थे। सीजेपी के प्रवक्ता विजय दहिया तो मेट्रो स्टेशन पर मौज करते हुए पाए गए। क्या वार्ता को दरकिनार का इन लोगों को मार्च का नेतृत्व नहीं करना चाहिए था ? सीधी सी बात थी कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होने से पहले सरकार से कोई वार्ता नहीं होनी चाहिए थी। जानकारी मिल रही है कि दीपके अब कह रहे हैं कि सरकार को उनसे बातचीत करनी है तो उसके प्रतिनिधि को मंच पर आना होगा। फिर जेपी नड्डा से मिलने क्यों गए ? क्या अब 20 जुलाई वाला माहौल बन पाएगा ? धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर क्यों नहीं अड़ा गया ?
यह भी अपने आप में दिलचप्स है कि जब देश का युवा लाठी डंडे खा रहा था तो दूसरी ओर पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक को एक हस्तलिखित पत्र लिख रहे थे। भूख हड़ताल को समाप्त करने के लिए शर्तें रख रहे थे। क्या एक दिन पत्र के लिए इंतजार नहीं किया जा सकता था ? 20 जुलाई को नेतृत्वकर्ताओं के व्यवहार से ऐसा लग रहा था कि जैसे ये लोग सरकार के दबाव में आ गए हों। उन्होंने शर्तों में शिक्षा प्रणाली में जवाबदेही सरकार NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक सहित, शिक्षा प्रणाली में हुई हालिया विफलताओं और गड़बड़ियों की जिम्मेदारी स्वीकार करे।
वांगचुक और युवा प्रदर्शनकारियों को संसद भवन में सांसदों से मिलने की अनुमति दी जाए या फिर राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता अस्पताल आकर उन्हें यह आश्वासन दें कि इस मुद्दे को संसद के मानसून सत्र में उठाया जाएगा। उनकी शर्तों में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा था ही नहीं, जबकि आंदोलन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के लिए हो रहा है।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि मार्च के दिन यह सब क्यों ? क्या सरकार ने सोनल वांगचुक से मांगें मांगी थी ? क्या सरकार ने सीजेपी से वार्ता की पेशकश की थी ? फिर निर्णायक मोड़ पर यह सब क्यों ? युवाओं की भीड़ से बैकफुट पर आनी चाहिए थी सरकार और देखे गए आंदोलन के नेतृत्वकर्ता। अब नेतृत्वकर्ताओं को आगे के आंदोलन की रणनीति युवाओं को बतानी चाहिए।

