आज से करीब ढाई हजार साल पहले गौतम बुद्ध ने तर्क-वितर्क के संबंध में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था कि तुम किसी बात को इसलिए मत मानो कि उसे किसी बड़े व्यक्ति ने कहा है। उसे इसलिए भी मत मानो कि वह परंपरा में चली आ रही है या धार्मिक मत का हिस्सा है। उसे इसलिए भी मत मानो कि मैं कह रहा हूं। इसके बदले किसी बात को स्वयं जांचो-परखो, तर्क-वितर्क की कसौटी पर कसो और फिर मानो।
डा.भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवनकाल के अंत में हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अपनाया। तब उन्होंने बौद्ध धर्म के पक्ष में बहुत कुछ लिखा। बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म से बेहतर बताने के लिए उन्होंने जो तर्क प्रस्तुत किये उनमें गौतम बुद्ध का उपरोक्त प्रसिद्ध कथन भी था।
आज अंबेडकर की मृत्यु के करीब छः दशक बाद स्वयं अंबेडकर के संबंध में क्या स्थिति है? आज अंबेडकर के भांति-भांति के स्वनामधन्य अनुयाई किस तरह का आचरण कर रहे हैं?
आज भारतीय समाज में अंबेडकर के भांति-भांति के बुतफरोशों (मूर्तियां बेचने वाले या मूर्तियों की फेरी लगाने वालों) की भरमार है। आज यदि जमीन पर अंबेडकर की मूर्तियां चारों ओर नजर आती हैं तो दिमागी स्तर पर इनकी मूर्तियां कम नहीं हैं। इन मूर्तियों को गढ़ने या स्थापित करने का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है। इन बुतफरोशों में मूलतः चार तरह के लोग हैं।
अंबेडकर के बुतफरोशों में सबसे ऊपर भारत का पूंजीपति वर्ग और उनकी पूंजीवादी पार्टियां हैं। यहां इनमें से केवल तीन की चर्चा की जायेगी।
पर ज्यादातर ‘सेल्फमेड’ लोगों की तरह अंबेडकर समाहित हो जाने वाले व्यक्ति नहीं थे और 1951 में अंबेडकर और कांग्रेस पार्टी जुदा-जुदा हो गये। उसके बाद लगभग चार दशकों तक कांग्रेस पार्टी अंबेडकर को औपचारिक तौर पर ही याद करती रही। वह दलितों के कांग्रेस पार्टी के समर्थक होने के प्रति आश्वस्त थी। अंबेडकर द्वारा गठित रिपब्लिकन पार्टी की असफलता उसे और ज्यादा आश्वस्त करती थी पर जब 1980 के दशक से दलितों ने कांग्रेस पार्टी का साथ छोड़ना शुरू किया तो स्थितियां बदलने लगीं। पहले तो कांग्रेस पार्टी इसे हजम नहीं कर पायी। पर एक बार यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस पार्टी का परम्परागत दलित आधार खिसक गया है तो फिर उसे हासिल करने के लिए देर से सही, कांग्रेस पार्टी ने अंबेडकर की गुहार लगानी शुरू की। यह इसलिए भी हुआ कि कांग्रेस से छिटका दलित आधार अंबेडकर के नाम पर ही कहीं और गोलबंद हो रहा था। कांग्रेस पार्टी अंबेडकर के बुतफरोशों के बाजार में अपना ब्रांड लेकर उतर पड़ी।
कांग्रेस पार्टी के मुकाबले हिन्दू सांप्रदायिक भाजपा का अंबेडकर पर दावा और भी कमजोर रहा। यदि कांग्रेस पार्टी में सवर्ण हिन्दुओं की भरमार थी तो भारतीय जनसंघ तो सांप्रदायिक सवर्ण हिन्दुओं की ही पार्टी थी। इसकी मूल्य-मान्यताएं ठीक वहीं थीं जिसका दलितों के दृष्टिकोण से अंबेडकर सबसे ज्यादा विरोध कर रहे थे। यदि अंबेडकर मनुस्मृति जला रहे थे तो जनसंघ के सवर्ण हिन्दू सांप्रदायिक मनुस्मृति का शासन कायम करना चाह रहे थे। ऐसे में दोनों का टकराव लाजिमी था और यह टकराव सघन रूप में 1951 में हिन्दू कोड बिल के मुद्दे पर फूट पड़ा। जनसंघ के सवर्ण हिन्दू सांप्रदायिकों को हिन्दू धर्म में धर्मनिरपेक्षवादी दिशा में कोई भी सुधार स्वीकार नहीं था और न ही उन्हें हिन्दू स्त्रियों की आजादी स्वीकार थी। उन्होंने नेहरू और अंबेडकर के प्रति अभियान छेड़ दिया। जब नेहरू ने स्वयं कांग्रेस के भीतर के सवर्ण हिन्दू पोंगापंथियों के दबाव में इस मुद्दे पर आत्मसमर्पण कर दिया तो अंबेडकर ने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद दो-तीन दशकों तक संघियों का अंबेडकर के प्रति रुख दुश्मनी भरा रहा। जमीनी स्तर पर सवर्ण हिन्दू दलितों के प्रति घोर घृणा का रुख अपनाए रहे और उन्हें तिरस्कारपूर्वक (कांग्रेसी) सरकारी दामाद कहते रहे।
पर 1970-80 के दशक से संघियों का दलितों के प्रति रुख बदलने लगा। उन्हें यह समझ में आने लगा कि हिन्दुओं की सांप्रदायिक एकता दलितों के प्रति घृणा के रहते संभव नहीं हो सकती। अब उन्होंने सामाजिक समरसता की बात करनी शुरू कर दी। इसका मतलब था बिना जाति व्यवस्था को समाप्त किये हुआ छुआ-छूत इत्यादि को समाप्त करना। जब वाजपेयी सरकार की चुनावी सीमाएं स्पष्ट हो गयीं तो संघ के लिए यह भी स्पष्ट हो गया कि बिना दलितों और पिछड़ों को साथ लिए चुनावी वैतरणी नहीं पार की जा सकती। तब इन्होंने अपनी सोशल इंजीनियरिंग शुरू की जो मोदी-शाह की रंगा-बिल्ला की जोड़ी के नेतृत्व में परवान चढ़ी। ऐसी स्थिति में संघियों द्वारा अतीत को भुलाकर अंबेडकर की जय-जयकार करना स्वाभाविक था। अपने स्वभाव के मुताबिक वे सबसे जोर-शोर से अंबेडकर की जय बोलने लगे और उन्हें अपनी ही तरह का मुसलमान विरोधी हिन्दू सांप्रदायिक बताने लगे। उनका बस चलता तो वे अंबेडकर को संघ का प्रचारक घोषित कर देते।
इन दोनों पार्टियों से अलग बसपा शुरू से ही अंबेडकर की हामी रही है। कांशीराम ने समय रहते भांपा कि रिपब्लिकन पार्टी की असफलता और बिखराव व कांग्रेस पार्टी की दलितों के समाहन की नीति की सीमा उजागर होने के बाद एक जगह बनी है जिसमें दलितों की एक आक्रामक गोलबंदी की जा सकती है। इसके लिए अंबेडकर के नाम व विचारों का इस्तेमाल किया जा सकता है। बसपा के रूप में उत्तर प्रदेश में यह प्रयास सफल भी रहा। कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बसपा ने एकदम शाब्दिक अर्थों में अंबेडकर की बुतफरोशी की। लगे हाथों मायावती ने अपनी मूर्तियां भी स्थापित करा लीं। उत्तर प्रदेश में बसपा का शासन दलितों के उत्थान की किसी परियाजना के लिए नहीं बल्कि मूर्तियों का जंगल खड़ा करने के लिए जाना जाता है। बसपा की सफलता और उसकी अंबेडकर की बुतफरोशी ने कांग्रेस और भाजपा को प्रेरित किया कि वे भी बुतफरोशी के इस बाजार में जोर-शोर से उतरें।
इन तीनों पूंजीवादी पार्टियों की अंबेडकर की बुतफरोशी साथ ही देश के शासक पूंजीपति वर्ग द्वारा बुंतफरोशी भी थी। इसके द्वारा दलित मजदूर-मेहनतकश जनता को समूची पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ गोलबंद होने से रोका जाता है। दलितों के भीतर पैदा हुए पूंजीपति वर्ग और मध्यम वर्ग को पूंजीवादी व्यवस्था में समाहित करने के जरिये बाकी मजदूर-मेहनतकश दलित जनता को (जो विशाल बहुमत होता है) उनका पिछलग्गू बनाने की कोशिश की जाती है। इस परियोजना की शुरूआत स्वयं अंबेडकर ने की थी जब उन्होंने भारतीय संविधान के दायरे में दलित समस्या का समाधान बताया था और इस बात पर आशंका जाहिर की थी कि इसकी असफलता के बाद दलित कहीं किसी विध्वंसकारी रास्ते पर न चल पड़ें।
अंबेडकर के इन सारे बुतफरोशों की बुतफरोशी का परिणाम यह है कि अंबेडकर देश में इस समय सबसे ज्यादा श्रद्धेय देवता हो गये हैं। उनकी सैद्धांतिक-वैचारिक या अन्य किसी तरह की आलोचना नहीं की जा सकती। ऐसा करने वाले को काफिर या पापी घोषित कर दिया जायेगा।
ऐसा इसलिए हुआ है कि देश की चुनावी राजनीति में दलित और अति पिछड़ों के वोट अति महत्वपूर्ण हो गये हैं। थोड़े से भी मतों से तय हो रही हार-जीत के समय कोई दलित मतों के छिटक जाने का खतरा मोल नहीं ले सकता। और इन मतों को हासिल करने का एक तरीका है दलितों व अति पिछड़ों में अंबेडकर की बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) को बढ़ावा देना और इसके लिए जमकर बुतफरोशी करना। भारत हजारों सालों से बुतफरोशों या मूर्तिपूजकों का देश रहा हे। दक्षिण भारत में सिनेमाई कलाकारों की मूर्तियां स्थापित हो जा रही हैं। ऐसे में दलितों, अति पिछड़ों को इस नये किस्म की मूर्ति पूजा की ओर ढकेलना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह उन्हें पूंजीवादी दायरे में बांधे रहने का भी एक अच्छा तरीका है। इसकी सफलता इतनी ज्यादा है कि क्रांतिकारी भी अपनी सारी क्रांतिकारी चेतना भूल कर बुतपरस्ती और बुतफरोशी के इस जुलूस में शामिल हो जा रहे हैं।
मजे की बात है कि अंबेडकर स्वयं बुतपरस्त नहीं थे बल्कि बुतशिकन (मूर्तिभंजक या मूर्ति तोड़ने वाले) थे। उन्होंने थोड़ी बहुत बुतपरस्ती और बुतफरोशी केवल गौतम बुद्ध के प्रति दिखाई। जहां तक हिन्दू धर्म का सवाल था उन्होंने भयंकर बुतशिकन होने का परिचय दिया था। कम्युनिस्टों के प्रति भी उनका यही रुख था। जब कांग्रेस पार्टी महात्मा गांधी का बुत खड़ा कर रही थी तब उन्होंने इसके प्रति तीखी आलोचना का रुख अपनाया।
कोई सहज ही सवाल कर सकता है कि ऐसे बुतशिकन की बुतपरस्ती क्यों होनी चाहिए? उसका बुत क्यों खड़ा किया जाना चाहिए। उसे सारे सवालों से ऊपर उठाकर प्रश्नातीत श्रद्धेय क्यों बनाना चाहिए? ऐसा करने वाले क्यों ऐसा कर रहे हैं? उनके कौन से हित उन्हें ऐसा करने की ओर ले जा रहे हैं?
लेकिन ठीक इसी कारण वे मजदूर वर्ग के नेता नहीं हो सकते थे। दलित मजदूर वर्ग के भी नहीं। बल्कि वे उसके दुश्मनों के कतार मेें खड़े थे -नेहरू वगैरह के साथ। समाज में वर्गीय नजरिये से देखने वाले किसी भी व्यक्ति को देखने में जरा भी कठिनाई नहीं होगी कि भारत का पूंजीपति वर्ग का संविधान बनाने में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले व्यक्ति का वर्गीय चरित्र क्या होगा।
आज जरूरत इस बात की है कि अंबेडकर के बुतफरोशों की सारी सेल्समेनशिप को बेनकाब किया जाये और दलित मजदूर-मेहनतकश आबादी को अंबेडकर की बुतपरस्ती से बाहर निकाला जाये। मजदूर वर्ग की मुक्ति की लड़ाई के लिए ये बेहद जरूरी है।
– नागरिक अखबार

