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अथ् श्री झ़ुकरासन कथा…

अरुण श्रीवास्तव 

… कथा है झ़ुकराव की, झ़ुकराव से लगाव की…। पर याद रहे जब ये झुकाव और लगाव किसी झुंड विशेष के प्रति ही उछाल मारे और वो भी मर्यादा ख़ासकर पद की तो यह भी बात की तरह ही निकल कर दूर तलक जाएगी।
चर्चा है कि लोग सूर्य नमस्कार को लाकर में रख झ़ुकरासन सीखने के लिए सुयोग्य गुरु की तलाश में एड़ी-चोटी का पसीना एक किए हुए हैं और करें भी क्यों न जब फ़ायदा ही फ़ायदा हो। आखिर में लोग देख रहे हैं कि, देसी कसरत को धकेल कर किस तरह से अंग्रेजी कसरत किस तरह सेहत के बाज़ार में अपनी पैठ बना ली। योगासन प्राणायाम से किनारा कर पिज़्ज़ा बर्गर वाली पीढ़ी ‘ज़ुंबा’ से नैन मटक्के करने लगी। आज़ किसी आश्रम में जाकर कड़ी मेहनत कर पसीना बहाने के बजाए बहुमंजिली इमारतों के ऊपरी हिस्से में कान फोड़ू धुन पर लोगों को मटकते हुए महानगरों ही नहीं छोटे शहरों में भी देखा जा सकता है। गर यही हाल रहा तो रीयल एस्टेट वाले बाकी माले को बाद में बनाएंगे ऊपरी माले को सबसे पहले। होने को तो यह भी हो सकता है कि लोग बाकी माले बनवाए ही न!
बहरहाल… सोशल मीडिया के दौर में तरह तरह हंसी मज़ाक़ के चुटकुले, कहावतें-मुहावरे हिलोरे मारते मारते हिचकोले मारने लगे हैं। सत्ता के गलियारों हालांकि 67 बसंत देखने वाली इन मैंने देखा छोटी निगाहों (छोटे आंखों वाले गणेश जी की तरह) मेरी निगाहों ने भी नहीं देखा। वहां भी चाय की चुस्कियों के झ़ुकरासन ही छाया हुआ है।
मसलन … ‘वो’ इतने झ़ुके हुए क्यों रहते हैं? मेरे ख्याल से झुकने के लिए ठीक उसी तरह से झुकना पड़ता है जैसे कुछ पाने के लिए खोना पड़ता है। अब किसी चीज का अभ्यास करते रहिए तो वह कंठस्थ हो जाती है वैसे ही झुकने का बराबर अभ्यास करने से व्यक्ति बराबर झ़ुका रहता है। वैसे भी कोई चीज सोते जागते, उठते बैठते लगातार देखते रहिए तो उसकी वही मुद्रा निगाहों के सामने आती है, अक्सर आंखें बंद करने पर आती है और कभी-कभी तो नींद में भी जा आती है। जब रोज़ नींद शुरू होते ही आने लगे और नींद टूटने तक आये तो सावधान हो जाइए। अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि, झुकरासन के प्रति ही लोगों में इतनी दिलचस्पी क्यों वो भी अचानक, रातोंरात! जबकि योग के प्रचार प्रसार में 21वीं सदी में उछाल शेयर की देखने को मिला। 21 जून को तो उसी तरह का रेला लगा रहता है जिस तरह महाकुंभ में गंगा में डुबकी लगाने वालों का। वर्ना तो झुकने के लिए मंडूक आसन भी है। पर मंडूकासन की तरह ही अन्य आसनों में शरीर के लचीलेपन के अनुसार बैठना पड़ता है और कभी-कभी लेटना भी।
बात मुद्दे की। चूंकि इन दिनों चर्चा-ए-आम झ़ुकरासन ही है तो दूर से दर्शन करने वाले यंत्र पर, गूगल पर तैर रहे फोटुओं को देख कर बड़ी हुई मेरी छुटकी ने पूछा, पापा ‘ये’ हमेशा इतने झ़ुके क्यों रहते हैं? आपकी तरह ही कमर में दर्द रहता है तो कमर दर्द वाले आसन करें। अंदर से बेलन हिलाते श्रीमती जी का वाक ‘तांडव’ शुरू। ये हमेशा टीवी से चिपके रहने का नतीज़ा है। अब उनसे मगज़मारी करने का मतलब सांड को लाल कपड़े दिखाने जैसा है। सो मैं भी झुकते-झ़ुकते दंडवत हो गया अब आप अपनी ज़ाने !!!

 

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