एक अजनबी कब जीवन बन गया पता ही नहीं चला। 30 मई 1990 को जो अजनबी मेरे जीवन में आया था, आज वही मेरे अस्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। और शायद यही सच्चे विवाह की सबसे खूबसूरत पहचान है।30 मई 1990… यह सिर्फ एक तारीख नहीं थी, बल्कि मेरे जीवन का वह दिन था जब एक अजनबी के साथ मेरा जीवन जुड़ गया था। उस समय ना एक-दूसरे की आदतों का पता था, ना स्वभाव का। बस एक रिश्ता था, जिसे परिवार और संस्कारों ने जोड़ दिया था। लेकिन धीरे-धीरे वही अजनबी कब मेरी सांसों में बस गया, कब मेरी दुनिया बन गया, यह मुझे खुद भी पता नहीं चला।मेरे पति ने मुझे रूप से नहीं, मेरे मन से प्रेम किया।
आज हमारी शादी की सालगिरह है। इतने वर्षों के साथ में मैंने यह समझा है कि सच्चा प्रेम दिखावे में नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे की आत्मा में बस जाने का नाम प्रेम है। हम दोनों ने कभी सार्वजनिक रूप से अपने प्रेम का प्रदर्शन नहीं किया, ना ही दुनिया को दिखाने के लिए बड़े-बड़े शब्द बोले। लेकिन मेरे पति ने मुझे जो सम्मान दिया, जो अपनापन दिया, वही मेरे लिए संसार का सबसे बड़ा प्रेम है।
आज के समय में प्रेम की परिभाषा बदलती जा रही है। लोग समझते हैं कि यदि पति अपनी पत्नी से प्रेम करता है तो उसे अपने माता-पिता, भाई-बहनों से दूरी बना लेनी चाहिए। पत्नी की हर बात मानना, चाहे वह सही हो या गलत, यही प्रेम का प्रमाण माना जाने लगा है। कई बार तो पुरुष अपनी पत्नी के सामने अपने ही जन्म देने वाले माता-पिता से लड़ पड़ता है। समाज इसे “पत्नी का सच्चा प्रेम” कहता है।
लेकिन मेरे लिए प्रेम की परिभाषा बिल्कुल अलग है।
मेरे पति ने कभी अपने माता-पिता का अपमान नहीं किया। उन्होंने कभी ऊंची आवाज़ में जवाब तक नहीं दिया। यही कारण है कि मेरे मन में उनके लिए असीम सम्मान है। मैं अपने पति की पूजा इसलिए करती हूं क्योंकि उन्होंने रिश्तों की मर्यादा निभाई है। उन्होंने मुझे प्रेम दिया, लेकिन उस प्रेम के लिए अपने संस्कारों को नहीं छोड़ा।
मुझे लगता है कि जो व्यक्ति अपने माता-पिता का सम्मान नहीं कर सकता, वह किसी का सच्चा नहीं हो सकता। जो पुरुष केवल पत्नी को खुश करने के लिए अपने माता-पिता को भूल जाए, उनकी सुध ना ले, उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाए — वह गुलाम तो हो सकता है, लेकिन चरित्रवान इंसान नहीं।
सच्चा पुरुष वही है जो सभी रिश्तों को साथ लेकर चले।
मेरे पति ने मुझे कभी मेरे रूप से नहीं आंका। मैं ना तो बहुत सुंदर हूं, ना ही पिछले 23 वर्षों से मैं ठीक तरह से चल पाती हूं। मेरे जीवन में शारीरिक कठिनाइयाँ रही हैं। कई बार मुझे लगा कि शायद मैं अपने पति के जीवन का बोझ बन जाऊंगी। लेकिन उन्होंने कभी मुझे ऐसा महसूस नहीं होने दिया।
उन्होंने मेरे चेहरे की सुंदरता नहीं देखी, उन्होंने मेरे मन को देखा। मेरे व्यवहार को देखा। मेरे संस्कारों को देखा। उन्हें मेरा दिल सुंदर लगा।
आज के समय में जहां लोग थोड़ी सी परेशानी आने पर रिश्ते तोड़ देते हैं, वहां मेरे पति हर परिस्थिति में मेरे साथ खड़े रहे। उन्होंने कभी मेरे दर्द को मेरा अकेला दर्द नहीं रहने दिया। हमारे रिश्ते की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि दर्द एक को होता है, तो तकलीफ दूसरे को भी होती है।
यही तो आत्माओं का मिलन होता है।
पति-पत्नी का रिश्ता केवल शरीर का रिश्ता नहीं होता। यह दो आत्माओं का संगम होता है। जहां बिना कहे मन की बात समझ में आने लगे, जहां खामोशी भी संवाद बन जाए, जहां एक की आंखों का दर्द दूसरा पढ़ ले — वहीं सच्चा विवाह होता है।
मेरे पति बिना मेरे कहे मेरे मन की हर बात जान लेते हैं। मुझे क्या चाहिए, क्या तकलीफ है, कब मैं उदास हूं — यह सब उन्हें बिना बोले समझ आ जाता है। शायद यही प्रेम की सबसे ऊंची अवस्था होती है।
आजकल लोग प्रेम को केवल आकर्षण समझ लेते हैं। सुंदरता, पैसा, दिखावा — इन्हीं को रिश्तों का आधार बना लिया गया है। लेकिन समय के साथ सुंदरता ढल जाती है, शरीर कमजोर हो जाता है, जवानी खत्म हो जाती है। यदि रिश्ता केवल बाहरी आकर्षण पर टिका हो, तो वह ज्यादा समय तक नहीं टिकता।
सच्चा प्रेम वह होता है जो समय के साथ और गहरा हो जाए।
मेरे पति ने मुझे हर खुशी देने की कोशिश की। उन्होंने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं किसी बात में अधूरी हूं। जबकि सच तो यह है कि उन्होंने मेरे लिए जितना किया, शायद मैं कभी उसका ऋण नहीं चुका सकती।
आज हमारी शादी को इतने वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन मेरे मन में उनके लिए सम्मान हर दिन बढ़ता ही गया है। क्योंकि प्रेम केवल “आई लव यू” कह देने से नहीं होता। प्रेम त्याग में दिखता है, जिम्मेदारी निभाने में दिखता है, रिश्तों की मर्यादा बनाए रखने में दिखता है।
एक अच्छा पति वही नहीं होता जो पत्नी की हर गलत बात में उसका साथ दे। बल्कि अच्छा पति वह होता है जो पत्नी को सही और गलत का अंतर समझाए, जो उसे परिवार जोड़ना सिखाए, जो अपने माता-पिता और पत्नी — दोनों के प्रति न्याय करे।
और एक अच्छी पत्नी वही होती है जो पति को उसके परिवार से दूर करने की जगह उसके रिश्तों को मजबूत बनाए।
मैं गर्व से कह सकती हूं कि मेरे पति ने मुझे केवल पत्नी का स्थान नहीं दिया, बल्कि सम्मान दिया, सुरक्षा दी, आत्मसम्मान दिया। उन्होंने मुझे यह एहसास कराया कि प्रेम शरीर से नहीं, आत्मा से किया जाता है।
आज हमारी सालगिरह पर मैं ईश्वर का धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने मुझे ऐसा जीवनसाथी दिया। शायद हर स्त्री को ऐसा पति नहीं मिलता जो उसकी कमियों से ज्यादा उसकी अच्छाइयों को देखे।
सच्चा प्रेम रिश्ते तोड़ता नहीं, जोड़ता है”
मैंने जीवन में यही सीखा है कि जिस पुरुष के दिल में अपने माता-पिता के लिए प्रेम होता है, वही पुरुष अपनी पत्नी से भी सच्चा प्रेम कर सकता है। क्योंकि प्रेम करने वाला इंसान कभी रिश्ते तोड़ना नहीं जानता, वह केवल रिश्ते निभाना जानता है।
आज की पीढ़ी को समझना होगा कि विवाह कोई युद्ध नहीं है, जहां पत्नी जीत जाए और माता-पिता हार जाएं। विवाह तो वह बंधन है जहां सभी रिश्तों को साथ लेकर चलना पड़ता है।
रिश्ते तोड़कर पाया गया प्रेम कभी सुख नहीं देता।
लेकिन रिश्तों को जोड़कर निभाया गया प्रेम जीवन को स्वर्ग बना देता है।पति वही जो पत्नी से भी प्रेम करे और माता-पिता का सम्मान भी।
मेरे लिए मेरे पति केवल जीवनसाथी नहीं, बल्कि मेरे आत्मसम्मान, मेरे विश्वास और मेरे जीवन का सबसे सुंदर सत्य हैं।
– ऊषा शुक्ला
आज हमारी शादी की सालगिरह है। इतने वर्षों के साथ में मैंने यह समझा है कि सच्चा प्रेम दिखावे में नहीं होता, बल्कि एक-दूसरे की आत्मा में बस जाने का नाम प्रेम है। हम दोनों ने कभी सार्वजनिक रूप से अपने प्रेम का प्रदर्शन नहीं किया, ना ही दुनिया को दिखाने के लिए बड़े-बड़े शब्द बोले। लेकिन मेरे पति ने मुझे जो सम्मान दिया, जो अपनापन दिया, वही मेरे लिए संसार का सबसे बड़ा प्रेम है।
आज के समय में प्रेम की परिभाषा बदलती जा रही है। लोग समझते हैं कि यदि पति अपनी पत्नी से प्रेम करता है तो उसे अपने माता-पिता, भाई-बहनों से दूरी बना लेनी चाहिए। पत्नी की हर बात मानना, चाहे वह सही हो या गलत, यही प्रेम का प्रमाण माना जाने लगा है। कई बार तो पुरुष अपनी पत्नी के सामने अपने ही जन्म देने वाले माता-पिता से लड़ पड़ता है। समाज इसे “पत्नी का सच्चा प्रेम” कहता है।
लेकिन मेरे लिए प्रेम की परिभाषा बिल्कुल अलग है।
मेरे पति ने कभी अपने माता-पिता का अपमान नहीं किया। उन्होंने कभी ऊंची आवाज़ में जवाब तक नहीं दिया। यही कारण है कि मेरे मन में उनके लिए असीम सम्मान है। मैं अपने पति की पूजा इसलिए करती हूं क्योंकि उन्होंने रिश्तों की मर्यादा निभाई है। उन्होंने मुझे प्रेम दिया, लेकिन उस प्रेम के लिए अपने संस्कारों को नहीं छोड़ा।
मुझे लगता है कि जो व्यक्ति अपने माता-पिता का सम्मान नहीं कर सकता, वह किसी का सच्चा नहीं हो सकता। जो पुरुष केवल पत्नी को खुश करने के लिए अपने माता-पिता को भूल जाए, उनकी सुध ना ले, उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाए — वह गुलाम तो हो सकता है, लेकिन चरित्रवान इंसान नहीं।
सच्चा पुरुष वही है जो सभी रिश्तों को साथ लेकर चले।
मेरे पति ने मुझे कभी मेरे रूप से नहीं आंका। मैं ना तो बहुत सुंदर हूं, ना ही पिछले 23 वर्षों से मैं ठीक तरह से चल पाती हूं। मेरे जीवन में शारीरिक कठिनाइयाँ रही हैं। कई बार मुझे लगा कि शायद मैं अपने पति के जीवन का बोझ बन जाऊंगी। लेकिन उन्होंने कभी मुझे ऐसा महसूस नहीं होने दिया।
उन्होंने मेरे चेहरे की सुंदरता नहीं देखी, उन्होंने मेरे मन को देखा। मेरे व्यवहार को देखा। मेरे संस्कारों को देखा। उन्हें मेरा दिल सुंदर लगा।
आज के समय में जहां लोग थोड़ी सी परेशानी आने पर रिश्ते तोड़ देते हैं, वहां मेरे पति हर परिस्थिति में मेरे साथ खड़े रहे। उन्होंने कभी मेरे दर्द को मेरा अकेला दर्द नहीं रहने दिया। हमारे रिश्ते की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि दर्द एक को होता है, तो तकलीफ दूसरे को भी होती है।
यही तो आत्माओं का मिलन होता है।
पति-पत्नी का रिश्ता केवल शरीर का रिश्ता नहीं होता। यह दो आत्माओं का संगम होता है। जहां बिना कहे मन की बात समझ में आने लगे, जहां खामोशी भी संवाद बन जाए, जहां एक की आंखों का दर्द दूसरा पढ़ ले — वहीं सच्चा विवाह होता है।
मेरे पति बिना मेरे कहे मेरे मन की हर बात जान लेते हैं। मुझे क्या चाहिए, क्या तकलीफ है, कब मैं उदास हूं — यह सब उन्हें बिना बोले समझ आ जाता है। शायद यही प्रेम की सबसे ऊंची अवस्था होती है।
आजकल लोग प्रेम को केवल आकर्षण समझ लेते हैं। सुंदरता, पैसा, दिखावा — इन्हीं को रिश्तों का आधार बना लिया गया है। लेकिन समय के साथ सुंदरता ढल जाती है, शरीर कमजोर हो जाता है, जवानी खत्म हो जाती है। यदि रिश्ता केवल बाहरी आकर्षण पर टिका हो, तो वह ज्यादा समय तक नहीं टिकता।
सच्चा प्रेम वह होता है जो समय के साथ और गहरा हो जाए।
मेरे पति ने मुझे हर खुशी देने की कोशिश की। उन्होंने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं किसी बात में अधूरी हूं। जबकि सच तो यह है कि उन्होंने मेरे लिए जितना किया, शायद मैं कभी उसका ऋण नहीं चुका सकती।
आज हमारी शादी को इतने वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन मेरे मन में उनके लिए सम्मान हर दिन बढ़ता ही गया है। क्योंकि प्रेम केवल “आई लव यू” कह देने से नहीं होता। प्रेम त्याग में दिखता है, जिम्मेदारी निभाने में दिखता है, रिश्तों की मर्यादा बनाए रखने में दिखता है।
एक अच्छा पति वही नहीं होता जो पत्नी की हर गलत बात में उसका साथ दे। बल्कि अच्छा पति वह होता है जो पत्नी को सही और गलत का अंतर समझाए, जो उसे परिवार जोड़ना सिखाए, जो अपने माता-पिता और पत्नी — दोनों के प्रति न्याय करे।
और एक अच्छी पत्नी वही होती है जो पति को उसके परिवार से दूर करने की जगह उसके रिश्तों को मजबूत बनाए।
मैं गर्व से कह सकती हूं कि मेरे पति ने मुझे केवल पत्नी का स्थान नहीं दिया, बल्कि सम्मान दिया, सुरक्षा दी, आत्मसम्मान दिया। उन्होंने मुझे यह एहसास कराया कि प्रेम शरीर से नहीं, आत्मा से किया जाता है।
आज हमारी सालगिरह पर मैं ईश्वर का धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने मुझे ऐसा जीवनसाथी दिया। शायद हर स्त्री को ऐसा पति नहीं मिलता जो उसकी कमियों से ज्यादा उसकी अच्छाइयों को देखे।
सच्चा प्रेम रिश्ते तोड़ता नहीं, जोड़ता है”
मैंने जीवन में यही सीखा है कि जिस पुरुष के दिल में अपने माता-पिता के लिए प्रेम होता है, वही पुरुष अपनी पत्नी से भी सच्चा प्रेम कर सकता है। क्योंकि प्रेम करने वाला इंसान कभी रिश्ते तोड़ना नहीं जानता, वह केवल रिश्ते निभाना जानता है।
आज की पीढ़ी को समझना होगा कि विवाह कोई युद्ध नहीं है, जहां पत्नी जीत जाए और माता-पिता हार जाएं। विवाह तो वह बंधन है जहां सभी रिश्तों को साथ लेकर चलना पड़ता है।
रिश्ते तोड़कर पाया गया प्रेम कभी सुख नहीं देता।
लेकिन रिश्तों को जोड़कर निभाया गया प्रेम जीवन को स्वर्ग बना देता है।पति वही जो पत्नी से भी प्रेम करे और माता-पिता का सम्मान भी।
मेरे लिए मेरे पति केवल जीवनसाथी नहीं, बल्कि मेरे आत्मसम्मान, मेरे विश्वास और मेरे जीवन का सबसे सुंदर सत्य हैं।
– ऊषा शुक्ला

