नई दिल्ली। कर्नाटक हाई कोर्ट ने हाल ही में एक व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। उस व्यक्ति पर अथाणी पुलिस ने आरोप लगाया था कि उसने अपनी दुकान के सामने बैरिकेड लगाए थे और जब एक सोशल वर्कर ने उससे पूछताछ की, तो उसने प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक बातें कही थीं। ये फैसला आने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) सह संयोजक सौरभ दास ने इसे सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट करते हुए ‘खुशी’ जताई है।
जज बोले-शिकायत में ऐसा कुछ नहीं था
कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस वेंकटेश नाइक टी की सिंगल जज बेंच ने कहा कि शिकायत में ऐसा कुछ नहीं था। जज ने कहा-‘शिकायत से यह पता नहीं चलता कि शिकायतकर्ता का जानबूझकर अपमान किया गया था और सिर्फ गाली-गलौज या बदतमीजी करना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता पर मुख्य आरोप यह है कि जब शिकायतकर्ता ने उससे बैरिकेड के बारे में सवाल किया, तो उसने भारत के माननीय प्रधानमंत्री के खिलाफ कुछ बातें कहीं। ऐसा कोई खास आरोप नहीं है कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को गाली दी या जानबूझकर उसका अपमान किया, जिससे शांति भंग होने की स्थिति पैदा हो…।’
CJP के सौरभ दास बोले-‘जंतर-मंतर के बाद का भारत’
CJP के सह संयोजक सौरभ दास ने कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले की लाइव लॉ की एक रिपोर्ट सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट की। इस रिपोर्ट की हेडिंग है-कर्नाटक हाई कोर्ट का कहना है कि शांति भंग करने के इरादे के बिना प्रधानमंत्री का अपमान करने पर BNS की धारा 352 लागू नहीं होती है।
सौरभ दास ने इस पोस्ट को टैग करते हुए लिखा-‘जंतर-मंतर के बाद का भारत’। नीट पेपर लीक मामले में जंतर-मंतर पर जून-जुलाई में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए थे। करीब 36 दिनों के प्रदर्शन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
CJP के सह संयोजक सौरभ दास ने कर्नाटक हाईकोर्ट के इस फैसले की लाइव लॉ की एक रिपोर्ट सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट की। इस रिपोर्ट की हेडिंग है-कर्नाटक हाई कोर्ट का कहना है कि शांति भंग करने के इरादे के बिना प्रधानमंत्री का अपमान करने पर BNS की धारा 352 लागू नहीं होती है। उन्होंने लिखा-‘जंतर-मंतर के बाद का भारत’।
चार दिन की देरी का नहीं बताया कारण
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि घटना 7 जनवरी, 2026 को हुई थी, लेकिन शिकायत 11 जनवरी, 2026 को दर्ज कराई गई थी और चार दिन की इस देरी का कोई सही कारण नहीं बताया गया था।
शिकायत के अनुसार, जनवरी 2026 में जब शिकायतकर्ता सोशल वर्कर और अन्य लोग BJP ऑफिस के पास थे, तो उन्हें एक WhatsApp ग्रुप पर चल रहे वीडियो के बारे में पता चला। वीडियो में कथित तौर पर याचिकाकर्ता की दुकान के पास की एक घटना दिखाई गई थी, जहां उसने सड़क पर बैरिकेड्स लगाए थे, जिससे कथित तौर पर लोगों को परेशानी हो रही थी।
जब शिकायतकर्ता ने उससे ट्रैफिक रोकने के बारे में सवाल किया, तो याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर प्रधानमंत्री के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। यह सुनकर नाराज होकर तुरंत शिकायत दर्ज कराई गई कि याचिकाकर्ता ने प्रधानमंत्री को अपशब्द कहे थे, साथ ही BNS की धारा 285 (ट्रैफिक में बाधा डालना) के तहत अपराध भी किया था।
कोर्ट ने मोहम्मद वाजिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023) के फैसले का हवाला देते हुए BNS की धारा 285 और 352 की व्याख्या की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अपशब्द कहना, असभ्यता, रूखापन या बदतमीज़ी जानबूझकर अपमान नहीं माना जा सकता, जब तक कि अपमानित व्यक्ति को शांति भंग करने या कोई अन्य अपराध करने के लिए उकसाने का जरूरी इरादा या जानकारी साबित न हो जाए।
क्या है BNS की धारा 352
हाई कोर्ट के सामने, याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि उसने शिकायतकर्ता को अपशब्द कहे या उसका अपमान किया। एकमात्र आरोप यह था कि उसने प्रधानमंत्री के खिलाफ बयान दिया था।
आगे यह भी तर्क दिया गया कि किसी कथित राजनीतिक बयान को व्यक्तिगत आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता, जब अपराध के जरूरी तत्व मौजूद न हों। इसके अलावा, BNS की धारा 352 लागू नहीं होती थी क्योंकि शिकायत में शिकायतकर्ता के खिलाफ किसी जानबूझकर किए गए अपमान का ज़िक्र नहीं था। BNS की धारा 352 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का जानबूझकर इस इरादे से अपमान करता है कि वह गुस्सा

