गीली लकड़ी में अंतिम संस्कार न करने की बात कही थी एक कार्यक्रम में, निधन पर किसी के न रोने की कही थी बात, रोटी को बताया था पहला प्यार
किसानों के परिवारों की मदद के लिए बनाई थी नाम फाउंडेशन
चरण सिंह
ऐसा अभिनेता जो असली जिंदगी में भी क्रांतिवीर बनकर रहा। जी हां बात हो रही रही है महान अभिनेता नाना पाटेकर की। नाना ने पूरा जीवन सादगीपूर्ण तरीके से जीया। दिखावटी जिंदगी से दूर रहने वाले नाना अपने गांव की मिटटी से बहुत प्यार करते थे। शायद यही वजह रही होगी कि उन्होंने अंतिम विदाई उनके गांव से देने की बात की थी । नाना पाटेकर घुमा फिराकर बात करने में विश्वास नहीं रखते थे। वह जो भी बोलते दमदार और वजनदार बोलते थे।
एक कार्यक्रम में नाना पाटेकर ने बोला था कि उन्हें गीली लकड़ी में न जलाया जाए। उनका मानना था कि गीली लकड़ी होगी तो धुंआ उठेगा। धुंआ उठेगा तो लोगों के आंखों से आंसू आएंगे। और वह नहीं चाहते थे कि कोई उनके लिए रोये। उन्होंने अपने निधन के लिए 12 मन लड़की का भी इंतजाम कर रखा था। उनका कहना था कि उनके माता पिता भाई बहन सभी का निधन हो चुका है। वह अब अकेले हैं। वह अपने निधन को अपने परिवार से मिलना मानते थे। एक इंटरव्यू में जब उनसे पहले प्यार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने पहला प्यार रोटी बताया। नाना पाटेकर का बचपन बहुत संघर्षपूर्ण रहा है। वह कभी संघर्ष के दिनों को नहीं भूले।
नाना पाटेकर ने महाराष्ट्र में सूखे और कर्ज से पीड़ित किसानों तथा आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की मदद के लिए नाम फाउंडेशन (NAAM Foundation) की शुरुआत की थी। दरअसल नाना ने 2015 में मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर पुणे में नाम फाउंडेशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सूखाग्रस्त इलाकों में किसानों की सहायता करना था।
वह नाना पाटेकर ही थे जिन्होंने किसानों की आत्महत्या की दर्दनाक खबरें देखकर 1.5 करोड़ रुपये की लग्जरी कार खरीदने का इरादा रद्द कर दिया और वह सारा पैसा पीड़ित परिवारों की मदद के लिए दे दिया। विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को 15-15 हजार रुपये के चेक, कंबल, कपड़े और मेडिकल किट प्रदान किए।
बच्चों की शिक्षा: फाउंडेशन के जरिए किसानों के बच्चों की स्कूल और कॉलेज की फीस उठाने की जिम्मेदारी भी ली गई। जल संरक्षण के काम: गांवों में पानी के स्तर को बढ़ाने और छोटे-छोटे तालाबों के निर्माण जैसे जल संरक्षण के कार्य किए गए ताकि खेती बेहतर हो सके।
नाना पाटेकर बिना किसी प्रचार या मीडिया कवरेज के खुद दूरदराज के गांवों में जाते थे, किसानों से मिलते थे और जमीन पर उनकी स्थिति सुधारने के लिए काम करते थे।
बच्चों की शिक्षा: फाउंडेशन के जरिए किसानों के बच्चों की स्कूल और कॉलेज की फीस उठाने की जिम्मेदारी भी ली गई। जल संरक्षण के काम: गांवों में पानी के स्तर को बढ़ाने और छोटे-छोटे तालाबों के निर्माण जैसे जल संरक्षण के कार्य किए गए ताकि खेती बेहतर हो सके।
नाना पाटेकर बिना किसी प्रचार या मीडिया कवरेज के खुद दूरदराज के गांवों में जाते थे, किसानों से मिलते थे और जमीन पर उनकी स्थिति सुधारने के लिए काम करते थे।
पद्म श्री से सम्मानित नाना पाटेकर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1978 की फ़िल्म ‘गमन’ से की थी। वे हिंदी और मराठी सिनेमा के सबसे वर्सेटाइल अभिनेताओं में से एक थे, जिन्होने अपनी जबरदस्त एक्टिंग और गंभीर व कॉमेडी किरदारों के बीच अपने को साबित किया था। 1989 में आई फ़िल्म ‘परिंदा’ ने उनके करियर को एक उड़ान दी। इसके बाद उन्होंने ‘अंगार’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्नि साक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूज़िकल’, ‘शक्ति’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में अपनी दमदार अदाकारी की।
‘क्रांतिवीर’ में उनकी एक्टिंग के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। उन्हें ‘परिंदा’ और ‘अग्नि साक्षी’ के लिए भी राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले। वे उन चुनिंदा अभिनेताओं में से हैं, जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ विलेन की कैटेगरी में फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीते हैं। अपने लंबे करियर के दौरान, नाना पाटेकर को तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, कई फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड और अन्य बड़े सम्मान मिले। 2013 में, भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया।

