नई दिल्ली/इस्लामाबाद। हेग में मौजूद ‘परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच ‘सिंधु जल संधि’ (IWT) पूरी तरह से लागू है। कोर्ट ने भारत से कहा है कि वह ‘संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन’ करना जारी रखे। इसके अलावा हेग कोर्ट ने संधि को ‘स्थगित’ (abeyance) रखने के भारत के फैसले को संधि को ‘रोकने या खत्म करने’ की कोशिश माना है। कोर्ट ने कहा कि संधि में किसी भी एक पक्ष को संधि के कामकाज को ‘रोकने या खत्म करने’ या उसे ‘स्थगित’ रखने का कोई प्रावधान नहीं है।
कोर्ट ने भारत को जम्मू-कश्मीर में रतले हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्लांट पर कुछ निर्माण कार्यों को अस्थायी रूप से रोकने का भी निर्देश दिया है। हालांकि भारत इस ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ को मान्यता नहीं देता जिसे 2023 में पाकिस्तान के अनुरोध पर औपचारिक रूप से गठित किया गया था। भारत ने कभी भी इसकी कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया है और बार-बार इसके फैसलों को अमान्य और निरर्थक बताकर खारिज किया है।
हेग कोर्ट के फैसले और भारत की तरफ से भविष्य में उठाए जाने वाले कदमों को लेकर पूर्व राजदूत बाला भास्कर, पाकिस्तान में तैनात भारत की पहली महिला डिप्लोमेट रूचि घनश्याम जो यूके और दक्षिण अफ्रीका में भारत की उच्चायुक्त भी रह चुकी हैं और विदेश मंत्रालय में सेक्रेटरी (वेस्ट) थीं उनसे बात की है। इसके अलावा नवभारत टाइम्स ने इंटरनेशनल कंजर्वेटिव पॉलिटिकल फॉरेन पॉलिसी एक्सपर्ट शुव्रोकमल दत्ता से भी जानने की कोशिश की कि भारत की आगे की योजना क्या हो सकती है।
हेग कोर्ट का फैसला और भारत का संप्रभु जवाब, क्या हैं मायने?
अदालत के क्षेत्राधिकार पर भारत की आपत्ति- एंबेसडर बाला भास्कर ने नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से कहा भारत ने शुरुआत से ही हेग स्थित इस मध्यस्थता अदालत की वैधता को मानने से इनकार किया है। भारत का तर्क है कि 1960 की संधि के तहत विवाद सुलझाने का एक त्रि-स्तरीय तंत्र मौजूद है। जब भारत ने तटस्थ विशेषज्ञ की प्रक्रिया का रुख किया था तब पाकिस्तान ने समानांतर रूप से हेग कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जो संधि के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन था।
अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता- अंतरराष्ट्रीय कानून का स्थापित सिद्धांत है कि कोई भी वैश्विक निकाय किसी संप्रभु राष्ट्र को ऐसे फैसले मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकता जिसका क्षेत्राधिकार ही विवादित हो। जब भारत ने कोर्ट की कार्यवाही का हिस्सा बनने से ही मना कर दिया था तो यह फैसला एकतरफा है।
वहीं शुव्रोकमल दत्ता ने कहा कि पाकिस्तान ने हमेशा से द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन किया है तो भारत फिर सिंधु जल संधि को लेकर उदारता क्यों दिखाए? अंतर्राष्ट्रीय कानून कहता है कि रेट्रोस्पेक्टिव असर को ध्यान में रखकर इस समझौते को खारिज कर सकती है। इसके अलावा भी भारत को सिंधु जल संधि के तहत पानी का जो हिस्सा मिला था उसका भी इस्तेमाल नहीं कर कर रहा था।’
उन्होंने कहा ‘भारत ने वेस्टर्न नदियों का सौ फीसदी पानी पाकिस्तान को दिया है। जबकि ईस्टर्न नदियों का भी ज्यादातर पानी भारत ने पाकिस्तान को दिया है। इससे भारत के अधिकारों का भी हनन होता आया है। तो अब सरकार अपने हिस्से के पानी को रोकने के लिए कदम उठा रहा है। भारत इसीलिए बांधों का निर्माण कर रहा है। भारत अभी भी अपने हिस्से में आए 20 प्रतिशत पानी को रोकने के लिए बांधों का निर्माण कर रहा है तो भारत किसी समझौते का भी उल्लंघन नहीं कर रहा है।’
भारत को अब क्या रणनीति अपनानी चाहिए?
एंबेसडर बाला भास्कर ने कहा कि भारत ने पाकिस्तान को एक स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वो ऐसे किसी कोर्ट के फैसले को स्वीकार नहीं करेगा और ‘खून और पानी साथ नहीं बह सकते।’ उन्होंने कहा कि पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ प्रायोजित आतंकवाद को अपनी राज्य-नीति की तरह इस्तेमाल कर रहा है और दूसरी ओर भारत से 1960 की संधि के तहत ‘सद्भावना और निर्बाध जल प्रवाह’ की उम्मीद करता है। यह दोहरा मापदंड अब बर्दाश्त से बाहर है। उन्होंने कहा कि इस संधि का आधार ही ‘दोस्ती और विश्वास आधारित रिश्ते था’ जिसे पाकिस्तान ने लगातार तोड़ा है तो इस संधि को रोकने का फैसला बिल्कुल सही है।
उनका मानना है कि भारत अब जब भी भविष्य में सिंधु जल संधि को लेकर बात करेगा तो उसमें आतंकवाद विरोधी शर्त जोड़ेगा। हालांकि पाकिस्तान इस शर्त के साथ बातचीत की मेज पर आने में आनाकानी करेगा। लेकिन बात सिर्फ आतंकवाद तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन ने सिंधु जल संधि को काफी पुराना कर दिया है। अब इसको लेकर नये सिरे से बातचीत करने और नई शर्तों को जोड़ने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि के हिसाब से कोटा बदला जा सकता है।
भारत के एक रुख से पाकिस्तान का कानूनी दांव-पेंच पड़ा उलटा!
दूसरी तरफ शुव्रोकमल दत्ता ने कहा कि शिमला समझौते में साफ कहा गया है कि दोनों देश आपसी बातचीत के जरिए द्विपक्षीय बैठकों के जरिए विवादों का समाधान करेंगे। दोनों देश इसके लिए तैयार हुए थे और जब अटल बिहारी बाजपेयी जब लाहौर गये थे उस वक्त भी दोनों देश इसके लिए तैयार हुए थे तो फिर सिंधु जल संधि का समाधान तीसरे पक्ष के जरिए कैसे हो सकता है? इसके अलावा एक और है कि मुद्दों के समाधान के लिए शांति पूर्ण माहौल होना जरूरी है और लाहौर समझौता भी यही कहता है लेकिन पाकिस्तान ने लाहौर समझौता और शिमला समझौता दोनों का उल्लंघन किया है। तो फिर पाकिस्तान किस आधार पर सिंधु जल संधि को लेकर गुहार लगा रहा है?
एंबेसडर बाला भास्कर ने कहा नई शर्तों के साथ जो संधि होगी उसमें भारत को अपने हिस्से का पूरा पानी इस्तेमाल करने की आजादी मिलेगी। पाकिस्तान निश्चित तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की ‘उत्तरदायी अपर-राइपेरियन’ की छवि पर सवाल उठाने की कोशिश करेगा लेकिन भारत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
क्या भारत को रद्द करना चाहिए सिंधु जल संधि?
बाला भास्कर से जब पूछा गया कि क्या हेग कोर्ट के फैसले के बाद भारत को सिंधु जल संधि को पूरी तरह से खत्म कर देना चाहिए तो उन्होंने कहा कि नहीं ऐसा नहीं करना चाहिए। भारत एक जिम्मेदार देश है। उन्होंने कहा कि भारत को संधि को पूरी तरह त्यागने के बजाय ‘कंडीशनल सस्पेंशन’ और ‘अनिवार्य पुनर्जांच’ का दबाव बनाना चाहिए और भविष्य में जब भी बातचीत होगी तो भारत यही करेगा।’
उन्होंने कहा ‘भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह समझा सकता है कि ‘Rebus sic stantibus’ यानि परिस्थितियों में मूलभूत बदलाव के कानूनी सिद्धांत के तहत 1960 की स्थितियां अब बदल चुकी हैं। जब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर लगाम नहीं लगाता तब तक संधि की समीक्षा टेबल पर ही रहेगी।’
जल विवाद से पाकिस्तान और बांग्लादेश आएंगे एक साथ?
भारत का सिर्फ पाकिस्तान से ही नहीं बल्कि बांग्लादेश से भी जल विवाद रहा है। जहां पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि विवादों में है वहीं बांग्लादेश के साथ 1996 की गंगा जल संधि इस साल यानि 2026 में अपने 30 साल पूरे कर रही है और इसके नवीनीकरण की प्रक्रिया शुरू होनी है। इसके अलावा तिस्ता नदी के जल-बंटवारे पर भी गतिरोध बना हुआ है। हाल ही में बांग्लादेश में हुए राजनीतिक बदलावों के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि क्या ढाका और इस्लामाबाद भारत के खिलाफ एक ‘एंटी-इंडिया वाटर फ्रंट’ बना सकते हैं?

