नाना पाटेकर को गांव से बहुत लगाव था। वह अपनी जन्मस्थली से जुड़े रहे। गांव की मिट्टी की सौंधी खुशबू उन्हें बरबस गांव की ओर खींच लाती थी। शायद यही वजह रही होगी कि उन्होंने अपना अंतिम संस्कार अपने गांव में करने के लिए कहा था। मराठी और हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर ने गुरुवार की सुबह इस दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। एक्टर की गोवा में कार्डियक अरेस्ट की वजह से मौत हो गई, वहीं उनका पार्थिव शरीरर अब गोवा से पुणे लाया जाएगा। जहां उनका अंतिम संस्कार होगा। नाना पाटेकर की अंतिम विदाई बेहद निजी होगी। दिग्गज अभिनेता की अपनी अंतिम यात्रा के लिए एक साधारण सी इच्छा थी. वह अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते थे और अपने गांव में ही पंच तत्व में विलिन होना चाहते थे। अब उनकी यह इच्छा पूरी होगी।
नाना पाटेकर हमेशा से अपने गांव चाहते थे अपना अंतिम संस्कार
पद्म श्री से सम्मानित नाना पाटेकर की आखिरी इच्छा थी कि उन्हें पुणे के डोंजे गांव में अंतिम विदाई दी जाए. उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने पुष्टि की कि अभिनेता का पार्थिव शरीर दोपहर बाद पुणे लाया जाएगा. दिवंगत अभिनेता का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।
राजकीय सम्मान के साथ होगा नाना पाटेकर का अंतिम संस्कार
महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री आशीष शेलार ने घोषणा की कि महाराष्ट्र सरकार ने नाना पाटेकर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करने का फैसला लिया है। यह निर्णय देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने मराठी थिएटर के साथ-साथ मराठी और हिंदी सिनेमा में अभिनेता के शानदार योगदान को मान्यता देते हुए लिया।
सीएम देवेंद्र फडणवीस ने नाना के बेटे मल्हार से फोन पर बात कर उन्हें दुख की इस घड़ी में ढांढस भी बंधाया। सीएम ने कहा कि नाना पाटेकर के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार हमेशा उनके साथ रहेगी। मुख्यमंत्री ने ये भी जानकारी दी कि नाना पाटेकर का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।
नाना पाटेकर का करियर
नाना पाटेकर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1978 की फ़िल्म ‘गमन’ से की थी. वे हिंदी और मराठी सिनेमा के सबसे वर्सेटाइल अभिनेताओं में से एक थे जिन्होने अपनी जबरदस्त एक्टिंग और गंभीर व कॉमेडी किरदारों के बीच आसानी से ढल जाने की काबिलियत का लोहा मनवाया था। 1989 में आई फ़िल्म ‘परिंदा’ ने उनके करियर को एक नया मोड़ दिया. इसके बाद उन्होंने ‘अंगार’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्नि साक्षी’, ‘खामोशी: द म्यूज़िकल’, ‘शक्ति’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में अपनी दमदार अदाकारी की छाप छोड़ी।
नाना की पुरस्कार से हुए सम्मानित
‘क्रांतिवीर’ में उनकी एक्टिंग के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। उन्हें ‘परिंदा’ और ‘अग्नि साक्षी’ के लिए भी राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिले। वे उन चुनिंदा अभिनेताओं में से हैं जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ विलेन की कैटेगरी में फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीते हैं. अपने लंबे करियर के दौरान, नाना पाटेकर को तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, कई फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड और अन्य बड़े सम्मान मिले। 2013 में, भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया।
मराठी सिनेमा और थिएटर से भी रहा गहरा जुड़ाव
मराठी सिनेमा और थिएटर के साथ भी उनका जुड़ाव उतना ही मज़बूत रहा. ‘नटसम्राट’ में गणपतराव बेलवलकर का उनका किरदार उनके करियर की सबसे तारीफ पाने वाली भूमिकाओं में से एक था और इसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर मराठी अवॉर्ड मिला।

