चरण सिंह
भारत महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी का देश है। यहां पर हिंसा की कोई गुंजाइश नहीं है। फिर ऐसा क्या हुआ कि लद्दाख में आंदोलनकारियों ने सीआरपीएफ की गाड़ी फूंक दी और बीजेपी का कार्यालय आग के हवाले कर दिया। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब नेपाल में क्रांति के बाद लगातार भारत में जेन-जी आंदोलन का अंदेशा जताया जा रहा था तो केंद्र सरकार ने इसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया ? यदि इस हिंसा में विदेशी हाथ है तो फिर खुफ़िआ एजेंसियां क्या कर रही थी ?
क्या सरकार यह मान कर चल रही थी कि उसने लोगों को इतना डरा-धमका रखा है कि कोई मुंह उठाने की हिमाकत नहीं कर सकता है। देखने की बात यह है कि लद्दाख बवाल में 4 लोगों की मौत हुई है और 80 के आसपास घायल बताए जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने लद्दाख हिंसा के लिए सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि सरकार ने लद्दाख के लम्बे आंदोलन और उनकी मांगों पर कोई ध्यान क्यों नहीं दिया ?
दरअसल लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर वांगचुक 10 सितम्बर से भूख हड़ताल थे। 14 दिन की भूख हड़ताल का भी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा ? क्या सरकार ने मांगों को लेकर उनसे कोई वार्ता की ? बुधवार को छात्रों और स्थानीय लोगों ने लेह में उनकी पिछली मांगें पूरी नहीं करने के विरोध में केंद्र के खिलाफ बंद बुलाया था तो सरकार सचेत क्यों नहीं हुई ? सरकार और विपक्ष दोनों को इस बात पर मंथन करना चाहिए कि लद्दाख में यह उग्र आंदोलन क्यों हो गया ? जहां तक बीजेपी के कार्यालय फूंकने की बात है तो बीजेपी को यह समझना होगा कि जब देश में प्रधानमंत्री खुद 80 करोड़ लोगों को फ्री में राशन देने की बात करते हैं तो फिर ये फाइव स्टार कार्यालय क्यों ? क्या ये कार्यालय देश की गरीबी को चिढ़ा नहीं रहे हैं ?
सरकार का रवैया देखिये कि सरकार वार्ता की जगह आंदोलन को कुचलने का रास्ता अख्तियार कर रही है। सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी पर देश का माहौल नहीं बिगड़ेगा ? गृह मंत्रालय का कहना है कि वांगचुक ने भड़काऊ बयानों से भीड़ को उकसाया। हिंसा के बीच अपना उपवास तो तोड़ा पर हालात काबू करने के प्रयास की जगह एम्बुलेंस से अपने गांव चले गए। सरकार कह रही है कि कई नेताओं ने वांगचुक से हड़ताल खत्म करने की अपील की थी पर उन्होंने हड़ताल जारी रखी।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या सरकार ने वांगचुक की मांगें मान ली थी ? जो वह हड़ताल खत्म करते। मतलब सरकार इसी तरह के दबाव बनाकर आंदोलन को खत्म करने की रणनीति अपनाती है। देखने की बात यह है कि 27 अगस्त 1989 को लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई थी। तब पुलिस गोलीबारी में तीन नागरिक मारे गए थे। केंद्र सरकार ने लद्दाख हिंसा के पीछे विदेशी कनेक्शन की भी आशंका जताई है। खुफिया एजेंसियां उन कनेक्शन की जांच कर रही हैं। लद्दाख हिंसा पर सरकार गंभीर है।
दरअसल वांगचुक इस साल फरवरी में पाकिस्तान गए थे। उनका एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो कह रहे हैं कि मैं पाकिस्तान के इस्लामाबाद हूं। यहां क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस में शामिल होने आया हूं। इसे पाकिस्तान की डॉन मीडिया ने आयोजित किया है। उधर केंद्र सरकार के उच्चाधिकारियों का मानना है कि लद्दाख में बुधवार को हुई हिंसा स्वाभाविक रूप से नहीं भड़की थी। यह एक पूर्वनियोजित साजिश थी और सब कुछ जानबूझकर कर किया गया। हिंसा ऐसे समय में हुई जब केंद्र ने लद्दाख की सुरक्षा व्यवस्था पर चर्चा के लिए शीर्ष निकाय, लेह (एबीएल) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के साथ 6 अक्टूबर को उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक पहले ही निर्धारित कर दी थी।

