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खराब ढंग से संचालित निजी शैक्षणिक संस्थानों का राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए

निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत जिला शिक्षा अधिकारी बिना सरकारी अनुमति के चल रहे किसी भी विद्यालय पर जुर्माना लगा सकता है। सूरजमल विश्वविद्यालय एक निजी संस्थान है, जो उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के मुख्यालय रुद्रपुर से 12 किलोमीटर दूर किच्छा में स्थापित किया गया है। अधिकांश निजी शैक्षणिक संस्थानों की तरह इसे भी धनाढ्य लोगों ने अधिक पैसा कमाने के उद्देश्य से बनाया है। अन्य पाठ्यक्रमों के अलावा यह विश्वविद्यालय बी.एससी. नर्सिंग और जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी (जी.एन.एम.) पाठ्यक्रम भी संचालित करता है, जिनकी अवधि क्रमशः 4 और 3 वर्ष है। जब जी.एन.एम. के पहले बैच के विद्यार्थी स्नातक हुए, तो उन्हें पता चला कि उनकी डिग्री इंडियन नर्सिंग काउंसिल (आई.एन.सी.) द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है, जबकि किसी भी नर्सिंग पाठ्यक्रम के लिए ऐसी मान्यता होनी चाहिए। बी.एससी. नर्सिंग के विद्यार्थियों को भी जल्द ही एहसास हुआ कि उनकी स्थिति भी वही है और उनका भविष्य अंधकारमय है। मान्यता प्राप्त डिग्री के बिना उन्हें कौन नौकरी देगा?

विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर ऊपर उल्लिखित दोनों पाठ्यक्रमों की मान्यता के सम्बंध में भ्रामक जानकारी दी हुई है। विश्वविद्यालय जाहिर तौर पर उन विद्यार्थियों और अभिभावकों को गुमराह कर रहा है, जो यहां भारी फीस चुका रहे हैं, या तो अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई से अथवा कुछ मामलों में कर्ज लेकर। बी.एससी. नर्सिंग पाठ्यक्रम की फीस प्रति वर्ष एक लाख रुपये से अधिक है। एक प्राथमिक विद्यालय भी सरकारी अनुमति के बिना नहीं चल सकता, और यहां एक विश्वविद्यालय बिना अनुमति के पाठ्यक्रम चला रहा है। विद्यार्थी करीब एक महीने से विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। शुरुआत में पुलिस द्वारा उन्हें डराने-धमकाने की कोशिश के बाद, ऊधम सिंह नगर के जिलाधिकारी ने 4 अगस्त को राज्य सरकार को एक जांच रिपोर्ट सौंपी। ऐसा लगता है कि राज्य सरकार आखिरकार उस माहौल में जागी है, जब पूरे देश में शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए एक जीवंत आंदोलन चल रहा है। उत्तराखंड सरकार के चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के उप सचिव ने 19 अगस्त को सूरजमल विश्वविद्यालय को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। विश्वविद्यालय से पूछा गया है कि आई.एन.सी. के निर्धारित मानदंडों के उल्लंघन को देखते हुए उसकी मान्यता क्यों न निरस्त कर दी जाए। विश्वविद्यालय को अगले शैक्षणिक वर्ष के लिए दाखिले रोकने को भी कहा गया है।

अब ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय के खिलाफ कुछ कार्रवाई हो सकती है, लेकिन उन विद्यार्थियों का क्या होगा जो स्नातक हो चुके हैं, स्नातक होने वाले हैं अथवा अभी भी विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हैं, यह स्पष्ट नहीं है। केवल यही उम्मीद की जा सकती है कि सरकार ऐसा समाधान निकाले जिससे विद्यार्थियों का भविष्य बचाया जा सके, या तो उन्हें किसी अन्य विश्वविद्यालय में दाखिला देकर अथवा विश्वविद्यालय को अपने अधीन लेकर और व्यवस्था को ठीक करके। यदि देश के विशिष्ट और प्रतिष्ठित संस्थानों को छोड़ दें, तो सामान्य रूप से शिक्षा के क्षेत्र की स्थिति काफी खराब है। सामान्य स्कूल, कॉलेज या यहां तक कि विश्वविद्यालय में भी शिक्षा एक तमाशा बनकर रह गई है। शिक्षक, प्रबंधन और शिक्षा विभाग के अधिकारी सामूहिक रूप से विद्यार्थियों को बुरी तरह निराश कर चुके हैं। पढ़ाई केवल नाम मात्र की होती है, यदि किसी संस्थान में सौभाग्य ये शिक्षक उपलब्ध हैं,े विद्यार्थी दिशाहीन हैं और परीक्षाओं में अनुचित साधनों का खुलेआम इस्तेमाल होता है। जब विद्यार्थी को पढ़ाया ही नहीं गया हो, तो उसके पास नकल करने के अलावा विकल्प क्या रह जाता है? बाहरी परीक्षक विद्यार्थियों को अंक देने के लिए पैसे लेते हैं। शिक्षा भ्रष्टाचार का पर्यायवाची बन गया है।

निजी विश्वविद्यालय विधानमंडल के अधिनियम द्वारा स्थापित किए जाते हैं। भाजपा-पूर्व के दौर में इस अधिनियम को पारित करवाने के लिए सरकार के पदाधिकारियों को दसियों करोड़ों रुपये दिए जाते थे। वर्तमान में यह राशि शायद सैकड़ों करोड़ रुपये हो गई होगी। राज्यपालों के बारे में कहा जाता है कि वे कुलपतियों की नियुक्ति के लिए कुछ करोड़ रुपये लेते हैं। और यह भुगतान एक बार का नहीं होता। नियुक्ति के बाद कुलपतियों से अपेक्षा की जाती है कि वे विश्वविद्यालयों से धन निकालकर राज्यपाल के खजाने में पहुंचाते रहें। सत्तारूढ़ पार्टी को चलाए रखने के लिए एक सुव्यवस्थित मशीनरी मौजूद है। भाजपा शासन में इस पूरी भ्रष्ट व्यवस्था का पैमाना कई गुना बढ़ गया है। राजस्व के हर संभव स्रोत का दोहन किया जा रहा है। यहां तक कि अयोध्या में राम मंदिर को भी नहीं बख्शा गया।

निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में यह माना गया था कि भ्रष्ट सरकारी शिक्षा व्यवस्था का समाधान निजी शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करना होगा। लेकिन निजी संस्थान उससे भी बदतर साबित हुए हैं। सरकारी व्यवस्था को कम-से-कम जवाबदेह ठहराया जा सकता है। लेकिन निजी संस्थान में यह पता ही नहीं चलता कि जवाबदेह किसे ठहराया जाए, क्योंकि मालिक कहीं दूर बैठे होते हैं और कुलपति अधिक से अधिक एक प्रतिष्ठित क्लर्क की भूमिका में होते हैं, कई बार उनकी शैक्षणिक योग्यताएं भी संदिग्ध होती हैं। ऐसी परिस्थिति में ईमानदार शिक्षण और सीखने की उम्मीद आखिर किससे की जाए? विद्यार्थी काफी हद तक अपने भरोसे हैं। यदि वे कुछ सीख पाते हैं, तो वह अपने प्रयासों के कारण ही सीखते हैं। इस देश के प्रधानमंत्री हमारी भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था से निकले व्यक्ति का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। उनकी फर्जी डिग्री और अंकपत्रों को लेकर अक्सर उनका मजाक उड़ाया जाता है। लेकिन वे कोई अपवाद नहीं हैं। वे उन अनेक लोगों में से केवल एक हैं जिन्होंने ऐसी व्यवस्था से गुजरने की औपचारिकता पूरी की है, जो बिना किसी वास्तविक शिक्षण-सीखने के केवल डिग्री सुनिश्चित करती है।

और जब ऐसे लोग सत्ता के जिम्मेदार पदों पर बैठते हैं, तो वे उसी व्यवस्था को दोहराते हैं जिससे वे स्वयं गुजरे हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वर्तमान प्रधानमंत्री के शासन में शासन-व्यवस्था एक तमाशा बन गई है, संस्थाओं का महत्व खत्म हो गया है और भ्रष्टाचार कई गुना बढ़ गया है। भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था में आप डिग्रियां और प्रमाणपत्र खरीद सकते हैं। फिर आप सीखते हैं कि पैसे से लगभग सब कुछ खरीदा जा सकता है, विधायक, सांसद, यहां तक कि सरकारें, अधिकारी, न्यायपालिका आदि भी। इस कला को चरम पर तब पहुंचाया गया जब अमेरिका में प्रधानमंत्री के सबसे करीबी कारोबारी मित्र अडानी के पक्ष में एक फैसला खरीद लिया गया। हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से वास्तव में कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि इसे इस तरह संचालित किया जा रहा है कि यह नवोन्मेषकों को पैदा न करे, बल्कि केवल औसत दर्जे के लोगों को तैयार करे। कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा नीट में पेपर लीक के मुद्दे पर शुरू किया गया आंदोलन अब व्यापक शिक्षा सुधार के मुद्दे तक फैल गया है। लेकिन अभी तक इसका ध्यान बुनियादी ढांचे पर है। इससे भी कठिन काम यह होगा कि शिक्षकों को अपना काम ईमानदारी से करने के लिए तैयार किया जाए, ताकि हमारी शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सीखने की प्रक्रिया होने पर कुछ गुणवत्ता आ सके। और सीखना कुछ मूल्यों के साथ आता है। उन मूल्यों को तभी विकसित किया जा सकता है जब शिक्षक स्वयं उनका पालन करना शुरू करें। असली चुनौती यही है। क्या भ्रष्ट व्यवस्था की उपज रहे शिक्षक तत्काल अपने मूल चरित्र को बदल पाएंगे और प्रेरणादायी, आदर्श गुरु बन सकेंगे?

संदीप पांडेय

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