हर श्रमिक को मिले केंद्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम वेतनमान
देश का सबसे महंगा शहर है नोएडा, 20000 रुपए प्रतिमाह से कम वेतन है शोषण
चरण सिंह
नोएडा में मजदूरों का आंदोलन सिस्टम से बगावत है। आंदोलन उग्र ऐसे ही नहीं हुआ ? आंदोलन तो 7 तारीख से चल रहा है। कोई समाधान क्यों नहीं निकला ? मजदूरों की पीड़ा समझने के बजाय उनको धमकी जाने लगी। जब शोषण और दमन की पराकाष्ठा हो जाती है तो यही होता है जो नोएडा में हुआ है।
आप कभी कोरोना के नाम पर तो कभी ईरान-इजरायल युद्ध के नाम पर लोगों से संकट का सामना करने को कह देते हैं पर यह नहीं सोचते कि आखिर आम आदमी का चूल्हा कैसे जले ? सरकार का कोई नुमाइंदा अपने खर्चे में कोई कटौती नहीं करता। आम आदमी को उपदेश देंगे पर जनता के टैक्स से मौज मस्ती करेंगे। इससे किसी को कोई मतलब नहीं कि आम आदमी को रोटी कैसे मिले ? कैसे वे अपने बच्चों को पढ़ाएं ? कैसे दवा दिलाए ? बीजेपी गौतमबुद्धनगर के सांसद महेश शर्मा, नोएडा के विधायक पंकज सिंह, दादरी के विधायक तेजपाल नागर और जेवर के विधायक धीरेन्द्र सिंह से पूछे कि आप लोगों के होते हुए आखिरकार नोएडा में यह नौबत क्यों आ गई ? रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के सुपुत्र पंकज सिंह तो नोएडा से विधायक हैं। इनका काम क्या है ? बस चुनाव में बीजेपी के नाम पर वोट हासिल करना। यदि नोएडा में श्रमिकों के साथ इतना अन्याय हो रहा है तो ये लोग क्या कर रहे हैं ?
डीएम का क्या काम है ? डीएलसी का क्या काम है ? नोएडा अथॉरिटी क्या लूट-खसोट मचाने के लिए ही है ? क्या किसी एक फैक्ट्री में आंदोलन चल रहा है ? लगभग सभी फैक्ट्रियों में आंदोलन है। मतलब नोएडा में हर फैक्ट्री में श्रमिकों का शोषण हो रहा है पर किसी को क्या ? हिन्दू मुस्लिम, सवर्ण, दलित, पिछड़ा कार्ड खेलकर चुनाव जीत लेंगे। लोग भी भोले भाले हैं इन दलों की चिकनी चुपड़ी बातों में आ जाते हैं।
लालच के वशीभूत होकर जाति और धर्म के नाम पर पार्टी पोलटिक्स में पड़ जाते हैं। हम लोग चिल्लाते रहते हैं कि जमीनी मुद्दों पर बात हो। कोई समझने को तैयार नहीं क्या ? जमीनी मुद्दे यही तो हैं, रोजगार, उचित वेतन, मान सम्मान और अधिकार। यह गुस्सा इसलिए ही तो फूटा है कि इन मजदूरों को जाति और धर्म के नाम पर उलझा रखा था। अब जब इनके सामने बड़ा संकट आ खड़ा हुआ तो इनकी समझ में आया। गुस्से में बात आदमी गलत कदम भी उठा लेता है। नोएडा में भी यही हुआ है। उपद्रवियों के साथ ही कुछ कर्मचारी भी भटक गए होंगे।
गत दिनों के इंजीनियर पानी डूबकर मर गया। वह 5 घंटे तक बचाने के लिए चिल्लाता रहा पर उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। कौन कौन सा अधिकारी सस्पेंड हुआ ? किसको क्या सजा मिली ? नोएडा जैसे हाईटेक शहर में जब इंजीनियर को नहीं बचाया जा सका तो फिर कस्बों का क्या हाल होगा। बस हिन्दू मुस्लिम ही करते रहोगे ? सवर्ण, ओबीसी और पिछड़ा ही करते रहोगे। इनके लिए कुछ करोगे भी।
आखिर नोएडा के श्रमिकों का गुसा इतना क्यों फूट पड़ा ? इस मंथन की जरूरत है। कब तक लोगों को डराकर रखोगे ? मरता क्या नहीं करता। यही नोएडा में हो रहा है। गैस की किल्लत के चलते गरीब आदमी बेचारा 300 रुपए किलों की गैस खरीद रहा है। 4 हजार तक गैस सिलेंडर लेने को मजबूर है। ऐसे में मजदूर बेचारा आखिर कैसे खुद का पेट भरे ? और कैसे अपना परिवार पाले ? निश्चित रूप से किसी भी आंदोलन में हिंसा की कोई गुंजाईश नहीं है पर इन मजदूरों की कोई सुनने को भी तैयार नहीं था।
नेता, ब्यूरोक्रेट्स और पूंजीपति मजे मार रहे हैं और किसान मजदूर को संकट झेलने का प्रवचन दे देते हैं। देश में इतने संकट आए किसी राजनेता, ब्यूरोक्रेट्स या फिर पूंजीपति ने अपने खर्चे में कोई कटौती की ? प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और दूसरे मंत्री क्या अपने किसी खर्चे में कोई कटौती करते हैं ? सब कुर्बानी किसान और मजदूर ही देता रहे।
नोएडा में यही हुआ है। केंद्र सरकार जब न्यूनतम वेतन 21000 रुपए घोषित कर रही है तो फिर राज्यों का रोना क्यों ? यदि राज्यों को ही अपना न्यूनतम वेतनमान घोषित करना है तो फिर केंद्र सरकार के न्यूनतम वेतनमान का क्या औचित्य ? वैसे भी इस महंगाई के दौर में 21000 रुपए से कम वेतन का कोई मतलब भी नहीं है। नोएडा में श्रमिकों के आंदोलन को लेकर शासन प्रशासन सब बातें कर रहा है पर 20000 हजार रुपए मजदूर को कैसे मिले इससे कोई मतलब नहीं।
दरअसल वेतनमान के नाम पर सरकारें बस श्रमिकों का बेवकूफ ही बनाती हैं। यह बात तो मजदूरों की है। देश की सर्वोच्च संस्था सुप्रीम कोर्ट ने प्रिंट मीडिया के लिए 2008 में मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने का आदेश दिया। प्रिंट मीडिया के मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया तो उन पर कोर्ट की अवमानना का केस चला। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर प्रिंट मालिकों को यह कहकर राहत दे दी है इन लोगों को मामले की सही से जानकारी नहीं है। भाई जानकारी नहीं थी उन्हें जानकारी देकर लागू करा देते। कुछ नहीं किया। उलटे जिन पत्रकारों और गैर पत्रकारों ने मजीठिया वेज बोर्ड मांगा उनको नौकरी से निकाल दिया गया। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला तो सुप्रीम कोर्ट ने मामले को लेबर कोर्ट भेज दिया।
मतलब सुप्रीम कोर्ट अपने आदेश को भी लागू नहीं करा पाया। जिन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सम्मान दिलाना चाहा उन्हें खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही मरने के लिए छोड़ दिया गया। 10-12 साल से दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान, नव भारत टाइम्स समेत कितने अखबारों के कर्मचारी मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे हैं पर किसी को मजीठिया वेज बोर्ड न मिल सका। जब मीडिया के लोगों के साथ इतना अन्याय किया जा रहा है तो बेचारे मजदूरों की कौन सुनने वाला है। जब न्यायपालिका ही अपने आदेश को संरक्षण नहीं दे पा रही है तो ये सरकारें क्या करेंगी ? फिर कहते हैं कि आंदोलन में हिंसा हो रही है।
शांतिपूर्वक बात रखने पर कोई सुनता है क्या ? वैसे भी मजदूर बेचारा कभी हिंसा नहीं करता। कुछ उपद्रवी आंदोलन में घुस जाते हैं। ऐसा ही नोएडा में हुआ है। मजदूर बेचारे तो रोजी रोटी के लिए नोएडा आए हैं। उनको सम्मानजनक वेतन मिले। उनका शोषण और दमन न हो बस। मुझे लगता है कि नोएडा के श्रमिक आंदोलन का हल जल्द ही निकलेगा। क्योंकि अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव है। इसलिए बीजेपी नहीं चाहेगी कि मामला टूल पकड़े।

