डॉ. नीरज कृष्ण
हर साल दशहरे पर हम बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाते हैं। रावण के पुतले जलाते हैं और आतिशबाज़ी करते हैं। लेकिन जब उत्सव की राख ठंडी हो जाती है, तब एक असहज सवाल फिर सामने आ खड़ा होता है—यदि रावण बुराई का प्रतीक है, तो उसके दस सिर आज भी हमारे सार्वजनिक जीवन में बार-बार कैसे उभर आते हैं?
पौराणिक कथाओं में रावण एक राजा था, जबकि आज की सरकारें संविधान से बंधी हैं और जनता के जनादेश से सत्ता प्राप्त करती हैं। यदि राजतंत्र समाप्त हो चुका है, तो लोकतंत्र में राजतंत्र वाली मानसिकता कैसे जीवित है? क्या रावण के दस सिर आज भी सत्ता के अहंकार, संस्थाओं की निष्क्रियता, प्रचार के छल और नागरिक चेतना के पतन के रूप में दिखाई देते हैं, या वे केवल मिथक बनकर रह गए हैं?
लोकतंत्र के सामने चुनौती केवल सत्ता के अनियंत्रित इस्तेमाल की नहीं है। हर साल दशहरे पर हम रावण का दहन करके और आतिशबाज़ी जलाकर अच्छाई की बुराई पर विजय का उत्सव मनाते हैं। लेकिन जब उत्सव की राख ठंडी हो जाती है, तो एक बेचैन करने वाला सवाल फिर उठता है—यदि रावण बुराई का प्रतीक है, तो उसके दस सिर हमारे सार्वजनिक जीवन में आज भी कैसे मौजूद हैं?
अब लोग इस सवाल पर विचार करना भी छोड़ते जा रहे हैं। लोकतंत्र का संस्थागत ढाँचा भले ही कायम रहे, लेकिन उसकी आत्मा तब घायल होने लगती है, जब जवाबदेही से ऊपर चुनावी जनादेश को, तर्क से ऊपर निष्ठा को और असहमति को शत्रुता के बराबर मान लिया जाता है।
रावण के दस सिर इस संकट को दर्शाने वाले दस दर्पण हैं, जिनमें विपक्ष, संस्थाएँ, समाज और सत्तारूढ़ व्यवस्था—सभी अपना-अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं। सवाल यह नहीं है कि रावण कौन है, बल्कि यह है कि उसके अनेक सिरों को पहचानने और उनका विरोध करने का साहस हममें कितना शेष है।
पहला सिर: सत्ता का अहंकार
जनता का जनादेश कोई खाली चेक नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को सौंपी गई एक जिम्मेदारी है। चुनाव में जीत शासन करने का अधिकार देती है, लेकिन आलोचना से ऊपर नहीं उठाती। असली परीक्षा यह है कि सत्ता में बैठे लोग आलोचना को अपनी प्रतिष्ठा पर हमला समझते हैं या उसमें सुधार का अवसर देखते हैं। क्या उनमें अपनी गलतियाँ स्वीकार करने का नैतिक साहस है?
लोकतंत्र में संविधान सत्ता की सीमाएँ निर्धारित करता है, जबकि राजतंत्र में राजा का निर्णय ही कानून होता है। लोकतंत्र का सिंहासन भले ही जनता द्वारा दिया गया हो, लेकिन जब शासक की इच्छा ही अंतिम सत्य बन जाए, तो उस पर बैठा अहंकार स्पष्ट रूप से राजतंत्रीय हो जाता है।
दूसरा सिर: असहमति के प्रति असहिष्णुता
लोकतंत्र की असली परीक्षा तालियों में नहीं, बल्कि असहमति में होती है। आलोचना लोकतांत्रिक चरित्र की कसौटी है, जबकि प्रशंसा सत्ता को सुकून देती है।
जब सरकार से पूछे गए सवालों को राजद्रोह, नीतियों की आलोचना को राष्ट्रविरोधी और विरोध-प्रदर्शन को शत्रुता का नाम दिया जाने लगता है, तब सत्ता में बैठे लोगों की सुविधानुसार नागरिक और दुश्मन के बीच अंतर किया जाने लगता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि आलोचना तथ्यों और प्रमाणों से मुक्त होनी चाहिए या विपक्ष की हर बात सही होती है। लोकतंत्र में न तो सरकार तर्क से ऊपर है और न ही विपक्ष। निर्णय राजनीतिक निष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यों और विवेक के आधार पर होना चाहिए।
लोकतंत्र का शरीर शायद जीवित रह जाए, लेकिन उसकी आत्मा तब मरने लगती है, जब प्रशंसा सुरक्षित और आलोचना संदेहास्पद मानी जाने लगे।
तीसरा सिर: जवाबदेही से बचना
लोकतंत्र में सत्ता निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। हर निर्णय का औचित्य स्पष्ट होना चाहिए, हर खर्च का हिसाब होना चाहिए और हर विफलता के लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
लेकिन क्या सत्ता अपनी कमियों को स्वीकार करती है, या बाहरी परिस्थितियों, सरकारी कर्मचारियों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर दोष मढ़कर जवाबदेही से बच निकलती है?
जवाबदेही का अर्थ हर निर्णय पर संदेह करना नहीं, बल्कि किसी भी निर्णय को जाँच-पड़ताल से परे न मानना है।
जब सत्ता में बैठे लोग हर उपलब्धि का श्रेय स्वयं लेते हैं, लेकिन हर विफलता का दोष दूसरों पर डाल देते हैं, तो समस्या केवल शासन तक सीमित नहीं रहती। यह सीधे लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट करती है।
चौथा सिर: संस्थाओं की स्वतंत्रता
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि अपनी संस्थाओं की स्वायत्तता बनाए रखने से भी मजबूत होता है। संसद, न्यायालय, निर्वाचन आयोग और जाँच एजेंसियाँ तभी लोकतांत्रिक मानकों की रक्षा कर सकती हैं, जब वे सत्ता में बैठे लोगों के प्रभाव से मुक्त होकर निष्पक्ष ढंग से काम करें।
लेकिन यदि इन संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं, तो क्या केवल पारदर्शिता के सहारे जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है? क्या किसी संस्था की प्रतिष्ठा उसकी जाँच-पड़ताल के रास्ते में बाधा बन जाती है? क्या उसकी आलोचना को स्वतः ही उसके प्रति शत्रुता मान लिया जाता है?
किसी संस्था को संवैधानिक दर्जा प्राप्त होना उसे जाँच-पड़ताल से मुक्त नहीं करता। लेकिन उसके विरुद्ध लगाए गए आरोप भी अपने आप अपराध सिद्ध नहीं कर देते।
संस्थाएँ अपने पद की प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि निष्पक्ष आचरण, स्वतंत्र निर्णय और जनता के विश्वास से मजबूत होती हैं।
पाँचवाँ सिर: सूचना का अँधेरा
जब लोगों को तथ्यों की जगह केवल दावों पर निर्भर रहना पड़ता है, तब जवाबदेही कमजोर होने लगती है। सूचना नागरिक का अधिकार है, सत्ता में बैठे लोगों की ओर से दी जाने वाली कोई कृपा नहीं।
जब निर्णयों, नीतियों और सार्वजनिक खर्च को गोपनीयता के पर्दे में छिपा दिया जाता है, तब पारदर्शिता केवल एक भ्रम बनकर रह जाती है।
हालाँकि, गलत सूचनाओं की अधिकता भी उतनी ही खतरनाक है, जितनी सूचनाओं की कमी। किसी सरकारी घोषणा को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता, और न ही किसी वायरल संदेश का लोकप्रिय हो जाना उसकी सत्यता का प्रमाण है।
सरकारों को जवाब देना चाहिए, नागरिकों को तथ्यों की जाँच करनी चाहिए और मीडिया को सवाल पूछने चाहिए।
जब प्रचार तथ्यों की जगह ले लेता है, तब लोकतंत्र को निगलने वाला अँधेरा केवल सूचना का अँधेरा नहीं रहता, बल्कि विवेक का अँधेरा बन जाता है।
छठा सिर: सामाजिक ध्रुवीकरण
असहमति लोकतंत्र की जीवंतता का संकेत है, उसकी कमजोरी का नहीं। संकट तब शुरू होता है, जब राजनीतिक विरोधी सामाजिक शत्रु बन जाते हैं और वैचारिक प्रतिस्पर्धा नफरत में बदल जाती है।
जब जाति, धर्म और सामुदायिक पहचान तर्क से ऊपर हो जाती हैं, तब संवाद की जगह वैमनस्य ले लेता है।
क्या हम अपने समर्थकों की तरह ही अपने विरोधियों के अधिकारों की भी उतनी ही मजबूती से रक्षा करते हैं? यही असली कसौटी है। क्या हम अपनी कमियों को स्वीकार करते हैं या दूसरों की गलतियों में अपने पक्ष की श्रेष्ठता खोजते हैं?
लोकतंत्र मतदान केंद्रों पर भले ही कायम रहे, लेकिन जब निष्ठा तर्क को निगल जाती है और नफरत संवाद को दबा देती है, तब वह समाज के भीतर धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है।
सातवाँ सिर: जनादेश का अहंकार
चुनाव लोकतंत्र की पूरी संरचना नहीं, बल्कि उसका प्रवेश-द्वार हैं। लोकतांत्रिक जनादेश सरकार बनाने का अधिकार देता है, संविधान को दरकिनार करने का नहीं।
जब बहुमत मौलिक अधिकारों, न्यायिक समीक्षा और संस्थागत जवाबदेही का विरोध करने लगे, तब लोकतंत्र का लोकप्रिय संप्रभुता से बहुसंख्यक वर्चस्व की ओर खिसकने का खतरा पैदा हो जाता है।
चुनावी जीत जनता के प्रति जवाबदेह बने रहने की नई प्रतिबद्धता है, आलोचना से छूट मिलने का प्रमाणपत्र नहीं।
अल्पसंख्यक समुदाय का कोई नागरिक अपने अधिकारों से वंचित प्रजा नहीं है और न ही चुनाव में पराजित विपक्ष लोकतंत्र का दुश्मन है।
बहुमत को शासन करने का अधिकार है, लेकिन उसे मानवीय गरिमा या संवैधानिक मर्यादा पर एकाधिकार जताने का अधिकार नहीं है।
यही बहुसंख्यक अहंकार और लोकतंत्र के बीच का मूल अंतर है।
आठवाँ सिर: सत्ता और प्रचार का गठजोड़
सरकार को अपनी उपलब्धियों को सामने रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन क्या अपनी कमियों को छिपाने का अधिकार भी इसी में शामिल किया जा सकता है?
जब जनसंपर्क प्रचार में और प्रचार छवि चमकाने के अभियान में बदल जाता है, तब सत्य सत्ता की सुविधा पर निर्भर होने लगता है।
एक और सवाल यह है कि क्या मीडिया सरकार के दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करता है और विपक्ष के आरोपों की भी उसी कसौटी पर जाँच करता है?
मीडिया न तो सरकार का भोंपू है और न ही विपक्ष का। उसका दायित्व सत्य के प्रति है।
क्योंकि जब सूचना की जगह प्रचार ले लेता है, तब लोग मतदान तो कर सकते हैं, लेकिन एक सूचित और स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए आवश्यक तथ्यात्मक आधार खोने लगते हैं।
नौवाँ सिर: नागरिक उदासीनता
लोकतंत्र में सवाल केवल सत्ता में बैठे लोगों से नहीं, बल्कि नागरिकों से भी किए जाते हैं।
क्या हम अपने राजनीतिक झुकावों के प्रति जितने सजग हैं, उतने ही अपने अधिकारों के प्रति भी हैं? क्या सामाजिक समस्याएँ तब तक हमारी नजरों से ओझल रहती हैं, जब तक उनका प्रभाव हमारे अपने दरवाजे तक नहीं पहुँच जाता? क्या हम बिना सत्यता की पुष्टि किए संदेश आगे भेजकर अनजाने में अफवाहों के प्रसार में योगदान नहीं देते?
संस्थाएँ और जनप्रतिनिधि अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते। इसी तरह, नागरिकों की उदासीनता भी सत्ता के दुरुपयोग को उचित नहीं ठहरा सकती।
लेकिन जब लोग दूसरों के अधिकारों को किसी और की लड़ाई समझने लगते हैं, तब लोकतंत्र का सबसे सजग प्रहरी भी एक मूक दर्शक बन जाता है।
दसवाँ सिर: आत्मालोचना का अभाव
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अपनी गलतियों में षड्यंत्र देखते हैं, लेकिन अपने विरोधियों की गलतियों को अपराध मानते हैं।
हम असफलताओं का दोष दूसरों पर डाल देते हैं, जबकि अपने नेता की उपलब्धियों का श्रेय पूरे राजनीतिक समूह को दे देते हैं।
क्या राजनीतिक निष्ठा दिखाने के लिए अपने विवेक से समझौता करना आवश्यक है?
किसी राजनीतिक दल का समर्थन करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन उसके हर निर्णय को बिना सवाल स्वीकार कर लेना लोकतांत्रिक चेतना का समर्पण है।
सत्ता में बैठे लोगों के समर्थन में नारे लगाना अंधनिष्ठा का सबसे खतरनाक रूप नहीं है। इसका एक और खतरनाक रूप है—अपने ही राजनीतिक खेमे में होने वाले गलत आचरण का सामना करने का साहस खो देना।
उस बिंदु पर नागरिक केवल जवाबदेही से मुँह मोड़ने वाले नहीं रह जाते, बल्कि स्वयं जवाबदेही के रास्ते में बाधा बन जाते हैं।
रावण और लोकतंत्र की अंतरात्मा
दशहरे पर हम रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाते हैं। लेकिन क्या हमने कभी उस रावण को नष्ट करने का साहस दिखाया है, जिसे हमारी निष्ठाओं, पूर्वाग्रहों और सुविधाओं ने हमारे भीतर जन्म दिया है?
वह रावण, जो अन्याय होते देखकर भी इसलिए मौन रहता है क्योंकि अन्याय करने वाला उसके अपने पक्ष का है; जो सत्ता के अहंकार में सवालों को कुचलता है और अपने ही खेमे के झूठ को सच मान लेता है।
रावणवाद केवल दूसरों को पराजित करने का नाम नहीं है। यह अपनी गलतियों का सामना करने से बचते हुए स्वयं को निर्दोष घोषित करते रहने की प्रवृत्ति भी है।
हर बार जब नागरिक की एकमात्र निर्णायक शक्ति—उसकी अंतरात्मा—झुक जाती है, तब रावण के दस सिर शासन करते रहते हैं।
जब सत्ता में बैठे लोगों के साथ-साथ नागरिक भी अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ने लगते हैं, तब लोकतंत्र का संकट केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रह जाता।
वह हमारे समाज, हमारे विचारों और हमारी सामूहिक चेतना में गहराई तक उतर जाता है।
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