भेड़ चाल……यानी बिना सोचे समझे चलते जाना…….। भेड़ों में एक विशेषता होती है। सबसे आगे चलने वाली भेड़ जिधर चलती हैं, भेड़ों का सारा झुंड बिना अपना आगा-पीछा देखे उधर ही चल देता हैं। इसे इस तरह समझिये कि एक बार एक भेड़ रेलवे लाइन पार कर रहीं थीं उसी समय एक रेलगाड़ी आगई। जो भेड़ें रेलवे लाइन पार कर गईं थीं, वे तो बच गईं, लेकिन पीछे चलने वाली ढेरों भेड़ें रेलगाडी के नीचे आ गईंऔर कटकर मर गई। रेलगाडी इतनी जल्दी रुक भी नहीं सकती थी। भेड़ों के चलने की यह प्रवृत्ति भेडचाल कहलाती हैं।यह शब्द मुहावरे के रूप में उन लोगों के लिये भी उपयोग किया जाता है जो झुंड के रूप में बिना अपना आगा-पीछा सोचे किसी नेता के पीछे चलते रहते हैं और उनके आदेशों का पालन करते रहते हैं। यह उनके अपने नेता के प्रति आसक्ति के कारण होता है।आज का मनुष्य भी भेड़ चाल चलने लगा है ,सब क्या कर रहे हैं वह मुझे भी करना है । इसकी के रहने का क्या स्टाइल है वह मुझे भी अपनाना है । आज कल बहुत तेज़ी से रियल बनाने का फ़ैशन स्टार्ट हुआ है और मैं देख रही हूँ हर कोई हर समय रील ही बनाता रहता है ।
हमारे पूर्वज प्रकृति से जुड़े हुए और बहुत ओब्सर्वेन्ट थे। आश्चर्य शर्म की यह बात है कि पूजा कर रहे हैं और रील बन रही है प्रार्थना कर रहे हैं और रील कर रही है , क्या है ये। पूजा और प्रार्थना का मतलब होता है कि एकांत में ध्यान देकर भगवान की पूजा करना पर आज कल तो पूजा भी रील में शामिल हो गई है। शादियों में तरह तरह के बदलाव आ गए हैं आज कल शादी होते ही हनीमून जाने का फ़ैशन आ गया है फिर चाहे लड़के के पास पैसे हों या न हों , लड़का किसी तंगी में भले ही हो , वह अपना समय कष्ट में व्यतीत कर रहा हो पर लड़की को तो हनीमून पर जाना है यह उसका अधिकार है हक़ है ,ये कहाँ लिखा है । जबकि हमारे पूर्वज हर गतिविधि को बहुत ध्यान से देखते थे। उनहोंने भेड़ों को देखा तो पाया की सारी भेड़ें सबसे आगे वाली भेड़ के पीछे पीछे चलती हैं। अगर आगे वाली भेड़ गड्ढे में कूद जाये तो पीछे पीछे साड़ी भेड़ें गड्ढे में कूद पड़ेंगी। चरवाहे जब इनको चराने निकलते थे तो ये इधर उधर बहुत भागती थीं। इतनी सारी भेड़ों को एक साथ ना तो बाँध कर चल सकते थे ना ही उनको एक साथ हाँक सकते थे। तो उन्होंने केवल सबसे आगे वाली भेड़ को बांधना और साथ लेकर चलना शुरू किया। इससे बाकी की भेड़ें बिना मेहनत के पीछे पीछे चलने लगी। ये तरीका आज भी भेड़ बकरियों को चराने में उपयोग किया जाता है। यहीं से शुरुआत हुई कहावत ” भेड़चाल ” की। इसका मतलब होता है बिना सोचे समझे किसी को फॉलो करना ना जानते हुए की वो सही भी है की नहीं। मतलब जो सब कर रहे हैं वही आप भी करने लगे तो आप भी भेड़चाल में शामिल हो गए। ठीक वैसे ही जैसे भेड़ों का झ़ुंड गर्दन झुकाए बिना सामने देखे सिर्फ अपने से आगे चल रहे ।भेड़ का अनुसरण करते हुए चलते जाते हैं……….भेंड़ों की त़ो गर्दन झुकाए चलने की आदत बन जाती है क्योंकि बचपन से ही वे घास चरने के लिए नीचे देख कर ही चलते रहती हैं. मनुष्य हमेशा तो नहीं पर कभी कभी इस स्टाइल को अपना लेता है। कभी किसी बाबा से चमत्कार की आशा में या फिर किसी ठग या नेता की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर भेड़चाल चल देते हैं । होता कुछ ऐसा है कि सामने दिख रहे रंगीन सपने देखने के बाद जो दो चार लोगों ने किया सभी उनकी नकल करने लगते हैं, अपने दिमाग का उपयोग न कर सिर्फ नकल करने लगते हैं ।
पिछले कुछ वर्षों में कम्प्यूटर इंजीनियरिंग के कोर्स की भेड़ चाल चली गई और अधिकांश इंजिनियर अब या तो कालसेंटर्स में या फिर अपने पापा की किराने की दुकान में बैठे हैं।अपने देश में चुनावों में वोटिंग के समय भी अक्सर भेड़ चाल चलकर निर्णय लिया जाता है और फिर बाद में पछतावा होता है।अपने दिल दिमाग से सोच समझ कर निर्णय लेने से बाद में पछतावा नहीं होता है इसलिए भेड़चाल न चल कर सामने देख कर सोच समझकर ही कदम उठाने में समझदारी है।भारत देश में ही नहीं हर जगह लोग एक-दूसरे को कॉपी करते हैं। पर अर्थहीन या नुकसानदायक नकल ठीक नहीं है।भेड़चाल यह होती है कि किसी ने आपको कह दिया कि फलां घर में भूत है और आप आगे से आगे दोड़ दोड़कर यह लोगों को बताएंगे और वे इसी प्रकार औरों को बताएंगे और उस घर में भूत की स्थापना कर देंगे।
बिना सोचे समझे किसी का पिछा करना। ऐसा ही भेड़ें करती हैं। वे रेवड़ में एक के पिछे एक चलती रहती हैं। अगर एक भेड़ गहरे पानी में चली गयी तो सभी डूबकर मर जाती हैं क्योंकि उनको तो पिछे लगे रहना है। मनोविज्ञान कुछ भी नहीं है। मुर्ख लोग चापलूसों को बहुत समझदार समझते हैं और उनका पीछा करते रहते हैं।इस संसार में खाली आया है खाली जाएगा क्योंकि खाली हाथ ही आया है तो जैसा आओगे वैसा जाओगे लेकिन फिर भी यहां माया से कोई नहीं बचा है फिर मानव कैसे बचें जैसे ही धरती पर मनुष्य जन्म लेता है वह दस इंद्रियों से लिपटा हुआ एक बदन होता है और वह माया से ग्रसित तब तक रहता है जब तक कि यह शरीर आत्मा से लिपटा हो।भारत मैं लोग शायद रिस्क नहीं लेना चाहते. औ बस दूसरे को देखते हैं इसने ये काम किया और उसमे सफल हो गए. तो अब हम भी यही काम करेगे. कुछ नया काम या कुछ अलग काम करने मैं शायद डरते है. इसलिए भारत के लोग शायद भेड़ चाल चलना पसंद करते हैं।
ऊषा शुक्ला

