कृष्ण बल्लभ सहाय की कहानी भारतीय राजनीति के एक ऐसे दौर की कहानी है… जब कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन आंतरिक गुटबाजी और सामाजिक-आर्थिक बदलावों की लहरें सत्ता के गलियारों को हिला रही थीं… यह एक ऐसे नेता की कहानी है… जिसने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया, जमींदारी उन्मूलन जैसे क्रांतिकारी कदमों में योगदान दिया, बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों और एक गोलीकांड की वजह से उनकी सियासी पारी का दुखद अंत हुआ… यह कहानी न केवल केबी सहाय की व्यक्तिगत यात्रा को दर्शाती है, बल्कि उस दौर की कांग्रेस की आंतरिक राजनीति, सामाजिक उथल-पुथल और बिहार की जटिल सियासत को भी उजागर करती है…
नमस्कार मेरा नाम है… और आप देख रहे हैं THE NEWS15.. ‘बिहार के मुख्यमंत्री’ सीरीज में आज हम बात करेंगे… बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय की, जिन्होंने 2 अक्टूबर 1963 से 5 मार्च 1967 तक बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया… उनकी कहानी आजादी की लड़ाई, सामाजिक सुधार और बिहार की राजनीति में उनके योगदान की एक प्रेरक गाथा है…
केबी सहाय का जन्म 31 दिसंबर, 1898 में पटना के फतुहा इलाके में हुआ था… उनका परिवार बाद में हजारीबाग में बस गया, जहां उनके पिता ब्रिटिश राज में पुलिस दरोगा थे… लेकिन केबी सहाय ने अपने पिता के रास्ते के उलट, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बगावत का रास्ता चुना… उन्होंने कांग्रेस के साथ जुड़कर असहयोग आंदोलन (1920-22), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में हिस्सा लिया… इन आंदोलनों के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा… इसी दौरान उनकी मुलाकात बिहार के कद्दावर कांग्रेसी नेता श्रीकृष्ण सिंह से हुई, जो उनके राजनीतिक गुरु बने… श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में केबी सहाय ने किसान सभा के जरिए ग्रामीण और किसान समुदायों के बीच काम किया… खासकर जमींदारी प्रथा के खिलाफ आवाज बुलंद की… यह वो दौर था जब जमींदारी उन्मूलन का विचार कांग्रेस के भीतर और बाहर जोर पकड़ रहा था… और केबी सहाय ने इस मुहिम में अहम भूमिका निभाई…
1937 में जब श्रीकृष्ण सिंह ने बिहार में पहली कांग्रेस सरकार बनाई… केबी सहाय को बिहार विधान परिषद में उनके सचिव की भूमिका दी गई… आजादी के बाद 1946 में अंतरिम प्रांतीय सरकार में श्रीकृष्ण सिंह ने उन्हें राजस्व विभाग की जिम्मेदारी सौंपी… इस पद पर रहते हुए केबी सहाय ने जमींदारी उन्मूलन के लिए ठोस कदम उठाए… उन्होंने जमींदारी उन्मूलन विधेयक का मसौदा तैयार किया… जिसे श्रीकृष्ण सिंह की कैबिनेट ने मंजूरी दी… 1948 में बिहार देश का पहला राज्य बना, जहां जमींदारी प्रथा को कानूनी रूप से खत्म किया गया… हालांकि, यह कानून बाद में पटना हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के कारण रद्द हो गया, जिसके बाद नए कानून बनाए गए… इस कदम ने केबी सहाय को किसानों और गरीबों में लोकप्रिय बनाया, लेकिन जमींदारों के साथ उनकी दुश्मनी पक्की हो गई… खासकर रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह और दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह जैसे प्रभावशाली जमींदार उनके खिलाफ हो गए… इस दुश्मनी का असर उनकी राजनीतिक यात्रा पर बाद में देखने को मिला….
1952 में केबी सहाय ने हजारीबाग के गिरिडीह से विधानसभा चुनाव लड़ा और आसानी से जीत हासिल की… लेकिन 1957 में जमींदारों की गोलबंदी ने उन्हें पटखनी दी… रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह के प्रभाव के चलते वे गिरिडीह से हार गए। उसी दौरान उनके राजनीतिक संरक्षक श्रीकृष्ण सिंह ने अपने सहयोगी अनुग्रह नारायण सिंह को विधायक दल के नेता के चुनाव में हराया, जिससे केबी सहाय काफी कमजोर हो गए… अगले पांच साल वे संगठन की राजनीति तक सीमित रहे…. 1962 में केबी सहाय ने अपनी कर्मभूमि हजारीबाग छोड़कर जन्मभूमि पटना से चुनाव लड़ा और विधानसभा पहुंचे… यह वह दौर था जब श्रीकृष्ण सिंह का निधन हो चुका था, और विनोदानंद झा बिहार में कांग्रेस की कमान संभाल रहे थे… इस दौरान मछली कांड और जेपी के साथ श्रीकृष्ण सिंह की चिट्ठी विवाद जैसे प्रसंग चर्चा में थे… जेपी ने श्रीकृष्ण सिंह पर आरोप लगाया था कि वे अपने सजातीय केबी सहाय को उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं, जिसका श्री बाबू ने तीखा जवाब दिया था… 1963 में कामराज प्लान के तहत विनोदानंद झा को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा… इस प्लान के तहत कांग्रेस ने कई वरिष्ठ नेताओं को संगठन में काम करने के लिए सरकार से हटाया था… विनोदानंद झा के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए जोड़-तोड़ शुरू हुआ… झा ने वीरचंद पटेल जो कुर्मी समुदाय से आते थे उनका नाम आगे बढ़ाया, ताकि पिछड़े वर्गों का समर्थन हासिल किया जा सके… लेकिन सवर्ण नेताओं, खासकर राजपूत नेता सतेंद्र नारायण सिंह और भूमिहार नेता महेश प्रसाद सिन्हा ने इसका विरोध किया…. केबी सहाय ने अपने करीबी मित्र रामलखन सिंह यादव के जरिए पिछड़े वर्ग के विधायकों में समर्थन जुटाया… नतीजतन, वीरचंद पटेल की उम्मीदवारी औपचारिक वोटिंग से पहले ही कमजोर पड़ गई… 2 अक्टूबर, 1963 को केबी सहाय बिहार के चौथे मुख्यमंत्री बने… उनकी इस जीत में उनकी रणनीति और पिछड़े वर्गों के समर्थन की बड़ी भूमिका थी… केबी सहाय का कार्यकाल लगभग साढ़े तीन साल का रहा, लेकिन यह चुनौतियों से भरा था… उनकी सरकार ने कई सामाजिक और प्रशासनिक सुधारों पर काम किया, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप और आंतरिक गुटबाजी ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया…
सतेंद्र नारायण सिंह और महेश प्रसाद सिन्हा जैसे सवर्ण नेता जल्द ही उनसे नाराज हो गए… इसकी काट के लिए सहाय ने पिछड़े वर्गों को मंत्रिमंडल में जगह दी… रामलखन सिंह यादव, सुमित्रा देवी (कुशवाहा), देवशरण सिंह (यादव), अब्दुल कयूम अंसारी और जफर इमाम जैसे नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया… जमींदारी उन्मूलन के कारण रामगढ़ और दरभंगा के जमींदार उनके खिलाफ थे… यह दुश्मनी 1967 के चुनाव में उनके खिलाफ भारी पड़ी… सहाय और उनके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के आरोप लगे… ये आरोप दिल्ली तक पहुंचे, जहां कांग्रेस अध्यक्ष कामराज और निजलिंगप्पा तक शिकायतें गईं… हालांकि, सहाय ने इन आरोपों को विपक्ष की साजिश करार दिया… केबी सहाय के पतन की शुरुआत 5 जनवरी, 1967 को पटना यूनिवर्सिटी में हुए गोलीकांड से हुई… फीस बढ़ोतरी और अन्य मांगों को लेकर छात्र प्रदर्शन कर रहे थे… प्रदर्शन हिंसक होने पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें कई छात्र मारे गए… इस घटना ने पूरे बिहार में आक्रोश फैला दिया… विपक्ष ने इसका फायदा उठाया, और छात्रों ने सहाय के खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया… हजारीबाग में उनके पैतृक घर और नवादा में उन पर हमला हुआ… कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने पटना पहुंचकर गोलीकांड की न्यायिक जांच की सलाह दी… लेकिन सहाय ने इसे विपक्ष की साजिश बताते हुए जांच से इनकार कर दिया और इस्तीफा सौंप दिया… कामराज ने इस्तीफा खारिज कर दिया, लेकिन 1967 के विधानसभा चुनाव में केबी सहाय ने पटना पश्चिम और हजारीबाग से चुनाव लड़ा… विपक्षी जनक्रांति दल ने पटना से महामाया प्रसाद सिन्हा और हजारीबाग से आरके सिन्हा को मैदान में उतारा। दोनों ने सहाय को हरा दिया। सहाय की हार के साथ ही कांग्रेस को भी झटका लगा। 318 सीटों वाली बिहार विधानसभा में कांग्रेस को सिर्फ 128 सीटें मिलीं, और महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने….
इस हार के दौरान एक नारा खूब गूंजा:
“गली-गली में शोर है, केबी सहाय चोर है।”
हैरानी की बात यह थी कि यह नारा सहाय के घर तक पहुंच गया… उनके पोते ने भी सड़क पर लगने वाले नारों को दोहराना शुरू कर दिया, जैसा कि पत्रकार संतोष सिंह ने अपनी किताब Bihar: Ruled & Misruled में लिखा है… हार के बाद केबी सहाय की सियासी हैसियत कमजोर हो गई… महामाया सरकार ने उनकी सरकार के भ्रष्टाचार की जांच के लिए जस्टिस टीएएल वेंकटराम अय्यर की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया, लेकिन इसकी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई… 1969 में जब कांग्रेस दो फाड़ हुई, केबी सहाय इंदिरा गांधी के खिलाफ पुराने नेताओं (कांग्रेस-ओ) के साथ चले गए… लेकिन कांग्रेस-ओ का सियासी प्रभाव लगातार कम होता गया…1974 में सहाय हजारीबाग से विधान परिषद के लिए चुने गए, लेकिन उसी साल 5 मई, 1974 को पटना से हजारीबाग जाते वक्त एक सड़क हादसे में उनकी मृत्यु हो गई…
केबी सहाय की कहानी बिहार की सियासत का एक ऐसा अध्याय है, जो सत्ता, संघर्ष, और पतन की गाथा बयां करता है। जमींदारी के खिलाफ उनकी जंग ने उन्हें जनता का नायक बनाया, लेकिन गोलीकांड और भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी सियासी जमीन छीन ली। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सत्ता का शिखर कितना नाजुक होता है, और जनता का गुस्सा कितना ताकतवर। यह कहानी न सिर्फ केबी सहाय की है, बल्कि उस दौर की भी है, जब कांग्रेस का बिहार में सूरज डूब रहा था, और नई सियासी ताकतें उभर रही थीं… बिहार के मुख्यमंत्री की अगली सीरीज में कहानी लेकर आएंगे बिहार के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा की… तब तक के लिए दीजिए इजाजत..






