रहिमन प्रीत सराहिये, मिले होत रंग दून।
ज्यो जरदी सर्दी तजै,तजै सफेदी चून।।
रहीम कहते हैं कि मिलन के गुण गाइए कि यह रंग को दुगुना कर देता है जैसे की हल्दी और चूने को आप मिलेंगे तो नया रंग बन जाता है हल्दी और चूना दोनों अलग-अलग रंग के हैं तभी वो मिल कर दुगुने हुए। अगर हल्दी ही हल्दी से मिले या चुनाव ही चुने से मिले तो रंग दुगना नहीं होता या यह कहा जाए नया रंग नहीं बनता जब हल्दी अपने पीले पन को छोड़ती है तथा जब चूना अपने सफेदी पन छोड़ता है तब जाकर लाल गहरा रंग बनता है यही बात दो संस्कृतियों के बीच में दो भाषाओं के बीच में लागू होती है जब दो संस्कृति मिलती है तो नई संस्कृति का निर्माण होता है जब दो भाषाये मिलती है तबनई भाषा का निर्माण होता है इसका सबसे अच्छा उदाहरण उर्दू भाषा है भारत के परिपेक्ष में अगर देखा जाए भारत किसी एक संस्कृति का प्रतिनिधित्व नही
बल्कि बहु संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करता है जो आपस में गुंथी हुई है। जो लोग देश के लोगों को उन्हें जाति पहचान व धार्मिक पहचान के मनोविज्ञान से मुक्त होना होगा। धार्मिक पहचान और जातीय पहचान बंधुता के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ाहै वर्तमान समय में हर राजनीतिक पार्टी या तो जाति के पहचान को बढ़ावा दे रही है या फिर धार्मिक पहचान को बढ़ावा दे रही है धार्मिक और जातीय पहचान के मजबूत होने से समाज में जातीय संघर्ष एवं सांप्रदायिक टकराव की संभावना बढ़ जाती है भारतीयता का बोध कमजोर हो जाता है डॉ अंबेडकर ने संविधान सभा ने कहा था फर्स्ट इंडियन और लास्ट इंडियन। भारतीय संत आंदोलन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जहां संतों ने जातीय और धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर भारतीय समाज को मानव आधारित मूल्यों पर मजबूत किया स्वर्ण मंदिर की नींव रखने वाले मुसलमान मियां मीर थे गुरु नानक के मुसलमान शिष्य मर्दाना थे संत दादू के शिष्य रज्जब थे जिन्हें दूल्हा संत रज्जब के नाम से भी जाना जाता है मलूक दास के प्रिय मुसलमान शिष्य माधव मीर थे गुरु ग्रंथ साहब में बाबा फरीद की वाणी है, कबीर कि हिंदू मुसलमान दोनों से संबंध है दोनों हिंदू कट्टरपंथी और मुस्लिम कट्टरपंथी को चुनौती देते हैं इसी प्रकार मीरा के गुरु रविदास है जो जाति बंधन से मुक्त होने का संदेश देते हैं। रसखान ने कृष्ण पर सैकड़ो चौपाइयां लिखकर कृष्ण भक्ति का संदेश दिया वही जायसी ने पद्मावती लिखकर एक श्रेष्ठ आत्मा परमात्मा के मिलन का संदेश दिया है इस प्रकार भारतीय संतों ने जाति की संक्रिणयता व मजहबी संकीर्णता से ऊपर उठकर भारत की सेवा की है आज भी इसी प्रकार के आंदोलन की जरूरत है ऐसा संगठन जो सब प्रकार के संकीर्ण सामाजिक बंधनों से मुक्त हो और सामाजिक मिश्रण के विचार और कर्म से लेस हो तभी देश में वर्ग विहीन व वर्ण विहीन समाज का निर्माण होगा
आदित्य कुमार

