पराली जलाने की आग में झुलसता उत्तर भारत : समाधान किसानों और पर्यावरण दोनों के हित में

हर वर्ष अक्टूबर–नवंबर के महीनों में पंजाब और हरियाणा के खेतों से उठने वाला धुआँ दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत की साँसें रोक देता है। पराली जलाना किसानों की विवशता और नीतिनिर्माताओं की विफलता दोनों का परिणाम है। जब तक किसान के हित, कृषि की आवश्यकताएँ और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़कर देखा नहीं जाएगा, तब तक न तो प्रदूषण घटेगा और न ही ग्रामीण भारत को स्थायी आजीविका का मार्ग मिलेगा।

डॉ. प्रियंका सौरभ

 

हर वर्ष जब धान की कटाई का मौसम आता है, तब पंजाब और हरियाणा के खेतों से उठने वाला धुआँ आसमान को धुंध से भर देता है। यह केवल खेतों की आग नहीं होती, बल्कि भारत की कृषि नीति, आर्थिक असमानता और पर्यावरणीय असंतुलन की जलती हुई तस्वीर होती है। दिल्ली तथा उसके आस-पास के क्षेत्र इस धुएँ से ढक जाते हैं और वायु गुणवत्ता अत्यंत गंभीर स्तर तक पहुँच जाती है।

कानूनी रूप से पराली जलाना प्रतिबंधित है, फिर भी किसान इसे हर साल दोहराते हैं क्योंकि इसके पीछे अनेक सामाजिक और आर्थिक कारण जुड़े हैं।

 

पराली जलाने का मूल कारण खेतों में बचा हुआ धान का ठूँठ होता है। जब धान की फसल कट जाती है, तब खेत में रह गए अवशेष को हटाने के लिए किसानों के पास न समय होता है न साधन। पंजाब और हरियाणा की कृषि व्यवस्था मुख्य रूप से धान और गेहूँ पर आधारित है। सन् 1960 के दशक की हरित क्रांति ने इन राज्यों को देश का अन्न भंडार तो बना दिया, परंतु कृषि को एकरूपी और जल–प्रधान भी बना दिया। भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए सन् 2009 में पंजाब में “उप–जल संरक्षण अधिनियम” लागू किया गया, जिसके अंतर्गत धान की रोपाई जून के अंत तक करने का निर्देश दिया गया ताकि मानसूनी वर्षा का लाभ लिया जा सके।

परिणामस्वरूप धान कटाई और गेहूँ की बुवाई के बीच केवल दस से बीस दिन का अंतर रह गया। इतने कम समय में किसान पराली को एकत्रित या सड़ाकर खेत तैयार नहीं कर सकते, इसलिए वे सबसे तेज़ और सस्ता उपाय—जलाना—चुन लेते हैं।

 

दूसरा बड़ा कारण आर्थिक है। पराली हटाने या निपटाने के लिए जो मशीनें चाहिए—जैसे सुपर स्ट्रॉ प्रबंधन प्रणाली, हैप्पी सीडर, बेलर या रोटावेटर—वे अत्यंत महँगी हैं। छोटे और सीमांत किसान जिनकी जोत तीन हेक्टेयर से भी कम है, वे इन मशीनों को खरीदने या किराए पर लेने में असमर्थ हैं। उदाहरण के लिए, हैप्पी सीडर का किराया लगभग दो से तीन हज़ार रुपये प्रति एकड़ पड़ता है, जबकि पराली जलाने में केवल माचिस और थोड़े डीज़ल का खर्च आता है। यही व्यावहारिकता इस समस्या को गहराई तक जकड़े हुए है।

 

तीसरा कारण पराली का कम उपयोग मूल्य है। पंजाब और हरियाणा में बोई जाने वाली अधिकतर धान की किस्में साधारण होती हैं, जिनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। ऐसी पराली पशु चारे के रूप में प्रयोग योग्य नहीं होती और न ही इससे जैव ईंधन या खाद आसानी से बनाई जा सकती है। पूर्वी भारत के राज्यों में धान की पराली पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग में आती है, परंतु पंजाब–हरियाणा में यह उपयोग सीमित है। इसीलिए यहाँ पराली किसानों के लिए किसी आर्थिक लाभ का साधन नहीं बन पाती।

 

चौथा कारण है श्रम की कमी और जोत का विखंडन। प्रवासी मजदूरों की संख्या घट रही है, और छोटे खेतों में मशीनरी लगाने की क्षमता नहीं है। समय की कमी और श्रमिकों के अभाव में किसान अगली फसल बोने की जल्दी में पराली को जला देते हैं।

 

सामाजिक दृष्टि से भी पराली जलाना वर्षों से एक स्वीकृत प्रक्रिया बन चुकी है। किसानों को यह लगता है कि खेत की सफाई का यही सबसे आसान और पारंपरिक तरीका है। कानूनों और जुर्मानों के बावजूद यह प्रथा इसलिए जारी है क्योंकि प्रवर्तन ढीला है और राजनीतिक दबावों के कारण प्रशासन कठोर कार्रवाई नहीं कर पाता। वर्ष 2023 में पंजाब में लगभग साठ हज़ार पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज की गईं, जबकि जुर्माना और निगरानी दोनों व्यवस्था में थे।

 

अब प्रश्न यह है कि इस समस्या का स्थायी समाधान क्या हो सकता है?

स्पष्ट है कि केवल प्रतिबंध या दंड इस समस्या को समाप्त नहीं कर सकते। आवश्यक है कि ऐसी रणनीति अपनाई जाए जो किसान की आजीविका और पर्यावरण संरक्षण दोनों को साथ लेकर चले।

 

पहला समाधान है फसल विविधीकरण। पंजाब और हरियाणा की भूमि लगातार धान–गेहूँ चक्र से थक चुकी है। जल स्तर भी नीचे जा रहा है। अतः मक्का, दलहन, तिलहन और बागवानी फसलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इन फसलों के लिए यदि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य, बीमा सुरक्षा और निश्चित खरीद सुनिश्चित करे तो किसान धीरे-धीरे धान पर निर्भरता कम कर सकते हैं। हरियाणा की “भावांतर भरपाई योजना” इस दिशा में एक अच्छा उदाहरण है, जिसमें किसानों को मूल्य अंतर की भरपाई दी जाती है।

 

दूसरा समाधान है यंत्रीकरण और साझा संसाधन। किसानों को मशीनें साझा उपयोग के लिए उपलब्ध कराई जाएँ। पंचायत या सहकारी समितियों के स्तर पर “कस्टम हायरिंग केंद्र” स्थापित हों, जहाँ से किसान कम किराए पर हैप्पी सीडर या सुपर स्ट्रॉ प्रबंधन प्रणाली जैसी मशीनें ले सकें। केंद्र सरकार की “फसल अवशेष प्रबंधन योजना” के अंतर्गत पंजाब और हरियाणा में एक लाख से अधिक मशीनें बाँटी गई हैं, पर इनकी पहुँच सभी किसानों तक नहीं हो पाई है। यदि हर गाँव में सामुदायिक यांत्रिक केंद्र बने, तो किसान पराली जलाने से बचेंगे।

 

तीसरा उपाय है पराली का औद्योगिक उपयोग। पराली को कचरा न मानकर एक संसाधन के रूप में देखा जाए। इससे जैव ऊर्जा, एथेनॉल, कागज़, पैकेजिंग और निर्माण सामग्री तैयार की जा सकती है। उदाहरण के लिए, भारतीय तेल निगम की पानीपत जैव रिफाइनरी प्रतिवर्ष लगभग दो लाख टन पराली से एथेनॉल बनाती है। यदि इस प्रकार की परियोजनाएँ हर जिले में स्थापित हों तो पराली किसानों के लिए आय का स्रोत बनेगी और जलाने की आवश्यकता कम होगी। सरकार को परिवहन सहायता, खरीद अनुबंध और स्थायी बाज़ार उपलब्ध कराने की नीति बनानी चाहिए।

 

चौथा कदम होना चाहिए कृषि–पर्यावरणीय समय निर्धारण। धान की छोटी अवधि वाली किस्में जैसे पी.आर.–126 या डी.आर.आर. धान–44 अपनाने से किसानों को फसल कटाई और बुवाई के बीच कुछ अतिरिक्त दिन मिल सकते हैं। इस समय का उपयोग पराली प्रबंधन में किया जा सकता है।

इसके साथ–साथ परिशुद्ध कृषि यानी सटीक तकनीकी साधनों का प्रयोग, जल–सिंचाई प्रणाली में सुधार और जैविक खाद उपयोग से भी पर्यावरणीय लाभ मिलेगा।

 

पाँचवाँ, सामुदायिक प्रोत्साहन और जनजागरूकता। पराली न जलाने वाले किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए, गाँव स्तर पर प्रतियोगिता आयोजित हो और “शून्य दहन ग्राम” घोषित किए जाएँ। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में “पुसा डीकंपोजर” नामक जैविक घोल के प्रयोग से पराली को खेत में ही खाद में बदला जा रहा है। यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो पराली जलाने की आवश्यकता नहीं बचेगी।

 

छठा, प्रशासनिक तालमेल और नीति–समन्वय। केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच सामंजस्य होना चाहिए ताकि कृषि, पर्यावरण और ऊर्जा विभाग एक साझा योजना के अंतर्गत काम करें। पराली प्रबंधन को ग्रामीण रोजगार योजना, जैव ऊर्जा मिशन और जलवायु परिवर्तन कार्यक्रमों से जोड़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए, मनरेगा के अंतर्गत पराली एकत्रीकरण या जैव खाद इकाइयों में कार्य को रोजगार से जोड़ा जा सकता है।

 

सातवाँ, शहरी–ग्रामीण सहभागिता भी इस दिशा में उपयोगी होगी। दिल्ली जैसे महानगर जहाँ प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव होता है, उन्हें अपने सामाजिक उत्तरदायित्व निधि के माध्यम से पंजाब–हरियाणा के किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए। इससे प्रदूषण के स्रोत और पीड़ित क्षेत्र के बीच साझा जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी।

 

इसके साथ-साथ तकनीकी निगरानी प्रणाली को भी सशक्त बनाना चाहिए। उपग्रह आधारित आँकड़ों से पराली जलाने की घटनाओं की त्वरित जानकारी मिल सकती है, जिससे स्थानीय प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप कर सके। परंतु यह हस्तक्षेप केवल दंडात्मक न होकर सहयोगात्मक होना चाहिए।

 

इन सभी उपायों का उद्देश्य यह है कि किसान को दोषी नहीं बल्कि भागीदार बनाया जाए। किसान पराली इसलिए जलाते हैं क्योंकि उनके पास व्यावहारिक विकल्प नहीं हैं। जब उन्हें ऐसे विकल्प मिलेंगे जो सस्ते, लाभकारी और पर्यावरण के अनुकूल हों, तो वे स्वयं इस समस्या के समाधान का हिस्सा बनेंगे।

 

अंततः यह समझना होगा कि पराली जलाना केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि सामाजिक–आर्थिक असंतुलन का परिणाम है। इसे रोकने के लिए किसानों के कल्याण, नीति सुधार और तकनीकी समर्थन का समन्वय आवश्यक है। यदि पराली को ऊर्जा, उद्योग और जैविक खाद के रूप में उपयोग में लाया जाए, तो यह प्रदूषण का कारण नहीं बल्कि विकास का साधन बन सकती है।

 

पराली जलाने की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंधों और दंड से नहीं, बल्कि संवेदनशील नीति, किसानों की सहभागिता और तकनीकी नवाचार से निकलेगा। जब फसल विविधीकरण, यंत्रीकरण, पराली का औद्योगिक उपयोग और सामुदायिक प्रोत्साहन एक साथ काम करेंगे, तब ही स्वच्छ वायु और सुरक्षित कृषि दोनों संभव होंगी। यह संतुलन ही उत्तर भारत को पराली की आग से मुक्त करने और टिकाऊ कृषि विकास की दिशा में अग्रसर करने का एकमात्र मार्ग है।

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