नई दिल्ली। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बड़ा मोर्चा खुल चुका है। कांग्रेस देशभर में आंदोलन कर रही है। विपक्ष की बैठक 30 तारीख को होनी है। उधर मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके राकेश कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) गैर-कानूनी है और उनका दावा है कि इसके माध्यम से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 का उल्लंघन कर रहे हैं। उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक लंबा-चौड़ा लेख लिखकर देशवासियों से पूछा है कि क्या वो चाहते हैं कि भारत एक लोकतंत्र बना रहे?
उन्होंने सोमवार को एक्स पर देशवासियों के नाम एक खुला पत्र लिखा, जिसमें सुप्रीम कोर्ट से जायज ठहराए जा चुके एसआईआर प्रक्रिया पर तीखा हमला बोला और देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा गया। उन्होंने कई दलीलें देकर यह बताने और समझाने की कोशिश की है कि एसआईआर की प्रक्रिया गैर-कानूनी है और सीईसी मनमानी किए जा रहे हैं।
‘एसआईआर पर फैसला सुप्रीम कोर्ट की साख पर बट्टा’
पूर्व आईएएस अधिकारी को एसआईआर प्रक्रिया में इतनी खोट नजर आ रही है कि उन्होंने इस उचित ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ भी हल्ला बोल दिया है। उन्होंने लिखा है, ‘एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उसकी साख पर बट्टा लगा है। ये निर्णय इमरजेंसी को जायज ठहराने जितना ही बदनाम है।’
‘ सीईसी ज्ञानेश कुमार पर आपराधिक केस करे विपक्ष’
आरके सिंह ने अपना यह ट्वीट ऐसे समय में किया है, जब विपक्ष सीईसी के खिलाफ महाभियोग लाने की संभावनाएं तलाशने में जुटा है और पूरे देश में इसे एक बड़ा राजनीतिक अभियान बनाने की ताक में है। हालांकि, आरके सिंह को लगता है कि विपक्ष के महाभियोग की कोशिशों में दम नहीं है। उन्होंने कहा, ‘विपक्ष कहता है कि वे ज्ञानेश कुमार को महाभियोग से हटा देंगे। यह बेकार की बात है। उनके पास इसके लिए संख्या नहीं है। अगर वे सच में समाधान चाहते हैं तो उन्हें ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज करना चाहिए।’
कानून के स्थापित सिद्धांत के उल्लंघन का दावा
पूर्व गृह सचिव का आरोप है कि 2003 के बाद दर्ज वोटरों के नाम बिना किसी उचित छानबीन के हटा दिए गए और दावा किया कि साक्ष्य देने की सारी जिम्मेदारी मतदाताओं पर थोप दी गई है। उनका कहना है, ‘कानून का स्थापित सिद्धांत ये है कि किसी व्यक्ति पर कोई पाबंदी या सजा दिलाने के लिए पर्याप्त आधार होने की बात साबित करने का उत्तरदायित्व उस व्यक्ति या संस्था की होती है, जो सजा देना चाहते हैं।’
13 करोड़ वोटरों के नाम कटने का दावा
उनका दावा है कि एसआईआर की प्रक्रिया खास कर गरीबों और प्रवासी वोटरों को नुकसान पहुंचा रही है। क्योंकि, उन्हें लगता है कि ऐसे लोगों के पास दस्तावेजों की कमी हो सकती है या वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी करने के लिए उनके पास संसाधनों का अभाव हो सकता है।
उनका दावा है कि अभी तक एसआईआर के नाम पर देश में 13 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से काटे गए हैं, जो कि कुल वोटरों का लगभग 13 फीसदी होती है।
उनका दावा है कि निश्चित रूप से इतने नाम कटने से चुनावों पर बड़ा असर पड़ सकता है।
सीईसी ज्ञानेश कुमार के बहाने कहां साध रहे निशाना
पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह दो-दो बार (2014 और 2019) बिहार के आरा लोकसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें फिर उम्मीदवार बनाया, लेकिन तीसरी बार वे चुनाव नहीं जीत सके।
चुनाव आयोग और सीईसी की संवैधानिक स्थिति
बता दें कि भारतीय चुनाव आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत होता है। यह एक स्थायी और स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। संवैधानिक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों अतिरिक्त चुनाव आयुक्त स्वतंत्र रूप से अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं और उनका कोई बॉस नहीं होता। आपस में भी ये तीनों समकक्ष ही होते हैं। साबित कदाचार की स्थिति में उन्हें उनके पद से हटाने के लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाती है, जो सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए निर्धारित की गई है। सीईसी ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे विवाद के मामले में इस संवैधानिक स्थिति के बारे में देश के पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी अपनी बेबाक राय दे चुके हैं।

