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मुख्यमंत्री का बयान कॉर्पोरेट हितों को बचाने का प्रयास, उद्योग बंदी के असली कारणों से ध्यान भटका रहे हैं  

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (सीटू) गौतम बुध नगर जिला कमेटी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा ट्रेड यूनियनों को उद्योगों के बंद होने के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले बयान की कड़ी निंदा की है। सीटू ने इसे गैर-जिम्मेदाराना, असंवैधानिक और कॉर्पोरेट घरानों के हितों को साधने वाला बयान बताया है।

मुख्य बिंदु:
* मुख्यमंत्री का बयान गैर-जिम्मेदाराना: मुख्यमंत्री द्वारा एक समाचार पत्र के कार्यक्रम में ट्रेड यूनियनों को उद्योग बंदी और श्रमिकों की भुखमरी के लिए जिम्मेदार ठहराना संविधान की भावना के खिलाफ है। ट्रेड यूनियन बनाना अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकार है।    • नवउदारवादी नीतियां हैं बंदी की असली वजह: फैक्ट्रियां ट्रेड यूनियन की वजह से नहीं, बल्कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियों, निजीकरण, नोटबंदी, गलत जीएसटी, निवेश की कमी और कुप्रबंधन के कारण बंद हुई हैं। कानपुर की एनटीसी और बीआईसी मिलों को रिलायंस जैसे बड़े घरानों को बाजार देने के लिए बंद किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इन मिलों की जमीन रियल एस्टेट कारोबारियों को बेच दी।    • ट्रेड यूनियन पर हमला लोकतंत्र के लिए खतरा: औद्योगिक शांति और बेहतर उत्पादन के लिए पूंजीवाद ने ही लंबे संघर्षों के बाद ट्रेड यूनियन का अधिकार दिया था। भारत में 1926 से यह कानूनन अधिकार है। यूनियनें मजदूरों के सम्मानजनक वेतन, रोजगार सुरक्षा और अधिकारों के लिए लड़ती हैं। कई बार यूनियनों ने ही बीमार उद्योगों को बचाया है, क्योंकि सुरक्षित और संतुष्ट श्रमिक ही उत्पादन बढ़ाता है।
सीटू गौतम बुध नगर के जिला सचिव गंगेश्वर दत्त शर्मा ने कहा:

“मुख्यमंत्री का बयान हकीकत से कोसों दूर है। उद्योग बंद होने के पीछे सरकार द्वारा उद्योगपतियों को दी जा रही बेहिसाब छूट सबसे बड़ा कारण है। सरकार उद्योग लगाने के लिए सस्ती दरों पर जमीन देती है, टैक्स में छूट देती है। 5-10 साल बाद जब जमीन की कीमत कई गुना बढ़ जाती है, तो उद्योगपति फैक्ट्री बंद कर जमीन बेचकर मोटा मुनाफा कमाते हैं। फिर नए औद्योगिक क्षेत्रों में फिर से सस्ती जमीन और छूट का लाभ उठाते हैं।

कई बार सरकार और उद्योगपतियों की सांठगांठ से जब कंपनी बंद होने के कगार पर पहुंचती है, तब मजदूर अपने कानूनी बकाया और हकों के लिए यूनियन बनाते हैं। लेकिन प्रचार यह किया जाता है कि ‘यूनियन बनी इसलिए फैक्ट्री बंद हुई’। सच्चाई इसके उलट है – यूनियन इसलिए बनी क्योंकि फैक्ट्री बंद होने वाली थी।”

उत्तर प्रदेश में श्रमिकों की बदहाल स्थिति:
प्रदेश में मजदूर आधुनिक बंधुआ प्रथा में काम करने को मजबूर हैं। कारखाना अधिनियम में संशोधन कर काम के घंटे 12 कर दिए गए हैं। नए लेबर कोड से न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार छीन लिए गए हैं। 12 साल से न्यूनतम मजदूरी का रिवीजन नहीं हुआ। मुख्यमंत्री ने नोएडा में मई माह में वेज बोर्ड गठन, आंगनबाड़ी-आशा का मानदेय और आउटसोर्सिंग कर्मियों का वेतन बढ़ाने की घोषणा की थी, जो आज तक पूरी नहीं हुई।

सीटू ने मांग की है कि मुख्यमंत्री अपने बयान पर पुनर्विचार करें और कॉर्पोरेट के प्रतिनिधि की तरह काम करने के बजाय प्रदेश के लाखों मजदूरों के हित में नीतियां बनाएं। ट्रेड यूनियनों को दोष देना असली आर्थिक और नीतिगत विफलताओं से ध्यान हटाने का प्रयास है।

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