सरकार का कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30% तक सीमित करने का फैसला सही है। कई बार कैंसर का इलाज कराने में लोगों की पूरी जमा-पूंजी खत्म हो जाती है और कर्ज चढ़ जाता है। लेकिन, भारत में सिर्फ दवाएं सस्ती करने से कुछ नहीं होगा। क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही शहर के अलग-अलग अस्पतालों में इलाज का खर्च अलग क्यों है? जिस इलाज के लिए एक अस्पताल एक लाख रुपये लेता है, दूसरे अस्पताल में उसी इलाज का खर्च तीन लाख रुपये कैसे हो जाता है, जबकि इलाज का तरीका और दवाएं एक जैसी है?
मर्ज का खर्च
आज की स्वास्थ्य सेवाओं में कई बार इलाज मरीज की जरूरत के बजाय अन्य कारणों से तय होता है। मान लीजिए, सीने में दर्द होने पर कोई मरीज अस्पताल जाता है और उसके हृदय में चार स्टेंट लगा दिए जाते है घर लौटने पर वह अपने फैमिली डॉक्टर से पूछता है कि क्या चारों स्टेंट जरूरी थे, तो ऐसी स्थिति में इसका जवाब इलाज की जरूरत के आधार पर मिलना चाहिए न कि अस्पताल के कारोबारी हितों को ध्यान में रखकर।
अभी उपाय अधूरे
सरकार का कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30% तक सीमित करने का फैसला सही है। कई बार कैंसर का इलाज कराने में लोगों की पूरी जमा-पूंजी खत्म हो जाती है और कर्ज चढ़ जाता है। लेकिन, भारत में सिर्फ दवाएं सस्ती करने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि हमारे यहां गैर जरूरी दवाएं लिखने, बेवजह सप्लीमेंट देने, ज्यादा जांच कराने का भी चलन है। ऐसे में सवाल है कि कीमतों पर नियंत्रण का मरीजों को कितना फायदा मिलेगा?
निगरानी जरूरी
पहले भी कीमतें घटाने की कवायद हुई है। 2017 में स्टेंट की कीमत 85% और घुटने के प्रत्यारोपण की कीमतें 69% तक कम की गई थीं। राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) ने बताया कि 2019 में कैंसर की 42 दवाओं के 526 ब्रेड की कीमतें घटने से सालाना करीब 984 करोड़ रुपये की बचत हुई। लेकिन, ऐसा नहीं है कि इनसे इलाज भी सस्ता हो गया। अस्पताल कहीं और से इसकी भरपाई करने लगे। इसलिए कीमतों पर नियंत्रण संग पूरे इलाज के खर्च पर भी निगरानी होनी चाहिए।
पूरी जानकारी दें
बहस इस पर भी हो कि क्या दवा देना वाकई जरूरी है। आधुनिक चिकित्सा से कैंसर के इलाज में काफी सुधार हुआ है। सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, टार्गेटेड ट्रीटमेंट और इम्यूनोथेरेपी से मरीजों की जान बच रही है। लेकिन, हर नई दवा का फायदा हर मरीज को हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए इलाज से पहले मरीज को उसके फायदे, जोखिम, दूसरे विकल्प और खर्च की मुकम्मल जानकारी देनी चाहिए।
गलत इलाज
यह समस्या कैंसर के इलाज तक ही नहीं है। कई बार वायरल होने पर एंटीबायोटिक, बिना जरूरत विटामिन और छोटी-मोटी गड़बड़ियों पर डॉक्टर द्वारा कई दवाएं लिखना भी आम है। दवाओं की कीमतें घटाने से गलत इलाज की समस्या दूर नहीं होगी।
गुणवत्ता का ख्याल
दवाएं सस्ती होने के साथ गुणवत्ता भी अच्छी होनी चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, कम और मध्यम आय वाले देशों में हर 10 में से कम से कम एक दवा घटिया या नकली होती है। दवाओं की जांच, निर्माण की निगरानी और आपूर्ति पर नजर रखना जरूरी है। पर, दवाओं की कमी नहीं होनी चाहिए।
जवाबदेही जरूरी
अब जरूरत पूरी प्रक्रिया को जवाबदेह बनाने की है। अस्पताल में मरीजों को यह भी जानकारी मिलनी चाहिए कि किस अस्पताल में कितने में इलाज हो सकता है। इलाज के बाद बिल में पूरी जानकारी रहे । अस्पताल भी सिर्फ इलाज के आधार पर शुल्क लें। लेकिन, जो इलाज वास्तव में जटिल हो उसका पूरा भुगतान उन्हें मिलना चाहिए।
असरदार इलाज
नियामकों, डॉक्टर के संगठनों, बीमाकर्ताओं और अस्पतालों को दवाओं की कीमत के साथ उनकी जरूरत, गुणवत्ता और असर पर भी ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं का आकलन मरीज के ठीक होने के आधार पर होना चाहिए, न कि दवाओं की बिक्री पर मरीज खरीदारी करने नहीं इलाज कराने आता है। इसलिए दवाएं सस्ती होने के साथ सुरक्षित और असरदार इलाज भी बड़ी जिम्मेदारी है। ऐसा नहीं हुआ तो भारत में लोगों को गैर जरूरी इलाज पर भी भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ सकती है।

