केंद्रीय बजट ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सरकार की प्राथमिकता किसान नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट और विदेशी बाजार हैं। देश का अन्नदाता आज भी आय सुरक्षा, लागत नियंत्रण और कानूनी MSP की मांग कर रहा है, लेकिन बजट में किसानों को सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं। यूरोपीय संघ (EU) के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता भारतीय किसानों की आजीविका पर सीधा हमला है। यूरोप के किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है, जबकि भारत का किसान कर्ज, महंगाई और प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है। ऐसे में विदेशी कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोलना देश के किसानों को बर्बादी की ओर धकेलना है। यह समझौता खेती को लाभ नहीं, संकट देगा।
बिजली अधिनियम में प्रस्तावित बदलाव कृषि पर आर्थिक बोझ बढ़ाने की साजिश है। खेती पहले ही महंगी हो चुकी है — डीजल, खाद, बीज सब महंगे हैं। अगर बिजली भी बाजार के हवाले कर दी गई तो छोटे किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।
बीज कानून में बदलाव किसानों की बीज स्वतंत्रता पर हमला है। सदियों से किसान अपने बीज बचाता आया है। अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बीज पर नियंत्रण देना, किसानों को कंपनियों का गुलाम बनाने जैसा है। यह खेती की आत्मनिर्भरता खत्म करने की दिशा में कदम है।
किसान आंदोलन साफ कहना चाहता है:
कानूनी MSP दो
कर्ज मुक्ति दो
खेती की लागत कम करो
बीज और बिजली पर कॉर्पोरेट कब्जा बंद करो
अगर सरकार ने किसानों की आवाज नहीं सुनी, तो देशव्यापी आंदोलन तेज होगा। किसान चुप नहीं बैठेगा। अन्नदाता अपने अधिकार लेकर रहेगा।
किसान एकता जिंदाबाद
संघर्ष ही समाधान है।
किसान विरोधी बजट, FTA और कानूनों के खिलाफ देशव्यापी आक्रोश

