ईरान युद्ध के पांच हफ्ते होने को आ गए हैं. ऐसे में अमेरिका अपने युद्ध की रणनीति में बदलाव करते हुए नजर आ रहा है। कुछ संकेत ऐसे मिले हैं, जिनसे यह माना जा रहा है कि अमेरिका ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को जल्द समाप्त करने की ओर बढ़ रहा है। इस दौरान जो ट्रंप चाहते थे, वो कुछ भी होता नजर नहीं आ रहा है. न तो दोनों देशों के बीच किसी तरह की डील हुई, ना ही स्ट्रेट ऑफ हार्मुज खुला और न ही ईरान ने किसी भी तरह से इस युद्ध में सरेंडर किया है. ऐसे सवाल उठ रहा है कि आखिर ट्रंप क्यों इस युद्ध से जल्दबाजी में भाग रहे हैं? हाल ही में डेली टेलीग्राफ अखबार को दिए एक इंटरव्यू में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह अमेरिका को NATO से बाहर निकालने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं.
उनका बयान भी ऐसे समय आया है, जब अमेरिका की सैन्य कार्रवाई से सहयोगी देशों ने खुद को अलग कर लिया है. इनमें यूके, स्पेन, इटली, फ्रांस और स्विट्जरलैंड जैसे देश शामिल है। इसके अलावा एक कारण और है कि अमेरिका को युद्ध में काफी खर्चा करना पड़ रहा है, इसके अलावा उसके हथियारों से भरा भंडार भी लगातार कम हो रहा है।
ट्रंप नाटो को बता चुके कागजी शेर
डेली टेलीग्राफ को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा है कि इस गठबंधन को वो कागजी शेर मानते हैं। लंबे समय से NATO की विश्वसनीयता पर संदेह रहा है। जब उनसे खुद को NATO से अलग करने पर पुनर्विचार करने को कहा गया तो उन्होंने कहा, ‘ओह हां, मैं कहूंगा कि यह पुर्विचार से परे है। इसके अलावा उन्होंने कहा, ‘मैं नाटो से कभी भी प्रभावित नहीं हुआ. मुझे पता था कि वे एक कागजी शेर हैं. पुतिन भी यह बात जानते हैं।
टॉमहॉक क्रूज मिसाइल का स्टॉक लगातार खत्म
यूएस के डिफेंस दस्तावेजों से जानकारी मिली है कि अमेरिका के पास अब सिर्फ 4 महीने का टॉमहॉक क्रूज मिसाइल का स्टॉक बचा हुआ है। अमेरिका के पास 3,992 टॉमहॉक मिसाइलें हैं. एक महीने में अमेरिका ईरान के खिलाफ 850 मिसाइल दाग चुका है. यानी अगर इसका औसत निकाला जाए तो अमेरिका के पास सिर्फ 3.7 महीनों तक मिसाइल भंडार है।
नाटो के सदस्य देशों से नहीं मिला समर्थन
मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच अमेरिका जहां ईरान को झुकाने में लगा है, तो वहीं दूसरी तरफ नाटो के सहयोगी देशों ने इस युद्ध में अमेरिका का समर्थन करने से मना कर दिया। इससे अमेरिका भड़का हुआ है. ब्रिटेन और फ्रांस ने इस लड़ाई से खुद को दूर कर लिया, बल्कि कई देशों ने अपने यहां अमेरिका के सैन्य विमानों को उतरने की इजाजत ही नहीं. जिन देशों ने अमेरिका के विमानों को उतरने से मना कर दिया, उनमें स्विट्जरलैंड, इटली और फ्रांस शामिल हैं. ब्रिटेन ने तो सीधे तौर पर इस युद्ध में साथ देने से इनकार कर दिया. साथ ही घोषणा की है कि मध्यपूर्व में अतिरिक्त सैन्य बल और वायु रक्षाप्रणाली की तैनाती की जाएगी, जिससे ईरान हमलों के खिलाफ रक्षात्मक कार्रवाई में मदद की जा सके. इसके पीछे मकसद ब्रिटिश हितों की रक्षा करना बताया गया है।
ब्रिटेन की रक्षा मंत्री जॉन हीली ने कहा है कि वे अपने सहयोगियों के साथ मिलकर क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और ईरानी हमलों को रोकने के लिए काम कर रहे हैं। ब्रिटिश सेना ने पहले ही मध्य पूर्व में कई सैन्य अभियान चलाए हैं, जिनमें ईरानी ड्रोन हमलों को रोकना भी शामिल हैं।
क्यों युद्ध से पीछे हटने को मजबूर अमेरिका?
द वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट की मानें तो ट्रंप के सहयोगियों ने माना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलाना प्राथमिकता नहीं है। ऐसा करना अमेरिका के सैन्य अभियान को बढ़ा सकता है. होर्मुज बंद होने के बाद से दुनियाभर के देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है. बड़े स्तर पर तेल आपूर्ति बाधित हुई है. कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा हुआ है।
अमेरिका ने इसे खोलने के लिए अभियान से इनकार नहीं किया है. फिलहाल इसे टालकर अमेरिका अब जल्दी युद्ध खत्म करने पर जोर दे रहा है. इसके अलावा पाक परस्त मध्यस्थता भी किसी तरह के नतीजे पर नहीं पहुंची है. ईरान ने अमेरिक के 15 सूत्रीय मांगों को एकतरफा कहकर नकार दिया था. वहीं, अमेरिका इस युद्ध में रोजाना करीबन एक अरब डॉलर खर्च कर रहा है। पिछले एक महीने में यह आंकड़ा 36 अरब से ज्यादा पर पहुंच गया है. वहीं, युद्ध के वजह से अमेरिका की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हुई है।
ईरान को इस युद्ध में काफी नुकसान झेलना पड़ रहा है
इधर, इस युद्ध में ईरान को काफी नुकसान झेलना पड़ा है। उसके सुप्रीम लीडर से लेकर टॉप कमांडर तक मारे गए हैं. 4700 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो चुकी है। 760 स्कूल और 300 हेल्थ सेंटर जमींदोज हुए हैं। ईरानी रेड क्रिसेंट का कहना है कि देश भर में US-इजरायली हमलों से इन चीजो को नुकसान हुआ है। इनमें 90,063 रेजिडेंशियल यूनिट, 307 हेल्थ और मेडिकल फैसिलिटी, 760 स्कूल शामिल है। सूत्रों के मुताबिक, 20880 लोग इस युद्ध के चलते घायल हुए हैं।

