नई दिल्ली। भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत में विपक्ष और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े सवाल पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसे भारत का आंतरिक मामला बताया। मार्को रुबियो की टिप्पणी पर कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने बुधवार कहा हमारे विरोध प्रदर्शनों के बारे में कोई ‘गोरा आदमी’ क्या कहता है, इससे किसे फर्क पड़ता है। पवन खेड़ा की यह प्रतिक्रिया तब आई जब रुबियो ने भारत में विपक्षी दलों और छात्रों के विरोध प्रदर्शनों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
भारत में चल रहे आंदोलन को आतंरिक मामला बताते हुए मार्को रुबियो ने कहा कि यह एक घरेलू राजनीतिक मामला है। मैं उनकी राजनीति में शामिल नहीं होने वाला। यहां लोकतंत्र है, चुनाव होते हैं। मैं उनके घरेलू राजनीतिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करूंगा। ऐसे तो हमारे यहां अमेरिका में हर दिन विरोध प्रदर्शन होते हैं। रुबियो ने कहा कि विरोध प्रदर्शन और दंगों में फर्क होता है।
मैं दंगों की बात नहीं कर रहा, जैसे आप यूरोप में देख रहे हैं जहां तोड़फोड़ हो रही है, इमारतों में घुसा जा रहा है और उन्हें जलाया जा रहा है। कई मायनों में लोगों का बाहर निकलकर अपनी बात रखना इस बात का संकेत है कि यह एक ऐसा देश है जहां राजनीतिक चर्चा होती है और मतभेद होते हैं।
रुबियो ने यह बात तब कही, जब उनसे भारत में विरोध प्रदर्शनों से निपटने के तरीके पर संयुक्त राष्ट्र (UN) की आलोचना और प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई के UN विशेषज्ञों के आरोपों के बारे में पूछा गया। यूएन एक्सपर्ट्स की आलोचना को लेकर पूछे गए सवाल पर रुबियो ने हंसते हुए कहा, यूएन एक्सपर्ट्स… मेरे फेवरेट हैं। यूएन एक्सपर्ट्स खुद में ही एक विरोधाभास है।
भारत ने दिया करारा जवाब
भारत ने अपुष्ट आरोपों और अधूरे आंकड़ों के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नकारात्मक छवि पेश करने के प्रयासों का विरोध करते हुए कहा है कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा तरीके से देशों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय में उप सचिव बरखा ताम्रकर ने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्रों के साथ मिलकर काम करता है, लेकिन यह सहयोग संवाद, विचार-विमर्श और आपसी सहयोग पर आधारित होना चाहिए। साथ ही, इसमें बिना किसी भेदभाव के सभी देशों के साथ समान व्यवहार और पारदर्शिता के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। ताम्रकर की यह टिप्पणी नयी दिल्ली में हाल में युवाओं के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों द्वारा चिंता जताए जाने के बीच आई।

