दिल्ली जंतर मंतर पर जेलों में बंद 25 आरोपियों की उपस्थिति और स्वतंत्र भारद्वाज का आंदोलनकारी
निशु आज़ाद के पिता पर हमले की बात स्वीकारना और सत्ता के संरक्षण के चलते बचे रहने के क्या हैं मायने ?
क्या दर्शा रही धर्म पूछकर एक निजी चैनल की महिला पत्रकार की बेरहमी से पिटाई
हिन्दुओं को आपस में लड़ाना है यूजीसी के नियमों में बदलाव करना
चरण सिंह
और सब कुछ छोड़ भी दिया जाए और 24 घंटे के मात्र तीन मामलों पर ही नजर डाली जाए तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि देश को गृह युद्ध में झोंकने की पूरी तैयारी कर दी गई है। ये तीनों मामले दिल्ली पुलिस से जुड़े हैं। यानी कि गृह मंत्री अमित शाह से। एक मामले में स्वतंत्र भारद्वाज का एक युवा गुंडे की भाषा बोलते हुए कह रहा है कि दिल्ली जंतर मंतर पर उसने निशु आज़ाद के पिता संजय कुमार पर हमला किया। वह स्वीकार कर रहा है कि इस केस पर उस पर धारा 307 यानी कि हत्या का प्रयास का मुकदमा बनता है। पर वह खुलेआम घूम रहा है। उसने दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के साथी ही पीएम मोदी को भी अपना बड़ा भाई बताया है और भी वह बहुत कुछ अनाप शनाप बोल रहा है।

स्वतंत्र भारद्वाज का सीधा-सीधा कहना था कि सत्ता के संरक्षण में होने की वजह से उसका कुछ नहीं बिगड़ा। हालांकि सीजेपी की ओर से कनाट प्लेस संसद रोड थाने में एफआईआर दर्ज कराने के बाद बुलंदशहर से उसकी गिरफ्तारी हो चुकी है। पर बड़ा प्रश्न यह भी है जब यह सब बातें बोलते हुए उसके पॉडकास्ट वीडियो वायरल हो होता रहा तो दिल्ली पुलिस ने बिना एफआईआर दर्ज कराए हंगामा हुए उसकी गिरफ्तारी क्यों नहीं की ?
दूसरा मामला एक निजी चैनल की पत्रकार शाहीन खान का धर्म पूछकर दिल्ली पुलिस द्वारा उसकी बेरहमी से की गई पिटाई। ठीक गोदी मीडिया के पत्रकारों को बीजेपी नेताओं की चाटुकारिता करनी पर पर देश और समाज के लिए पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों को दिल्ली पुलिस पिटेगी ? इतना दुस्साहस दिल्ली पुलिस में कहां से आ गया ? क्या देश की आज़ादी में मुसलमानों का योगदान नहीं है ? आज़ाद भारत में किसी भी धर्म को टारगेट कैसे किया जा सकता है ? आज़ादी की लड़ाई से दूर रहने वाली विचारधारा के नेता धर्म के नाम पर पत्रकारों को पिटवा रहे हैं। आज़ाद भारत में एक महिला पत्रकार की बेरहमी से पिटाई। कहां हैं देश के पत्रकार संगठन ? कहां हैं प्रेस क्लब ? कहां हैं प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ? कहां हैं देश के तथाकथित बड़के पत्रकार ? देश की जनता को यह बात भी भली भांति समझ लेनी चाहिए कि हिन्दू मुस्लिम है नहीं अब इस सरकार ने हिन्दुओं को भी आपस में लड़ा दिया है। ओबीसी एससी एसटी और सवर्ण के नाम पर। यूजीसी एक्ट हिन्दुओं को आपस में ही लड़ाने के लिए ही तो है।
तीसरा मामला सीजेपी के प्रोटेस्ट में दिल्ली की विभिन्न जेलों के 25 आरोपियों की उपस्थिति। जेलों में बंद लोग दिल्ली जंतर मंतर पर कैसे आ गए ? बाकायदा द इंडियन एक्स्प्रेस के यह रिपोर्ट छापी है। ये तीनों मामले दर्शा रही है कि खुद सरकार ही देश को गृह युद्ध में धकेलने पर आमादा है। सत्ता के हाथों इस्तेमाल हो रहे लोगों को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि गृह युद्ध में कोई भी सुरक्षित नहीं रहता है। आज यदि सरकार देश गृह युद्ध के कगार पर है तो इसमें विपक्ष का रोल भी कहीं से कम नहीं है। विपक्ष ने आख़िरकार सरकार को नंगा नाच करने का मौका ही क्यों दिया ?
दरअसल The Indian Express की हालिया पड़ताल में यह बात सामने आई है कि दिल्ली पुलिस के फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) ने जिन 2,873 लोगों के जंतर-मंतर पर CJP प्रदर्शन में मौजूद होने का दावा किया था, उनमें कम से कम 25 ऐसे लोग भी शामिल थे जो असल में उस दौरान तिहाड़, मंडोली और रोहिणी जेलों में बंद थे।
देखने की बात यह है कि माहौल तो ऐसा बनाया जा रहा था कि जैसे आंदोलनकारियों ने पुलिस को मारा हो पर एक पॉडकास्ट पर स्वतंत्र भारद्वाज की बातें और जंतर मंतर पर हुए सीजेपी के प्रोटेस्ट में जेलों में बंद 25 आरोपियों की उपस्थिति से तो ऐसा लग रहा है कि आंदोलन में हुई हिंसा सरकार ने ही कराई थी।
उधर यूजीसी और आरक्षण को लेकर सवर्ण और एससी एसटी-ओबीसी के बीच टकराव की पूरी व्यवस्था सरकार ने कर दी है। सवर्ण समाज यूजीसी और आरक्षण के खिलाफ झंडा उठाए घूम रहा है तो एससी एसटी और ओबीसी को सवर्ण समाज के खिलाफ उकसाया जा है। सहारनपुर में अवैध जगह में बनी होने का आरोप लगाकर एक मस्जिद भी ढहा दी गई। कैराना से सपा सांसद इकरा हसन को हॉउस अरेस्ट कर लिया गया है। मामले को लेकर अखिलेश यादव, मायावती और असदुद्दीन ओवैसी अलग से आक्रामक हैं।

